किसानांे की टैªक्टर परेड में हुयी हिंसा क्या पूर्व नियोजित साजिश थी ?

20191128_121956
IMG-20200820-WA0008
IMG-20200831-WA0002
IMG-20200831-WA0003
IMG-20210112-WA0003

पिछली 26 जनवरी को देश की राजधानी में किसानो की टैªक्टर परेड के दौरान हुयी कुछ अप्रिय घटनाओं के बाद कृषि कानूनों के खिलाफ 62 दिन से चल रहे आन्दोलन की तस्वीर अचानक पलट गयी है। इन घटनाओं को जिस तरह प्रदर्शित किया गया है उसके कारण आन्दोलनकारी किसान अपराध बोध के गर्त में जा गिरे हैं। 1 फरवरी को संसद कूच का कार्यक्रम प्रायश्चित के इसी भंवर के कारण टाल दिया गया है। किसान हतोत्साहित नजर आ रहे है जिससे आन्दोलन बिना कुछ हासिल किये कमजोर पड गया है। कुछ राजनैतिक प्रेक्षक इसे खतरनाक बता रहे है। वे इशारा कर रहे है कि इतना लम्बा आन्दोलन जिसमें तकरीबन 70 किसान शहादत दे चुके है की नाकामी के बाद किसान जब खाली हाथ घर लौटेगे तो उनकी पीडा कितनी गहरी होगी इसका अन्दाजा किया जाना चाहिये । इसी को लेकर कई बुद्धिजीवी यह इशारा करने से नहीं चूक रहे है कि गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में आईटीओ और लाल किले पर जो कुछ हुआ किसान उसके लिये कतई जिम्मेदार नहीं है। यह घटनायें सुनियोजित साजिश का नतीजा है जिसकी परते धीरे धीरे खुलेगी ।
गणतंत्र दिवस की टैªक्टर परेड में लगभग 1 लाख टैªक्टर शामिल थे जिनमें लगभग 5 लाख लोग शिरकत कर रहे थे। इस भीड मंे तकरीबन 1 लाख महिलायें और बच्चे थे। यह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व था कि इतने विशाल आन्दोलन मे व्यापक तौर पर कहीं कोई बदअमनी नहीं हुयी। फिर लाल किले पर धार्मिक झण्डा फहराने और आईटीओ पर तोड फोड व पुलिस पर हमले की घटनाये कैसे हो गयी यह एक पहेली है। मुख्य धारा की मीडिया ने शुरू से किसान आन्दोलन को लेकर पूर्वाग्रह पूर्ण रिपोर्टिग की इसलिये अगर यह कहा जाये कि 26 जनवरी की घटनाओं को लेकर भी मुख्य धारा की मीडिया ने किसानों को बदनाम करने के इरादे से सलेक्टिव रिपोर्टिंग की तो इसे सोशल मीडिया पर आये तथ्यों की रोशनी मंे गलत नहीं कहा जा सकता है।
लालकिले पर झण्डा फहराने वाले युवक दीप सिद्धू के बारे में पहले दिन मुख्य धारा की मीडिया में कोई भी जानकारी नदारत थी जबकि सोशल मीडिया पर उसकी फेसबुक प्रोफाइल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और अन्य प्रमुख भाजपा नेताओ के साथ प्रदर्शित तमाम तस्वीरे तैरने लगी थी जिन्हें मीडिया ने जानबूझकर नजरअन्दाज किया। पता चला है कि दीप सिद्धू पंजाबी फिल्म एक्टर है जिसकी पहली फिल्म धर्मेन्द्र ने निर्देशित की थी । गुरूदासपुर से सनी देवल ने जब लोकसभा का चुनाव लडा तो यही दीप उनका चुनाव संचालक था हांलाकि सनी देवल अब इससे इन्कार कर रहे है। उधर लाल किले पर धार्मिक झण्डा फहराये जाने की घटना के पीछे दीप के अलावा असल मास्टर माइण्ड लखवीर सिह उर्फ लाखा सिधाना को सोशल मीडिया पर बताया जा रहा है। लाखा पंजाब के टाॅप गैंगस्टरों की सूची में सबसे ऊपर है। उसके ऊपर हत्या डकैती के कई मामले है हालांकि उसे सजा केवल आम्र्स एक्ट के एक मामले में हुयी है। 2006 में लाखा को गोली लग गयी थी जिसके बाद उसने राबिनहुड टाइप इमेज बनाने के लिये परोपकारी कार्य शुरू कर दिये थे। पंजाब में अकाली सरकार के समय मंत्री रहे सिकन्दर सिंह मलूक के साथ भी उसके नजदीकी रिश्ते जग जाहिर रहे। लाल किले की घटना में पहचाने गये 22 उपद्रवी इसी लाखा की गैंग के मेम्बर है।
जहंा तक इनके किसान आन्दोलन में शामिल होने का प्रश्न है इसे लेकर कुछ और ही तथ्य सामने आये है। दिसम्बर में जब इसने आन्दोलन में भागीदारी की तो इसे एनआईए ने नोटिस जारी कर दिया क्योंकि इसका सम्बन्ध कनाडा के उग्रवादी संगठन सिख लिबर्टी से था और जस्टिस फाॅर सिख से भी इसे सम्बद्ध पाया गया था। इसके कारण किसानों ने इसे अपने मंच से खदेड दिया । 23 जनवरी को फिर किसानों ने इसे और लक्खा को अपने आन्दोलन से भगा दिया था । इसके बाद दोनो दिल्ली में रहे । राजधानी में यह किन किन से मिले और किनके कहने से इन्होने लाल किले पर झण्डा फहराने की प्लानिंग की यह जांच का विषय है। इससे स्पष्ट है कि किसानों के मुख्य आन्दोलन से दीप और लक्खा के तार नहीं जोडे जा सकते है। किसानों की परेड को नियंत्रित करने के लिये दिल्ली पुलिस के 50 हजार जवान तैनात किये गये थे इसके अलावा सीआरपीएफ की 28 बटालियनें थी । बीएसएफ की 17 और आईटीबीपी की 11 बटालियन भी नाकेबन्दी में उतारी गयी थी। इतने बडे तामझाम के बाबजूद लक्खा और दीप को लाल किले में जाने से नहीं रोका जा सका यह आश्चर्य की बात है। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का तो कहना यह है कि पुलिस ने इनके मूवमेन्ट को लेकर जिस तरह की उदारता प्रदर्शित की उससे लग रहा था कि पुलिस इनके सहयोग में है। जो भी हो आईटीबी पर जो दंगा हुआ उसे लेकर भी सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियों वायरल हुये जो बताते है कि बसों में तोडफोड करने वालों को जब कुछ सिक्खों ने पकड लिया तो उनके पास से दिल्ली पुलिस के पहचान पत्र मिले हालाकि इसकी पुष्टि नहीं हुयी है।
गौर करने लायक तथ्य यह भी है कि अभी तक दीप और लक्खा के खिलाफ कोई मुकदमा कायम नहीं हुआ है जबकि मेधा पाटेकर , योगेन्द्र यादव और राकेश टिकैत के खिलाफ पुलिस पर जान लेवा हमला करने सहित संगीन धाराआंे के कई मुकदमें दर्ज कर लिये गये है। इस पर टिप्पणी यह की गयी है कि सरकार और दिल्ली पुलिस किसान आन्दोलन की अहिंसक धुरी समझे जाने वाले नेताओ को जेल के अन्दर करना चाहती है जबकि ऐसा करना घातक साबित हो सकता है। आशंका यह है कि इससे किसानों का आन्दोलन कहीं अराजक न हो जाये।
दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सन्देह इसलिये किया जा रहा है क्योंकि उसने जामिया और जेएनयू के आन्दोलनों को भी इसी प्रकार की साजिशों से तितर बितर किया है। बहरहाल गणतंत्र दिवस की घटनाओं से किसानों में पस्ती देखी जा रही है। भानु गुट ने अपने को आन्दोलन से अलग कर लिया है हांलाकि कहा यह जा रहा है कि भानु गुट के नेता पहले से ढुलमुल थे । उन्होने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से उनके आवास पर मुलाकात की थी जिसके बाद वे इतने गदगद थे कि यह बोल उठे थे कि उनको आन्दोलन से क्या लेना देना है। 1 फरवरी का संसद कूच का ऐलान भी वापिस ले लिया गया है। अब 30 जनवरी को महात्मा गांधी के बलिदान दिवस पर किसान उपवास मात्र करेगें। दिल्ली की सीमाओ पर चल रहे किसानो के धरनों में भागीदारी भी अचानक काफी घट गयी है। क्या किसान आन्दोलन निराशा जनक परिणति के साथ विसर्जित हो जायेगा।

0 0 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments