पश्चिम बंगाल में क्या सचमुच आ रही है भाजपा की सुनामी

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जनता पार्टी की सरकार में मुख्य रूप से सोशलिस्ट घटक के जो नेता थे वे कहते थे कि उन्हें विरोध करना तो आता है लेकिन सरकार चलाना उनके बूते की बात नहीं है। इसलिए वे सरकार में रहे तो सरकार का बंटाढ़ार हो जायेगा। राजनारायण ने अपने बारे में यही बताते हुए खुद को सरकार में शामिल न करने का आग्रह कर रहे थे पर उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई ने सोचा कि अगर वे सरकार से बाहर रहे तो अपनी विध्वंसक ऊर्जा से सरकार को जल्द ही तबाह कर देंगे और मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया तो शायद वे दायित्व से बंधकर संयमित हो जायें। विषयांतर हुआ जा रहा है इसलिए यह प्रसंग यहीं रोकता हूं। कहने का भाव यह था कि कुछ लोग विरोध के इतने अभ्यस्त होते है कि खुद के हाथ में व्यवस्था आ जाये तो उसे भी विरोध की आदत के चलते तोड़फोड़ डालें। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस ताजा उदाहरण हैं। विरोध में रहते हुए उन्होंने जबरदस्त क्रांतिकारी तेवर दिखाये थे। तत्कालीन वाममोर्चा सरकार का दमन चक्र उनके साहस को हिला नहीं सका था। अंततोगत्वा उनके विद्रोह के तेज में राज्य का मजबूत वामपंथी किला झुलस कर खाक हो गया। लेकिन राज्य की सरकार की बागडोर हाथ में आ जाने के बाद भी ममता बनर्जी ने अपने तेवर नहीं बदले जो अब उनको भारी पड़ रहा है।
केन्द्र से उनका टकराव सनातन स्थिति बन गया। दिल्ली में शुरूआत में अरविन्द केजरीवाल का भी रवैया यही था। लेकिन उन्हें समझ में आ गया कि सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी का निर्वाह नकारात्मक छवि बनाकर नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसके बाद अपना रवैया बदल लिया और केन्द्र से अनावश्यक टकराव छोड़कर चुपके से अपनी सरकार के बेहतर संचालन में लग गये। दूसरी ओर अपनी जिद को लगातार उग्र बनाते हुए ममता बनर्जी ने दस वर्ष के अपने शासन को कुशासन का पर्याय बना दिया है। उस पर अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस में सीनियर नेताओं के ऊपर थोपकर उन्होंने पार्टी में असंतोष के बहुत बीच बो लिये। शुभेन्दु अधिकारी को कभी तृणमूल कांग्रेस में नम्बर दो पर माना जाता था। पार्टी के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। पर अभिषेक बनर्जी के कारण ही उनका दीदी से मोहभंग हो गया। शुभेन्दु अधिकारी का भाजपा में शामिल होना चुनाव के ठीक पहले ममता बनर्जी के लिए काफी बड़ा झटका है क्योंकि शुभेन्दु अधिकारी का राज्य के व्यापक हिस्से में प्रभाव माना जाता है। उनके पिता शिशिर अधिकारी यूपीए-2 में केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं। अभी भी उनके पिता और भाई सांसद हैं। लगभग 60 विधानसभा सीटों पर उनका असर बताया जाता है। मेदनीपुर की केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभा में जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा की तो उनके साथ तृणमूल के सात विधायक और एक सांसद भी भाजपा में समा गये। खबर है कि कई और विधायक भी उनके साथ तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल होने को तैयार थे पर उन्हें फिलहाल रोक दिया गया है। बताते हैं कि केंन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल में सत्ता पलट के लिए बारीक रणनीति पर काम कर रहे हैं। ममता बनर्जी की पार्टी के पतन की धारणा को चुनाव के पहले पूरी मजबूती से फैलाने के लिए वे चाहते हैं कि किस्तों में तृणमूल के विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करने का धारावाहिक अभियान चलाया जाये। इससे भाजपा की सुनामी का आभास पैदा होगा और ममता बनर्जी और उनके सहयोगियों का मनोबल गिरता चला जायेगा।
अमित शाह समकालीन राजनीति में सबसे बड़े चाणक्य बनकर उभरे हैं। बिहार विधान सभा चुनाव में स्वास्थ्य के कारण से वे समय नहीं दे पाये थे तो उनकी पार्टी को मुश्किलें पेश आयी थी लेकिन पश्चिम बंगाल में समय रहते उन्होंने अपने अश्वमेध का घोड़ा दौड़ा दिया है इसका असर सामने है। वे हर महीने बंगाल का दौरा करेंगे। ममता को समझना चाहिए कि आक्रामकता और हठधर्मिता की एक सीमा है। सार्वजनिक जीवन के व्यवहार में शील का अपना महत्व है अगर वे गच्चा खाती हैं तो यह उनकी नादानी के कारण होगा। पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से 200 सीटें हथियाने का लक्ष्य अमित शाह ने साधा है जो अगर चरितार्थ होता है तो यह चमत्कार ही होगा और अमित शाह की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

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