संवेदनशील शासन प्रशासन

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संवेदनशील शासन प्रशासन गुड गवर्नेंस की पहली शर्त है। यह ठीक है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समय-समय पर इसके लिए मुश्कें कसी हैं लेकिन इसके जमीनी परिणाम अभी तक बहुत फलदायी नहीं रहे हैं। इस बीच कोरोना की महामारी ने सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया था। हालांकि अभी भी इसका संकट टला नहीं है लेकिन कोरोना के साथ ही जीना सीखना होगा के मंत्र को आत्मसात करते हुए सरकार व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने मे जुट गई है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासन को लोगों के प्रति जबावदेही का अहसास कराने के लिए निर्देश जारी किये हैं जो स्वागत योग्य हैं।
इसके तहत सभी जिलाधिकारियों और जिला पुलिस प्रमुखों को आगाह किया गया है कि वे अपने मोबाइल का सरकारी नम्बर हर समय खुद उठाने की आदत डालें। यह निर्देश कागजी साबित होकर न रह जाये इसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय से समय-समय पर अधिकारियों को काॅल करके वास्तविकता चैक की जायेगी। मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि जो अधिकारी इसमें कोताही बरतते हुए पाये जायेगें उन पर तत्काल दण्डात्मक कार्रवाई होगी। उम्मीद है कि इसके बाद अधिकारी स्वयं सीओजी नम्बर न उठाकर मातहतों को पकड़ाने की गुस्ताखी नहीं करेंगे जबकि अभी कई जिलों से यह शिकायत आ रही थी कि डीएम एसपी अपने उच्चाधिकारियों और शासन के अधिकारियों के अलावा सीओजी नम्बर पर किसी का फोन अटैंड करना गबारा नहीं करते जिससे पीड़ितों को प्रभावी समाधान हासिल करने में कठिनाई हो रही है।
इसी तारतम्य में मुख्यमंत्री ने जन शिकायतों के ठोस निस्तारण के लिए भी अधिकारियों को आगाह किया है। जन सुनवाई पोर्टल और 1076 नम्बर पर की जाने वाली शिकायतों को अफसरों पर कुछ दिनों खौफ रहा लेकिन बाद में इसमें औपचारिकता होने लगी। तहसील दिवस की शिकायतें भी इसी तरह अधिकारियों की उपेक्षा की भेंट चढ़ रही हैं। जन शिकायतों पर गौर न होने से ही भ्रष्टाचार व शोषण उत्पीड़न बढ़ता है। कोढ़ में खाज की स्थिति तब पैदा हुई जब यह धारणा बनने लगी कि अधिकारियों के खिलाफ जन प्रतिनिधियों तक की शिकायतों पर शासन में गौर नहीं होता। इस रवैये ने अधिकारियों को निरंकुश बना दिया है। मुख्यमंत्री पर भी अफसर शाही को जरूरत से ज्यादा सिर चढ़ाने का आरोप लगने लगा था। निश्चित रूप से कोरोना काल की आपाधापी के कारण इसके अनर्थकारी परिणामों को जानते हुए भी मुख्यमंत्री इस पर ध्यान नहीं दे पा रहे थे। इधर कुछ दिनों पहले प्रदेश मंे हुए विधानसभा उप चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी को जो भारी सफलता मिली है उससे उनमें नये उत्साह का संचार हुआ है। लोगों ने मुख्यमंत्री के प्रति जो विश्वास और समर्थन व्यक्त किया है उसे सहेजने के लिए अब वे सक्रिय हो उठे हैं। मुख्यमंत्री ने साफ कह दिया है कि डीएम और एसपी कैम्प कार्यालयों में रहने की वजाय ज्यादा समय अपने कार्यालयों में बैठने में दें ताकि दूर-दराज से आने वाले पीड़ितों को उनसे अपनी बात कहने में कठिनाई का सामना न करना पड़े। अगर जन शिकायतों का त्वरित और सार्थक निस्तारण होने लगे तो प्रशासन का कचरा साफ होने में देर नहीं लगेगी। शासन से जो नोडल अधिकारी जिलों में भेजे जाते हैं उनसे भी कहा जाना चाहिए कि वे अपने दौरे में पीड़ितों की सुनवाई के लिए भी समय निर्धारित रखे इससे शासन अवगत होता रहेगा कि अमुक जिले में लोगों की समस्यायें हल की जाने की स्थिति क्या है। मुख्यमंत्री के तेवरों से लगता है कि अब सचमुच प्रशासन साफ सुथरा बनेगा। विश्लेषकों को भी इस मामले में उनके इरादे फलीभूत होने की शुभाषा करनी चाहिए।

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