डूबती संस्कृति,आँखों देखी,कानो सुनी

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(राजेंद्र जोशी-स्वतंत्र पत्रकार)
 सरदार सरोवर बांध के बैक वाटर से मप्र की नर्मदा घाटी में लाई गई डूब के कारण यहां न सिर्फ हजारों परिवारों के घर और खेत डूब रहे हैं बल्कि एक ऐसी समृद्ध संस्कृति जल प्लावित हो रही है जिसके बारे में हमें बहुत थोड़ी जानकारी है। विश्व की बहुत सारी प्राचीन और महान सभ्यताएं नदियों के किनारों पर विकसित हुई है चाहे वे सिंधु घाटी सभ्य्ता हो, बेबीलोन हो या मेसापोटामिया। पुरातत्वर शास्त्रियों के अनुसार नर्मदा प्राचीन नदी है,और इसके किनारे पर मंदिर मस्जिदों के साथ जेव विविधता और कई सभ्यता संस्कृति डूब के साथ नष्ट होती जा रही हे |
और इसी नर्मदा नदी के किनारे बसा हे चिखल्दा ग्राम( जिला धार ) जो की अब डूब कर बर्बाद हो चूका हे,नर्मदा नदी के बढते जल से यह ग्राम 2019 में डूब की आगोश में समा गया था । 2019 में गाव की गलियो में चलती नाव पर अपना सामान लेकर जाते परिजन आपको किसी विदेशी नदी की याद तो दिला रहे थे,लेकिन पीढ़ियों के दर्द को समेट नही सकते थे | विस्थापन ( न्यायालय के आदेश के बाद भी बिना सुविधा व पुनर्वास  के गाव से हटाना,नर्मदा घाटी में ऐसे कई गांव हैं) के एक साल बाद भी  गाव वालो के चेहरे पर गहरी उदासी नजर आती हे,विकास के नाम पर नर्मदा घाटी की कई सभ्यताओं को पानी में डुबो दिया गया हे,सरकारों पर सरकारे बदल गई,लेकिन विस्थापितों का दर्द नही गया |
इस गाव में स्थित पुरानी कचहरी के खंडहर,चाँद शाह वली बाबा और कालू शाह बाबा की दरगाहे,नीलकंठ महादेव,जैन मंदिर,पुराना पंप हॉउस और यहां पैदा हुई हिंदु-मुस्लिम की गंगा जमुनी सभ्यता के खंडहर और बस स्टेंड पर गांधी जी की मूर्ति यहा की विरासत को बताने के लिये काफी हे |
 चिखल्दा ग्राम के बाशिंदे रेहमत के अनुसार नई पीढ़ी चिखल्दा की संस्कृ ति व इतिहास से वाकिफ नही हे,चिखल्दाश के पुरातत्वीरय अध्यलयन में मिले दो अत्यंृत महत्वसपूर्ण प्रमाण इसे अब तक ज्ञात प्रमाणों के आधार पर शेष नर्मदा से अलग करते हैं। पहला प्रमाण है गुफा मानवों की बस्ती का,चिखल्दा  में एक बहुत बड़ा टीला है जिसमें बड़ी संख्या  में मानव गुफाए स्थित है। नर्मदा पुल से जुड़ी सड़क बन जाने से कई संख्या में ये समृदध संस्कृति की प्रतीक पुरातत्वीय धरोहरें नष्टे हो चुकी है। उसके बाद चिखल्दा  के ग्रामीणों ने अज्ञानतावश कई गुफाओं को नष्ट कर दिया। इन गुफाओं के अंदर पाण्डर मिट्टी मिलती है, जिसका उपयोग मिट्टी की दीवारें बनाने में किया जाता है। टीले के किनारे की कुछ गुफाए नर्मदा की बाढ़ के दौरान नष्ट हो गई। लेकिन टीले का जितना हिस्सा अभी शेष है उनमें भी दर्जनों गुफाएँ दफन होने की संभावना है।
दूसरा प्रमाण यहाँ एशिया के पहले किसान समुदाय के अस्तित्व  में होने का मिला है। पुरातत्वीमय अध्ययन के अनुसार एशिया के जिन समुदायों ने सबसे पहले खेती करना सीखा उसमें चिखल्दा में रहने वाले किसान भी शामिल थे। चिखल्दा  और नर्मदा घाटी के अन्य गांवों के पुरातत्वीय अध्यवयन यहाँ विविधतापूर्ण और लंबे समय तक अस्तित्व में रही एक अत्यधिक समृदध मानवीय सभ्यता के अस्तिव में रहने की पुष्टि करते हैं।
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