उप्र में पंचायत चुनाव…………………………………………घाव करें गंभीर

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उत्तर प्रदेश में हालिया संपन्न हुए पंचायत चुनाव जिनको विधानसभा के एक वर्ष से भी कम समय बाद होने वाले आम चुनाव के सेमी फाइनल के बतौर देखा जा रहा था, में सत्तारूढ़ भाजपा को अप्रत्याशित रूप से बेहद करारा झटका लगा है जिसकी जबावदेही से उसका भाग निकलना मुमकिन नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की मजबूत पकड़ का बहुत कुछ दारोमदार उत्तर प्रदेश पर ही टिका है जिसमें सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें हैं और भाजपा व उसके सहयोगी दल इनमें से 61 सीटों पर परचम लहरा रहे हैं। स्पष्ट है कि ऐसी हालत में उत्तर प्रदेश में पार्टी की जमीन खिसकने का कितना भी परोक्ष और दूर का इशारा उसके नेतृत्व की हुलिया बिगाड़ सकता है।
गत विधानसभा चुनाव से अभी तक उत्तर प्रदेश में जो चुनाव हुए हैं उन सभी में भाजपा ने कमोबेश एकतरफा प्रदर्शन किया है। लेकिन पंचायत चुनाव इसमें अपवाद साबित हुए हैं जिन्होंने भाजपा की प्रदेश में पूरी चमक पर पानी फेरकर रख दिया है। भाजपा के प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह ने लखनऊ में इन चुनावों के नतीजों की बारीक समीक्षा के लिए चार दिन डेरा डालकर जता दिया है कि पार्टी इस झटके को कितनी गंभीरता से ले रही है।
प्रदेश विधानसभा में भाजपा तीन चैथाई स्थानों पर कब्जा जमाये हुए है जबकि जिला पंचायत की सीटों में उसे एक चैथाई भी नसीब नहीं हुई। यह फांसला भाजपा के ग्राफ के प्रदेश में अचानक सबसे नीचे आ गिरने का सूचक बन गया है। ऐसा नहीं है कि इस मामले में सिर्फ भाजपा के सूरमाओं की गफलत रही हो सच्चाई तो यह है कि प्रदेश की राजनीति की नब्ज पर पकड़ रखने वाले माहिर विश्लेषक तक इस गिरावट को नहीं भांप पाये थे।
हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में लोकसभा के जो उपचुनाव हुए उनमें भाजपा को किरकिरी झेलनी पड़ी थी। लेकिन बाद में वह ऐसे सरपट दौड़ने लगी कि दूर-दूर तक किसी का पीछे दिखना बंद हो गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा द्वारा गठबंधन कर चुनाव लड़ने के बावजूद उसका बाल बांका नहीं हो सका और भाजपा फिर 300 से ज्यादा विधानसभा खंडों में आगे रही। गत वर्ष नवम्बर में सात विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए तो भाजपा ने 6 पर विजय पताका फहरा दी। केवल एक सीट समाजवादी पार्टी के हाथ लग सकी।
ऐसे में कैसे कल्पना की जा सकती थी कि चंद महीनों में ही उसका रसूख इस कदर तबाह हो जायेगा। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा के प्रतिद्वंदियों ने इस बीच बड़ी कारगुजारी कर दिखाई हो। समाजवादी पार्टी जो जिला पंचायत चुनावों में सबसे आगे जा पहुंची है, ने बड़े अनमने ढ़ंग से इसकी तैयारियां की थी। सत्य तो यह है कि समाजवादी पार्टी के कर्णधार भी अपनी इस उपलब्धि को अप्रत्याशित अनुभव करके अंदर ही अंदर आश्चर्य का अनुभव कर रहे हों। राजनीतिक प्रेक्षकों को भी सत्तारूढ़ पार्टी के इस कदर पिछड़ने का आभास नहीं हो पाया था इसलिए बहुत लालबुझक्कड़ी अंदाज में उसके पतन के कारणों पर मंथन हो रहा है।
कई वजह इसे लेकर गिनाई जा रही हैं। सबसे प्रमुख वजह के रूप में किसान आंदोलन को दिखाया जा रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक कि उत्तर प्रदेश में हालांकि इस आंदोलन ने ज्यादातर इलाकों में कोई बड़ा गुल नहीं खिलाया था लेकिन शायद इसका अंडर करेंट काम कर रहा था जिसकी वजह से किसान बिना मुखर हुए भाजपा को श्रापित करने पर उतारू हो गये थे। लेकिन इस संदर्भ में एक सवाल यह है कि अगर ऐसा था तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ ज्यादा आंदोलनरत रहे जिलों में भाजपा को सफलता कैसे मिल गई।
योगी के नेतृत्व के प्रति ब्राह्मणों की नाराजगी की भी इन परिणामों में भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस मामले में भी विपर्यास यह है कि जब बिकरू कांड की तपिश ताजा थी तब विधानसभा के उप चुनावों में भाजपा कामयाब कैसे रही थी। योगी आदित्यनाथ जिस पूर्वांचल से आते हैं वहां की राजनीति का ब्राह्मण क्षत्रिय अदावत से गर्मनाल का रिश्ता है बावजूद इसके उनकी मानसिकता में वर्ण व्यवस्थावादी सोच हावी है। जिसका प्रदर्शन अधिकारियों की पोस्टिंग में उन्होंने किया जिसके चलते दलित व पिछड़े वर्ग के अधिकारियों को दोयम दर्जे पर धकेला गया। कल्याण सिंह तक ने जब वे राज्यपाल थे पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की जयंती पर लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में इसे लेकर कसक जाहिर की थी। कुल मिलाकर योगी आदित्यनाथ की नीतियों से गुणकारी सोशल इंजीनियरिंग का फलित होना अवरूद्ध हो गया और पार्टी ने कहीं न कहीं इसकी भी कीमत चुकाई।
कहा जा रहा है कि भाजपा ने विधायकों के कहने से जिला पंचायत के उम्मीदवार तय किये थे और यह भी उसके अपशकुन का एक बड़ा कारण रहा। विधायकों में से ज्यादातर में पहले से नेतृत्व क्षमता नहीं थी लेकिन मोदी की आंधी के कारण बड़े अंतराल से वे अपनी चुनावी नैया पार करने में सफल हो गये थे जिसे लेकर उन्हें अपने संबंध में बड़ी गलत फहमी पैदा हो गई है। इसके तहत पहले दिन से ही वे लूट खसोट में लग गये थे जिस पर पार्टी कार्यकर्ताओं तक ने हाय तौबा की लेकिन फिर भी उन पर लगाम नहीं लगाई गई। इसलिए कार्यकर्ताओं ने खुद ही उनका इलाज करने की ठान ली और जिला पंचायत चुनाव में उनके उम्मीदवारों को पटखनी लगाकर अपनी यह इच्छा पूरी कर ली।
मुख्यमंत्री के नौकरशाही प्रेम ने भी पंचायत चुनाव में उल्टा गुल खिलाया। उन्होंने नौकरशाही को राजनैतिक हस्तक्षेप से आजादी देने का ध्येय बनाकर ऐसा माहौल बना दिया है जिससे आम लोगों को अधिकारियों के अहम के आगे पिसना पड़ रहा है। दरअसल यह एक बड़ी उलझन है। अगर नेता को वरीयता दी जाये तो प्रशासन गड़बड़ा जाता है और अगर अधिकारियों को छुटटा कर दिया जाये तो वे यह भूल जाते हैं कि हम जनसेवक है और हमें लोगों को आश्वस्त और संतुष्ट रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसीलिए अधिकारियों के जल्दी-जल्दी तबादलों का नुस्खा कारगर रहता है। अपने यहां से तबादला हो जाने पर लोग संतुष्ट हो जाते हैं और दूसरी ओर एक जगह जमकर रहने का मौका न मिलने पर अधिकारी घमंडी नहीं हो पाते हैं।
बहरहाल यह लगता है कि राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कई फैक्टर पुंजीभूत हो जाने से पंचायत चुनावों में उसकी यह दुर्दशा हुई है। अब लीपापोती के लिए कहा जा रहा है कि इन चुनावों में स्थानीय समीकरण प्रमुख हो जाते हैं जिसके कारण इन चुनावों को व्यापक जनादेश नहीं माना जा सकता लेकिन यह मानना बहाना होगा। अगर ऐसा होता तो पंजाब के नगर निकाय चुनावों में जो हाल ही में हुए थे किसान आंदोलन के कारण अकाली दल और भाजपा का सूपड़ा साफ न हुआ होता।
उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के नतीजों से सत्तारूढ़ पार्टी की अंदरूनी राजनीति में जटिलतायें बढ़ जाने की आशंका है। केन्द्रीय मंत्री संतोष गंगवार, प्रदेश के विधि मंत्री बृजेश पाठक और कई सांसद विधायकों ने कोरोना के उपचार की स्थिति को लेकर लिखे मुख्यमंत्री के पत्र सार्वजनिक करा दिये जिससे राज्य सरकार की बड़ी फजीहत हुई यह इसकी बानगी है। पार्टी के कई नेता मीडिया को खबरें पहुंचा रहे है कि एक समय मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई विधायक आवाज उठाने को तैयार नहीं था लेकिन आज भाजपा विधायक दल में रायशुमारी हो जाये तो एक विधायक मुख्यमंत्री के समर्थन में खड़ा नहीं दिखाई देगा। ऐसा नहीं है कि अकेले मुख्यमंत्री निशाने पर हो। एक बड़े अखबार में यह खबर प्लांट की गई है कि पंचायत चुनाव में पार्टी की शर्मनाक स्थिति के लिए संगठन मंत्री सुनील बंसल जिम्मेदार हैं।
दिल्ली दरबार से भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं। प्रदेश में नौकरशाही से ठीक से काम लेने के लिए दिल्ली दरबार ने गुजरात कैडर के रिटायर्ड आईएएस अरविन्द शर्मा को लखनऊ भेजा था जो विधान परिषद के लिए चुनवा दिये गये हैं लेकिन उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाना मुख्यमंत्री ने गंवारा नहीं किया। यहां तक कि इसके कारण उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार ही टाल दिया। पर अब जबकि पंचायत चुनावों ने मुख्यमंत्री को कमजोर स्थिति में ले जाकर खड़ा कर दिया है केन्द्र उनके साथ क्या सुलूक करता है इस पर राजनीतिक प्रेक्षकों की निगाह होना स्वाभाविक है।