घाटी के नेताओं की चुनौती पर क्यों उदासीन है केंद्र

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कश्मीर घाटी में प्रमुख नेताओं को रिहा किये जाने से उथल-पुथल शुरू हो गई है। ये नेता दिग्भ्रिमित हैं और अपने राजनैतिक पुनर्जीवन की बाट जोह रहे हैं। अंधेरी सुरंग में फस जाने के एहसास से उनकी हालत खराब है और मुंह से अनर्गल बयानबाजी निकल रही है। फारूख अबदुल्ला चीन की मदद की आशा जता कर जमीन आसमान के कुलाबे जोड़ रहे हैं तो महबूबा मुफ्ती ने राष्ट्रीय ध्वज का निरादर करके जहमत मोल ले ली है। आश्चर्य यह है कि केंद्र जिसने अलगाववादी सुरों के खिलाफ बहुत सख्ती अपना रखी थी अब इनके बयानों को कोई भाव नही दे रहा है।
सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भाजपा के मूल एजेंडे पर अमल की चुनौती थी जिसमें जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करना भी शामिल था। लेकिन 2014 में जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजों से जटिल परिस्थितियां बन गईं। पीडीएफ को कटटर अलगाववादी रुख की वजह से घाटी की सीटें थोक में मिल गई तो प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण से जम्मू इलाके में भाजपा ने जबर्दस्त परचम लहरा दिया। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिशंकु विधानसभा में गतिरोध का समाधान निकालने के लिए साहसिक प्रयोग का फैसला लिया। नतीजतन 2015 में भाजपा के समर्थन से 79 वर्षीय मुफ्ती मुहम्मद सईद ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और भाजपा के निर्मल सिंह उनकी सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गये। यह विपरीत ध्रुवों पर खड़े दलों का बेमेल गठबंधन था। जिसकी वजह से इसकी शुरूआत से ही इसके चलने के समय को लेकर अटकलें लगाई जाने लगी थीं। मुफ्ती मुहम्मद सईद जब तक जीवित रहे उन्होंने भाजपा पर हावी रहकर काम किया। आतंकवादियों और अलगाववादियों की निगाह में मुफ्ती की सरकार उनकी हमदर्द सरकार थी। इसलिए उनका सोचना था कि यह सरकार जितने ज्यादा दिन चलेगी उन्हें अपना उददेश्य मजबूत करने में सफलता मिलेगी। इसलिए जब तक मुफ्ती मुहम्मद जीवित रहे उग्रवादियों ने ऐसी वारदातों से बचने की कोशिश की जिससे उनकी सरकार पर कोई खतरा मंडराये। दूसरी ओर मुफ्ती मुहम्मद सईद इसके बदले में उग्रवादियों की रिहाई का इनाम देते रहे।
लेकिन 2016 में जब उनका निधन हो गया तो स्थितिया बदल गईं। उनके उत्तराधिकारी के तौर पर 4 अप्रैल 2016 को उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री का पद संभाल लिया। महबूबा अपने बालिद की तरह भाजपा पर हनक नही बना सकीं बल्कि भाजपा ने उन्हें अपने अरदब में ले लिया। इसके चलते उग्रवादियों का मोह भंग होने लगा और उनकी वारदातों में तेजी आने लगी। पाकिस्तानी फंडिग से सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की घटनायें आतंकवाद के नये ट्रेंड के रूप में बढ़ने लगीं। भाजपा ने दबाब बनाया पर महबूबा ने उपद्रवियों के दमन के लिए एक सीमा से ज्यादा जाना गंवारा नही किया। इससे सरकार में तनाव बढ़ता गया। जून 2018 में भाजपा में समर्थन वापसी के साथ ही महबूबा की सरकार का पतन हो गया। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा जिसके बाद राज्य में राज्यपाल का शासन थोप दिया गया।
मोदी सरकार जब पहले कार्यकाल में भाजपा के मूल एजेंडे पर अमल नही कर पायी थी तो सवालों के घेरे में आ गई थी। 2019 में इन्ही सवालों की विरासत के बीच मोदी सरकार ने दूसरी बार सत्ता संभाली जिसमें अमित शाह ने गृहमंत्री के पद का वरण किया तो उन्होंने एकदम अतिवादी रुख भाजपा के एजेंडे के लिए अख्तियार करने का निश्चय किया। इसकी तहत 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर के भविष्य के बारे में एतिहासिक फैसला करके अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी कर दिया गया। साथ ही जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त कर उसे दो केंद्र शासित क्षेत्रों में बांट दिया गया। इसमें लददाख को केंद्र के प्रशासक के अधीन रखा गया। जबकि जम्मू कश्मीर के बारे में तय किया गया कि वहां विधानसभा का अस्तित्व दिल्ली की तरह रहेगा। हांलाकि वीटों शक्तियां उप राज्यपाल में निहित रहेगीं।
इस बीच पंचों-सरपंचों के नेटवर्क क माध्यम से घाटी में केंद्र सरकार ने अपने समर्थकों का तंत्र खड़ा करने की कोशिश की लेकिन इसमें बहुत कामयाबी नही मिली। घाटी के नेताओं की लंबी नजरबंदी और सुरक्षाबलों के भारी-भरकम लश्कर की चप्पे-चप्पे पर पहरेदारी से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के लिए असहज सवाल पैदा हो रहे थे नतीजतन सरकार को अब राजनीतिक पहल के लिए सोचना ही था। मनोज सिन्हा की उपराज्यपाल पद पर नियुक्ति इस दिशा में उठाया गया पहला कदम रहा। इसके बाद प्रमुख नेताओं की रिहाई शुरू कर दी गई तांकि विधानसभा चुनाव के लिए वातावरण बनाया जा सके।
केंद्र सरकार ने पासा फेंक दिया है दूसरी ओर घाटी के विपक्षी नेताओं में हताशा की स्थिति है। पाकिस्तान को भारत पूरी तरह पस्त कर चुका है। इसलिए घाटी के नेताओं को यह मुगालता छोड़ना पड़ेगा कि पाकिस्तान घाटी को लेकर कोई दुस्साहस दिखा पायेगा। विश्व बिरादरी के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण में भी वर्तमान भारत सरकार ने बड़ी कामयाबी पाई है जिससे घाटी को लेकर वह किसी भी तरह के अंतर्राष्ट्रीय दबाव से परे है। जहां तक चीन का सवाल है उसकी हरकतों की एक सीमा है। मूल रूप से व्यापारिक देश है इसलिए किसी से युद्ध में नही उलझ सकता। भारत ने इस बीच बाहरी सैन्य गठबंधन बढ़ाकर भी चीन के मनोबल को प्रभावित किया है।
कुल मिलाकर घाटी के नेताओं को रास्ता न सूझने के हालातों का सामना करना पड़ रहा है। महबूबा अलगाववादियों के समर्थन की खोई जमीन फिर से पानी की कोशिश के लिए हाथ-पैर मार रही हैं लेकिन उनके सामने माया मिली न राम की स्थिति बनती जा रही है। तिरंगे के अपमान पर उनकी पार्टी में विद्रोह हो गया जिसमें तीन बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ने का फैसला घोषित कर दिया। घाटी के प्रमुख विपक्षी दलों ने संयुक्त गठबंधन जम्मू कश्मीर में पूर्व की स्थिति की बहाली के संघर्ष हेतु तैयार किया है। लेकिन साथ-साथ ये दल विधानसभा चुनाव में भाग लेने का भी संकेत दे रहे हैं। फारूख और महबूबा के बयानों को विपक्ष के खिलाफ भुनाने का फायदा बिहार के चुनाव में एनडीए को मिला है इसलिए भी केंद्र सरकार ने उन पर कोई सख्ती नही की है। जम्मू कश्मीर की नई स्थितियां अब एक हकीकत हैं। कभी केंद्र में सरकार भी पलट जाये तो इसमें बदलाव आने की गुंजाइश शायद ही पैदा होगी यह सच स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।

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