यूपी की लुटेरी पुलिस

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गोेरखपुर में दो सर्राफा व्यापारियों से पुलिस कर्मियों द्वारा लूटपाट करने की घटना स्तब्ध कर देने वाली है। लोगो की सुरक्षा का बोझा उठाने वाली पुलिस ही जब उन्हें लूटने लग जायेगी तो तंत्र की विश्वसनीयता कहां रह जायेगी। इस मामले मंे शामिल बस्ती के एक दरोगा और दो सिपाहियों सहित 6 लोगो को गिरफ्तार किया गया है। यह घटना पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुयी है।
घटनाक्रम के अनुसार गत 21 जनवरी को गोरखपुर बस स्टैण्ड पर आयकर अधिकारी बनकर पहुंचे दरोगा धर्मेन्द्र यादव और दो सिपाहियों महेन्द्र यादव व संतोष यादव ने बस के अन्दर से दीपक वर्मा और रामू वर्मा नाम के व्यापारियों को जांच के लिये आयकर अधिकारी बनकर उतार लिया और फिर नौसड के पास इनसे 19 लाख रूपये नगद और 12 लाख रूपये की सोना चांदी लूटकर चम्पत हो गये । बाद में व्यापारियों ने जब इसका मुकदमा सम्बन्धित थाने में लिखाया तो सीसीटीवी कैमरे से इनकी पहचान उजागर हो गयी । तीनों पुलिस कर्मी ेंकई बार ऐसी धोखाधडी कर चुके थे इसलिये इनको शार्टकट मंें इस तरह भारी कमाई करने का चस्का लग गया था। पकडे जाने के बाद इन्होने बताया कि हाल में 31 दिसम्बर को भी इन्होने एक व्यापारी सुशील वर्मा से कस्टम अधिकारी बनकर 4 लाख रूपये की चांदी लूटी थी । इनकी तैनाती बस्ती में थी पर लूटपाट मंे लगातार कामयाबी मिलने से इनके हौंसले इतने बुलन्द हो गये थे कि ये लोग दूसरे जिलों में भी हाथ पैर मारने से नहीं डरते थे।
घटना के बाद गोरखपुर के एसएसपी जोगिन्दर सिंह ने इस मामले में जहां घटना हुई थी वहां के इन्स्पेक्टर अवधेश राज सिंह सहित 8 पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया । चूंकि राष्ट्रीय राजमार्ग पर इस घटना को अन्जाम दिया गया फिर भी पुलिस को पता नहीं चला जो पुलिसिंग की बहुत बडी कमजोरी को उजागर करता है। इसीलिये इन पुलिस कर्मियों पर यह गाज गिरी ।
उधर बस्ती के गिरफ्तार किये गये पुलिस कर्मियों के सहयोगियों में इनके दो मुखबिर शैलेश यादव और दुर्गेश अग्रहरि को भी इनके साथ पकडा गया है। इनमें से एक छद्म पत्रकार था और पुलिस कर्मियों को बिना कागज के सोना चांदी लेकर जा रहे व्यापारियों की लोकेशन देता था । इनके पास से लूट की पूरी रकम, सोना चांदी और जिस बुलेरो गाडी से तीनोें पुलिस कर्मी व्यापारी के पास पहुंचे थे उसे भी बरामद कर लिया गया । गौरखपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने कहा है कि इन पर रासुका लगाया जायेगा।
कहने को तो तीनों के खिलाफ कार्रवाई से मामले का पटाक्षेप हो गया है लेकिन ऐसा नहीं है। खाकी में छुपे अपराध का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। बहुत पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आनन्द नारायण मुल्ला ने पुलिस को अपराधियों का संगठित गिरोह कहा था तब से गोमती नदी में बहुत पानी बह चुका है लेकिन यूपी की पुलिस में घुसपैठ किये हुये अपराधी तत्वों की सफाई अभी भी नहीं हो पायी है।
योगी सरकार ने जब प्रदेश का निजाम सम्भाला था तब उन्होने पुलिस की काली भेंडों को संगठन से बाहर करने की सरगर्मी शुरू की थी । पुलिस के अधिकारियों को अपराधियों से साठगांठ रखने वाले और हैसियत से ज्यादा माल बनाने वाले पुलिस कर्मियों की पहचान करके बर्खास्त करने का अभियान चलाने के लिये कहा गया था लेकिन कार्रवाई के नाम पर उन्होने केवल बाजीगरी की। जिन पुलिसकर्मियों की बर्खास्तगी की फायल पहले से मूव थी उन्ही पर दस्तखत करके आंकडे बटोर लिये गये ।
दरअसल अधिकारियों को वही पुलिस कर्मी प्रिय लगते है जो शातिर हो क्योंकि माल उन्हीं से मिलता है। पुलिस में सरकारी बजट का वारा न्यारा करके माल काटने का कोई स्कोप नहीं है। इसलिये अधिकारियों की यह गुणग्राहकी की परिणति पुलिस के अपराध का औजार बन जाने के रूप में होती है।
गोरखपुर की घटना पुलिस में अधिकारियों के स्तर पर मानीटरिंग में चूक का नतीजा है। सरकार में कसावट की कमी भी इसका एक कारक है। सरकार में क्षमता अगर हो तो पुलिस और सभी विभागों में अधिकारियों को चैतन्य रहना पडेगा पर सरकार इस मामले मेें विफल साबित हो रही है। बस्ती के दरोगा अपने सिपाहियों के साथ थाने के रोेजनामंचे में रवानगी डाले बिना दूसरे जिले में लूटपाट करने चले जाते थे। अगर बस्ती के एसपी , एडीशनल एसपी , सीओ आदि की मानीटरिंग चुस्त होती तो क्या ऐसा सम्भव था ।
पुलिस के जिन्न को अगर काम का बनाना है तो इसके अफसरों पर कडाई करना जरूरी है ताकि वे बेईमान न हो पाये। थानों की नीलामी के कई मामले इस सरकार में खुले और इसे लेकर कई जिला पुलिस प्रमुखों को नप जाना पडा फिर भी यह गन्दा दस्तूर बन्द नहीं हो सका । आखिर क्या कारण है कि यह सरकार मौका पडने पर कडी कार्रवाई करने के बाबजूद ऐसा प्रभाव नहीं छोड पा रही है जिससे अफसरशाही अपनी आदतें सुधारने को मजबूर हो जाये। पुलिस अधिकारी इतना अधिक माल बना रहे है कि किसी भी कीमत पर आमदनी से अधिक सम्पत्ति के कानून से बच नहीं सकते बशर्ते आयकर विभाग , एन्टी करप्शन , विजिलेंस , ईओडब्ल्यू आदि तंत्र सिर्फ सफेद हाथी न हों । अगर इन विभागों की निगरानी को योगी सरकार ने चुस्त किया होता तो पुलिस के अधिकारी अपनी करतूतों से बाज आ गये होते । इस मामले में सतत सक्रियता की जरूरत है जिसका योगी सरकार में नितांत अभाव होगा। अफसर ठीक हो जायेगें तो पुलिस का नीचे का तंत्र वे खुद ही बेलगाम नहीं होने देगें।
बस्ती के चैकी इंचार्ज का लुटेरे के रूप मंे अवतार अचानक नहीं हुआ होगा । दरअसल जो पुलिस कर्मी इतनी जुर्रत कर सकते है वे रूटीन के कामकाज में भी संयम नहीं बरतते । लोग त्रस्त होकर उनकी शिकायत करते है पर कोई सुने तब न । जब ऐसे लोग महकमा और सरकार की नाक ही कटवा दे तब जिम्मेदार चेत पाते है। बहरहाल गौरखपुर की घटना से सरकार को काफी शर्मसार होना पडा है इसलिये अब उसे खबरदार हो जाना चाहिये । केवल फरमान जारी करने तक सीमित न रहकर उसे इस बात में जोर लगाना होगा कि उसके निर्देशो के अनुपालन में कोई ढिलाई न हो जबकि अभी तो हालत यह है कि सरकार कह कह कर थक चुकी है कि थानाध्यक्षों की नियुक्ति में मानको का पालन हो लेकिन अधिकारियों को इसकी कोई परवाह नहीं है। यह तो सिर्फ कोताही की एक बानगी भर है।

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