बहुजनों के नायक कांशीराम

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बहुजनों में ‘मान्यवर’ और ‘साहिब’ नाम से मशहूर कांशीराम की आज जयंती है।बहुजन समाज पार्टी और अन्य दलित-बहुजन सामाजिक संगठन कांशीराम के जन्मदिन,15 मार्च को प्रेरणा दिवस के रूप में मनाते हैं।तमाम समाजविज्ञानियों और राजनीतिक विश्लेषकों ने कांशीराम को स्वतंत्र भारत में विशेषकर उत्तर भारत में बहुजनों के नायक के तौर पर देखा है।वास्तव में कांशीराम एक ऐसे सामाजिक और राजनीतिक योद्धा हैं जिन्होंने भारतीय राजनीति के तमाम मोहरों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा और बाजी को हमेशा अपनी मुट्ठी में रखा।पंजाब के एक बेहद मामूली पृष्ठभूमि से निकलकर आए कांशीराम ने देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीति को बहुजन केन्द्रित बना दिया।उनका प्रभाव आज भी इतना है कि कोई राजनीतिक दल साढ़े सत्रह फीसदी दलितों को नकारने की हिम्मत नहीं कर सकता।
15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के पिरथपुर बंगा में रामदसिया दलित परिवार में जन्मे कांशीराम का राजनीतिक प्रशिक्षण बाबा साहब आंबेडकर की धरती पूना में हुआ।इसी पूना में ऐतिहासिक रूप से गाँधी और आंबेडकर के बीच समझौता हुआ था।अंबेडकरवादी आज भी उस समझौते को दलितों के साथ अन्याय मानते हैं।इस अन्याय को मिटाने और दलितों में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए कांशीराम ने उत्तर प्रदेश को अपना कर्मक्षेत्र बनाया।’चमचा युग’ नामक अपनी किताब में कांशीराम ने पूना पैक्ट के मार्फत आरक्षण से निकले नेताओं के स्वार्थी और निकम्मेपन को रेखांकित किया है।वे आरक्षण को केवल नौकरी पाने का अवसर नहीं मानते थे बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया में सार्थक हिस्सेदारी और इसके माध्यम से सत्ता संरचना पर नियंत्रण का हथियार मानते थे।समाजविज्ञानी बद्रीनारायण का मानना है कि कांशीराम ने अपने तरीके से बहुजन राजनीति के माध्यम से आंबेडकर को दोबारा खोजा।यह सच है कि वे आंबेडकर के चिंतन को ही राजनीति और समाज में आगे बढ़ा रहे थे लेकिन उनके टूल्स अपने हैं।कांशीराम स्वयं कहते थे कि ‘आंबेडकर ने किताबों से सीखा,लेकिन मैंने अपने जीवन और लोगों से सीखा।’ और यह भी कि ‘वह किताबें इकट्ठा करते थे,मैंने लोगों को इकट्ठा करने की कोशिश की।’
आंबेडकर के गाँव और जाति के प्रति नजरिए को कांशीराम ने दूसरे ढंग से देखा।गाँव को आंबेडकर अछूतों-दलितों के लिए जीवित नरक कहते थे।उन्हीं के शब्दों में,”अछूतों के लिए यह(गाँव) हिन्दुओं का साम्राज्यवाद है।यह अछूतों के शोषण का एक उपनिवेश है,जहाँ उनके पास कोई अधिकार नहीं है।असीम धैर्य और विवशता के साथ सेवा ही इस गाँव में दलितों की नियति है।उनके पास दो ही विकल्प हैं,वे इस काम को करें या मरें।”कांशीराम पाते हैं कि जाति की समस्या सिर्फ गाँवों में नहीं है।गाँव छोड़कर जो दूर दराज के शहरों में काम करने जाते हैं उनकी  जाति की पहचान उनके साथ ही रहती है।इसलिए केवल जाति के उन्मूलन से दलितों का शोषण समाप्त नहीं होगा।बल्कि जातियों के सशक्तीकरण से शोषण और अन्याय को मिटाया जा सकता है।इसलिए कांशीराम ने गाँव की दलित बस्तियों और शहरी इलाके की झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों का सशक्तीकरण करने और उनमें जातीय चेतना को जागृत कर संगठित करने का आंदोलन चलाया।कांशीराम हाशिये के कमजोर तबकों के सशक्तीकरण के आंदोलन को ‘दलित आंदोलन’ कहने के बजाय ‘ बहुजन आंदोलन’ कहना पसंद करते थे।गाँवों से लेकर शहरों तक जन सपर्क के माध्यम से उन्होंने लोगों को जोड़ा।साईकिल यात्राओं और आंबेडकर मेलों के माध्यम से  जन जागरण और आत्म सम्मान की भावना पैदा करना,दलित पिछड़े समाज में पैदा होने वाले नायक नायिकाओं की जयंतियाँ मनाना,बहुजन क्रांति का साहित्य उपलब्ध कराना उनके मिशन के हिस्से थे।इसके लिए कांशीराम ने असीम त्याग और बलिदान किया था।
 सबसे बड़े लड़के होने के नाते परिवार के लिए सबसे ज्यादा उम्मीदें उनसे ही थीं।रात-रात भर वे आंबेडकर की किताबों को पढ़ते थे।एक बार माँ के पूछने पर कि इन किताबों में ऐसा क्या लिखा है,’कशिया’ (कांशीराम) ने जवाब दिया था,” माँ,इन किताबों में देश की सत्ता के दरवाजे की कुंजी है,मैं उस कुंजी को खोज रहा हूँ।” 1958 में पूना में ईआरडीएल  की नौकरी से अपने करियर की शुरूआत करने वाले कांशीराम ने सरकारी क्षेत्र में दलितों पिछड़ों के साथ हो रहे अन्याय को देखकर 1964 में प्रथम श्रेणी के अधिकारी पद से इस्तीफा दे दिया।एक बार जब वे हक और अधिकार की लड़ाई के लिए निकले तो सब कुछ छोड़कर।उन्होंने आजीवन विवाह ना करने और घर लौटकर ना आने का संकल्प कर लिया। इसे उन्होंने शिद्दत से निभाया भी।नौकरी से इस्तीफा देने के बाद वे आरपीआई में शामिल हुए।सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने पूना में 1971 में एससी/एसटी,ओबीसी,माइनारिटी कम्युनिटी इम्प्लाइज एसोसिएशन की स्थापना की।बहुजन कर्मचारियों को एक बैनर के नीचे संगठित करने के लिए उन्होंने पाँच साल तक कड़ी मेहनत की।6 दिसंबर 1978 को उन्होंने बामसेफ का गठन किया।1981 में उन्होंने दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएसफोर नामक राजनीतिक संगठन तैयार किया और उसके बाद बड़ी ही सूझबूझ के साथ  1984 में बहुजन समाज पार्टी के रूप में एक राष्ट्रीय स्तर का राजनैतिक दल स्थापित किया।अपनी राजनैतिक यात्रा में वे सामाजिक न्याय के लिए उसी “मास्टर कुंजी” की तलाश करते रहे जिसे डा.आंबेडकर राजनीतिक सत्ता कहते हैं।
‘जय भीम’ के नारे के साथ कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में बसपा के लिए राजनीतिक जमीन तैयार की।समाजवादी राममनोहर लोहिया के दलित पिछड़ों के साठ फीसदी आरक्षण की माँग को अधिक तार्किक और जुझारू बनाकर कांशीराम ने नारा दिया-‘जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी’।उत्तर प्रदेश को चौदह मंडलों में विभाजित करके कांशीराम ने एक रिसर्च विंग के माध्यम से अपने कार्यकर्ताओं को कैडर बनाने का काम किया।वैचारिकता और संघर्ष की अटूट क्षमता के साथ बसपा की आक्रामक राजनीतिक यात्रा शुरू हुई।1977 में कांशीराम के साथ जुड़ने वाली मायावती ने अपने तीसरे चुनाव 1989 में बिजनौर की संसदीय सीट बड़े अंतर से जीती।भाजपा के राम मंदिर आंदोलन और हिन्दुत्व की राजनीति के बरक्स पिछड़ों के आरक्षण की राजनीति के समय सपा मुखिया मुलायम सिंह और कांशीराम ने हाथ मिला लिया।1991 के संसदीय चुनाव  में हालांकि बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा लेकिन इटावा से कांशीराम चुनाव जीत गये।उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भाजपा सत्ता से बेदखल हो गयी।1993 में हुए मध्यावधि चुनाव में बसपा समाजवादी पार्टी के साथ सत्ता में आ गयी।सपा बसपा की आपसी खींचतान के बाद कांशीराम ने मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।1995 में भाजपा के सहयोग से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं।136 दिन सत्ता में रहने के बाद मायावती ने भाजपा का समर्थन खो दिया।1996 के चुनाव में काँग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद बसपा को बहुमत नहीं मिला।1997 में कांशीराम ने एक बार फिर भाजपा के साथ समझौता किया और मायावती फिर से मुख्यमंत्री बनीं।बारी बारी से छह छह माह सरकार चलाने का समझौता आगे चलकर टूट गया।2002 के विधानसभा चुनाव में 98 सीटें जीतकर बसपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।एक बार फिर भाजपा के समर्थन से मायावती की सरकार बनी लेकिन ताज कोरिडोर के मसले पर भाजपा ने 2003 में समर्थन वापस ले लिया।मायावती को इस समय कांशीराम का परामर्श नहीं मिल पाया क्योंकि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।इन परिस्थितियों में अन्य दलों ने मुलायम सिंह के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार बनाने का समर्थन कर दिया।2006 में कांशीराम की मृत्यु हो गयी।इसके बाद 2007 में उनका सपना साकार हुआ जब पूर्ण बहुमत के साथ मायावती के नेतृत्व में बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई।इस तरह कांशीराम की सामाजिक और राजनीतिक यात्रा अविस्मरणीय ही नहीं अविश्वसनीय भी है।
आज जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती की विश्वसनीयता और उनका जनाधार,दोनों डांवाडोल है तब मान्यवर कांशीराम की जयंती पर उनके मिशन को याद करना लाजिमी हो जाता है।आज का दिन उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के लिए बहुत खास होने जा रहा है।एक तरफ नौजवान चन्द्रशेखर आजाद उर्फ रावण अपनी पार्टी का एलान करने जा रहे हैं तो दूसरी तरफ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव दलित समाज और राजनीति को बड़ा पैगाम देने जा रहे हैं।बड़ी संख्या में दलित राजनेता आज समाजवादी पार्टी में शामिल कराए जा सकते हैं।पहले से ही पूर्व सांसद सावित्री बाई फूले मान्यवर के नाम पर ‘कांशीराम बहुजन समाज पार्टी’ बनाकर मैदान में हैं।उन्होंने बसपा से ही राजनीति की शुरूआत की थी लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा के टिकट पर बहराइच से सांसद चुनी गयीं।कथित तौर पर उन्होंने दलित मुद्दों पर सरकार से बगावत करके खुद को अलग कर लिया।फिर काँग्रेस में गयीं।वहाँ से भी बाहर आकर सावित्री बाई फूले ने अपनी पार्टी बनाई है।प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में काँग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में दलित मुद्दों पर मुखर और संघर्षरत  है।अब देखना यह है कि बसपा प्रमुख मायावती अपने गुरू के जन्मदिन को सिर्फ प्रेरणा दिवस के रूप में मनाती हैं  या अपनी खिसकती जा रही राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए कोई मास्टर स्ट्रोक लगाएंगी।
रविकान्त,लखनऊ विश्वविद्यालय
9451945847

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