दलित प्रधानमंत्री की उम्मीद का दिया बुझा

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रामविलास पासवान के निधन से एक संभावनाशील राजनीतिज्ञ का अवसान हो गया है। उनकी राजनीति की शुरूआत जिस धमाकेदार ढंग से हुई उससे उनके बहुत दूर तक पहुंचने की उम्मीदें जताई जाती थी। हालांकि सफल राजनीतिज्ञ होते हुए भी वे अपनी मंजिल की पूर्णता का हासिल नहीं कर सके। उनका जाना राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का पटाक्षेप कहा जायेगा।
डा0 लोहिया ने कभी एक प्रतिमान स्थापित किया था जिसमें महारानी विजया राजे सिंधिया के खिलाफ महतरानी को उम्मीदवार के रूप में उतारा गया था। उन्होंने कहा था कि भारत में लोकतंत्र की पूरी कामयाबी तभी कही जायेगी जब किसी दिन महारानी के मुकाबले लोग महतरानी को चुन लेगें। डा0 लोहिया का यह कथन भारत की उपनिवेशवादी सामाजिक संरचना में लोकतंत्र का नापने का सटीक पैमाना बन गया था।
यह इत्तफाक नहीं है कि देश में अभी तक कोई दलित नेता प्रधानमंत्री के पद पर नहीं पहुंच पाया है। 1977 में मौका आया था जब पहली बार केन्द्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उस समय सबसे योग्य उम्मीदवार जगजीवन राम थे जिनके पास केन्द्र के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों के सफस संचालन का अनुभव था लेकिन चूंकि जनता पार्टी में मूल रूप से कुलक जातियों का वर्चस्व था, हालांकि इन जातियों का खुद का इतिहास वर्ण व्यवस्था के दंश भोगने से भरा पड़ा था लेकिन फिर भी उनकी दिलचस्पी इस व्यवस्था को बदलने की बजाय अपने से निचले पायदान पर खड़े तबके को ऊपर आने से रोकने की थी इसलिए जगजीवन राम को प्रधानमंत्री पद से रोकने के लिए वे उन मोरार जी देसाई के नाम पर सहमत हो गये जो बदमिजाज और अव्यवहारिक होने की पहचान रखते थे इसलिए जनता पार्टी की सरकार को विफलता का मुंह देखना पड़ा।
1980 में अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए जगजीवन राम का चेहरा आगे करके जनता पार्टी द्वारा चुनाव लड़ने की पहल हुई जो बहुत बड़ा जोखिम साबित हुई। लोग सारी खूबियों के बावजूद दलित होने के नाते जगजीवन राम को स्वीकार नहीं कर पाये जबकि कांग्रेस की लम्बी राजनीति में उन्होंने सर्व स्वीकार्य नेता का दर्जा बनाया था।
रामविलास पासवान में भी जगजीवन राम जैसी खूबियां थी। वे मुख्य धारा के स्थापति नेता थे और उनकी सोच में समग्रता थी। 1977 में जब वे सर्वाधिक वोटों से पहली बार लोकसभा के लिए चुने गये थे तो सदन में अपनी भाषण शैली की वजह से सारे देश में उन्होंने नायक जैसी छवि बना ली थी। इसीलिए सामाजिक न्याय के चक्र को पूर्ण करने के लिए वीपी सिंह ने उनको देश का पहला दलित प्रधानमंत्री बनवाने की मशक्कत की। पर जनता दल परिवार भी कुलक जातियों का था इसलिए 1996 में जब संयुक्त मोर्चा सरकार बनी तो जनता दल के दो प्रधानमंत्री बने फिर भी उनमें रामविलास पासवान की बारी नहीं आ पायी।
बाद में वीपी सिंह ने दलित सांसदों का फोरम बनवाकर इस अभियान को आगे बढ़ाने का तानाबाना बुना। इस जद्दोजहद से पहली बार केआर नारायणन के रूप में एक दलित शख्सियत राष्ट्रपति पद तो पहुंच गई लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति की धारा की विसंगतियों के चलते दलित प्रधानमंत्री बनाने का उनका सपना पूरा नहीं हो सका।
कुलक जातियों के दलितों को लेकर पूर्वाग्रह से रामविलास पासवान कालांतर में जनता दल परिवार में हजम नहीं हो पाये। लालू यादव भी कुलकों की इस ग्रन्थि से मुक्त नहीं थे इसलिए रामविलास पासवान को उनसे भी अलग रास्ता देखना पड़ा। अंततोगत्वा अस्तित्व रक्षा के लिए रामविलास पासवान भाजपा में शरणम गच्छामि हो गये। उनके बाद के राजनीतिक कदमों को लेकर मौसम विज्ञानी बताकर उन पर छींटाकशी की जाती थी लेकिन एक प्रखर दलित नेता की विडम्बना का अनुमान जिसे है वह रामविलास पासवान के साथ इस व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं बता पायेगा।
अब प्रधानमंत्री पद की दौड़ में फिलहाल कोई दलित नेता नजर नहीं आता। बसपा सुप्रीमों मायावती ने देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री बनकर पूर्वाग्रहों की चट्टान को कुछ हद तक तोड़ने का कीर्तिमान तो बनाया है लेकिन सिद्धांतहीनता और स्वेच्छाचारी स्वभाव की वजह से न केवल उन्होंने खुद राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का मौका खो दिया है बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीतिक धारा में बड़े बिखराव की जिम्मेदार बन गई हैं।
मायावती के पास पासवान की तरह राजनीतिक मुद्दों को लेकर सम्पूर्ण दृष्टि भी नहीं है और उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे विद्रोही नेता के लबादे से बाहर नहीं आ सकी हैं जिससे मुख्य धारा की राजनीति में उनका सहज स्थान नहीं बन पाया है। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने उनके साथ काफी विनम्रता से जब गठबंधन किया था तो नयी संभावनाओं ने जन्म ले लिया था। कुलक जातियों की राजनीतिक धारा ने इस गठबंधन में दलित नेतृत्व की सर्वोच्चता को स्वीकार करने का कदम आगे बढ़ाया था इसलिए इस क्रांतिकारी पहल को सहेजा जाना चाहिए था। सपा बसपा गठबंधन के कार्यकर्ता दोनों पार्टियों में इस अघोषित सहमति को देख रहे थे कि अगर विधानसभा चुनाव में गठबंधन कामयाब रहता है तो बहिन जी अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनने का मौका देंगी और बदले में केन्द्र की सत्ता का बागडोर भविष्य में उनके हाथों में दिलाने के लिए अखिलेश यादव काम करेंगे।
लेकिन विधानसभा चुनाव में गठबंधन की पराजय होते ही किसी भी तरह की प्रतिबद्धता में बंधी न होने की वजह से मायावती ने निजी निहित स्वार्थो के लिए यह गठबंधन तोड़ दिया। मायावती ने साबित कर दिया है कि वे कभी नहीं सुधरेंगी। नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जब अपनी नीतियों के कारण सारे देश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए सबसे बड़े खलनायक बने हुए थे तब मायावती धर्मनिरपेक्षता को अगूंठा दिखाते हुए उनका प्रचार करने गुजरात गयी थी। राज्यसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा का साथ पकड़ने के लिए वे बेनकाव हुई तो लोगों को बहुत धक्का लगा। उनकी पार्टी के विधायकों ने ही विद्राह कर दिया। सही बात यह है कि मायावती की पार्टी उत्तर प्रदेश तक में सिमट जाने के कगार पर पहुंच गई है तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी हैसियत क्या बची है। अब मायावती उम्र दराज भी हो चुकी हैं इसलिए उनके लिए अवसर भी कम रह गये हैं। कुल मिलाकर रामविलास पासवान के जिक्र में देश में दलित प्रधानमंत्री का मुद्दा जुबान पर आता रहेगा।