महामारी और नए-नए मणिकर्णिका!

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पिछले साल जब अदृश्य वायरस कोरोना के हमले का शोर दुनिया के अन्य देशों में सुनाई देता हुआ भारत में आया था, तब सरकार ने इस महामारी से अपनी अवाम को बचाने के लिए पूरे देश में एक साथ लॉकडाउन लगा दिया था. माना और प्रचारित यही किया गया की देश को जनहानि से बचाने का एकमात्र रास्ता यही था. यह सच भी था.  लॉकडाउन अर्थव्यवस्था के लिए भले ही घातक साबित हुआ हो लेकिन इंसानों की जान को उतना नुकसान नहीं उठाना पड़ा जितना दुनिया के अन्य देशों से खबरें उस समय आ रही थी.
उस लॉक डाउन के दौरान ही कुछ ऐसे वीडियो भी वायरल हो रहे थे, जिनमें 2020 से साल 2021 में इस महामारी का प्रकोप ज्यादा होने की भविष्यवाणी की जा रही थी. ऐसी एकाध खबरें भी सामने आई लेकिन तब इन पर यकीन करना मुश्किल था. साल 2021 के 3 महीने बीतते-बीतते महामारी की नई मार शुरू हो गई और 1 महीने के अंदर ही महामारी से होने वाली मौतें पिछले साल से ज्यादा संख्या में पहुंच गई. अभी भी महामारी का प्रकोप थमने का कोई ऐसा अनुमान सामने नहीं आ रहा है, जिस पर दिल आंख मूंद कर भरोसा कर ही ले.
महामारी से हो रही “मौतों” का सरकारी रिकॉर्ड कुछ भी बोले या कहे लेकिन सच यह है कि शहरों से लेकर गांवों तक मौतों का जो अंबार लग रहा है, उसकी झलक श्मशान घाट पर ही देखी या महसूस की जा सकती. पौराणिक कथाओं में पूरे भारतवर्ष में केवल काशीनगरी का मणिकर्णिका घाट ही मोक्ष प्रदायिनी है. यही एक ऐसा शमशान है, जिसे महाशमशान कहा या माना जाता है. मान्यता यह भी है कि मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार व्यक्ति को मोक्ष प्रदान करता है और भगवान शिव यही जीव को कान में तारक मंत्र देकर पुनर्जन्म से मुक्त करते हैं. पूरे भारत का यह अकेला महा श्मशान है, जहां दिन-रात चिता जलती रहती है. मोक्ष की चाह मैं काशी नगरी के निवासी तो मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार की इच्छा रखते ही है कई अन्य जनपदों और प्रदेशों के सनातनी व्यवस्था में आस्था रखने वाले या साधन संपन्न लोग भी ऐसी इच्छा व्यक्त करते हुए देह त्याग करते हैं. यही वजह है कि मणिकर्णिका में एक चिता बुझती नहीं है उसके पहले दूसरी जल जाती है और तीसरी, चौथी, पांचवी घाट पर अंतिम संस्कार के लिए कतार में रखी रहती है.
कोरोना महामारी से होने वाली मौतों की मजबूरी से अब नगर-नगर नए “मणिकर्णिका” घाट सरीखे कई कई घाट अस्तित्व में आ चुके हैं. कानपुर, आगरा, बरेली, गोरखपुर, प्रयागराज, मेरठ मुरादाबाद, जयपुर, भोपाल, मुंबई, दिल्ली आदि लगभग सभी बड़े शहरों से ऐसी भयानक खबरें सामने आई और आती ही जा रही है कि श्मशान घाटों में दिन-रात चिताएं जलाए जाने के बावजूद कतारें कम नहीं हो रही. लोगों को अपने प्रियजनों के शवों के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाटों पर 12-12 घंटे इंतजार करना पड़ा है. कई नगरों में तो अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाटों की देखरेख करने वाली कमेटियों या नगरीय निकायों को “टोकन व्यवस्था” तक लागू करनी पड़ी.
बरेली के तीन श्मशान घाटों में दिन-रात चिता जलाए जाने के बावजूद जब शवों का आना बंद नहीं हुआ तो श्मशान घाट कमेटी को गेट पर ताला बंद कर यह तक नोटिस लगानी पड़ गई-” हम भी इंसान हैं. दिन-रात खटकर कब तक अंतिम संस्कार कराते रहे.” कुछ तो ऐसी खबरें भी आई जिन्हें पढ़ या सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मीडिया के माध्यम से ही यह सच भी सामने आ चुका है कि कुछ लोगों को रिश्वत देकर अपने प्रिय जनों के शव का अंतिम संस्कार श्मशान घाट पर कराना पड़ा. नगर-नगर अस्तित्व में आए यह “मणिकर्णिका” मोक्ष दे या ना दे मगर इतना तो जरूर कर रहे हैं कि संक्रमित शवों को जलाकर आने वाली नस्लों को महामारी से बचाने का उपाय कर रहे हैं.
सवाल यह नहीं है कि महामारी से मरने वाले को मोक्ष मिला या नहीं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि महामारी के झपट्टा से हो रही मौतों से तमाम तरक्की के बावजूद हमारे संसाधन हर मोर्चे पर ना के बराबर ही साबित हुए हैं. मसला, इलाज के लिए दवा से लेकर ऑक्सीजन और अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी के प्रबंध तक से जुड़ा है. इसलिए अभी भी समय है कि हम हम इस महामारी को हल्के में कतई न ले. बचाव के उपाय प्रारंभिक तौर पर सरकार या अन्य प्रामाणिक संस्थाओं द्वारा बताएं और सुझाए जा रहे हैं, उन पर भरपूर अमल शुरू कर दे. लक्षण देखते ही खुद को बचाए. खुद के लिए न भी सही कम से कम खुदा और अपने परिवार-समाज को बचाने के वास्ते ही तत्पर हो जाएं. नहीं तो जान ले महामारी में मरना भी अब एक तरह से “अपराध” सा हो चुका है. यह एक ऐसा अपराध है, जिसमें आप खुद मरते हैं और अपने प्रिय जनों को अपने पीछे जिंदा “मरने” के लिए छोड़ जाते हैं. यह आपको-हमको तय करना है कि खुद मरे या अपने प्रियजनों को भी जिंदा मार कर जाएं. सरकारों के लिए तो हम आप एक आंकड़ा भर हैं आज के जिंदा या मर जाने से सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. हां! देश को जरूर आप आबादी रूपी अभिशाप से मुक्ति या मोक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दे रहे होंगे.
◇ गौरव अवस्थी
     रायबरेली (उ.प्र.)
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(लेखक गौरव अवस्थी उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं | ढाई दशक से हिन्दुस्तान से जुड़े हैं | इसके पहले अमर उजाला में रहे थे | )