उत्तर प्रदेश भाजपा में अंदरूनी अदावत का खुला एक और मोर्चा

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उत्तर प्रदेश में भाजपा से जुड़ी सनसनी का अंत अभी भी नहीं हुआ है। अपने खिलाफ उबरे सभी अनिष्ट ग्रहों को शांत कर लेने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंत फला सो सब भला की तर्ज पर टाइम्स आफ इंडिया को दिये इंटरव्यू में एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के प्रति वफादारी की कसमें खायी जिससे लगा कि उनकी दूरियां अब पट जायेगी लेकिन लगता है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी उन्हें शह देने के खेल को विराम नहीं दिया है। कांग्रेस के दिग्गज युवा नेता जितिन प्रसाद को अचानक भाजपा में शामिल कर लिया गया। प्रकट तौर पर तो इसे कांग्रेस की रही सही नीव भी धसका देने का उपक्रम घोषित किया जा रहा है लेकिन सयाने यह कह रहे हैं कि इसके निहितार्थ कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना के बतौर समझे जाने चाहिए।
जितिन प्रसाद 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा में आने के लिए खूंटा तुड़ा रहे थे लेकिन तब भाजपा ने ही इसके लिए उत्साह नहीं दिखाया था। वहां अनमनापन भांपकर ही जितिन प्रसाद प्रियंका गांधी के एक फोन पर मान जाने में ही खैरियत दिखा चुके थे। आश्चर्य यह है कि एकाएक उन्हीं जितिन प्रसाद को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने महत्वपूर्ण मान लिया और सीधे अमित शाह ने भाजपा में उन्हें शामिल करने की रूपरेखा तैयार की। जितिन प्रसाद ने ब्राह्मण चेतना परिषद का गठन करके योगी की सरकार द्वारा प्रदेश में कथित रूप से ब्राह्मणों का दमन किये जाने की खिलाफत का बीड़ा उठा रखा था। जाहिर है कि इससे योगी जितिन प्रसाद से व्यक्तिगत तौर पर बुरी तरह खफा होंगे इस कारण अगर सामान्य स्थिति होती तो भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व योगी को विश्वास में लिये बिना जितिन प्रसाद को पार्टी में शामिल करने का जोखिम नहीं उठाता।
योगी को इस मामले में किस तरह बाईपास किया गया यह पूरे घटनाक्रम से अपने आप में स्पष्ट है। जितिन प्रसाद को इसीलिए लखनऊ की बजाय दिल्ली में शामिल कराया गया। इसके अलावा यह तथ्य भी गौरतलब है कि भाजपा में उनके दीक्षा संस्कार के समय योगी को तो छोड़िये भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह की उपस्थिति भी मुनासिब नहीं समझी गयी। इससे यह जाहिर होता है कि जितिन प्रसाद को शामिल करके योगी को परेशान करने का पार्टी के अंदर ही एक मोहरा तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है। जितिन प्रसाद से यह भी तय नहीं किया गया है कि भाजपा में आमद के बाद वे ब्राह्मण चेतना परिषद को भंग कर देंगे और उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के उत्पीड़न की फाइलिंग को आगे रोक देंगे।
प्रेक्षक यह मानते हैं कि जितिन प्रसाद को उन्हें भाजपा में शामिल करते समय जितने बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई है उनका वजन उतना है नहीं। अगर जितिन प्रसाद ब्राह्मणों में इतनी ही पैठ बनाये होते तो 2019 के लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण बाहुल्य धौरहरा सीट से उनकी जमानत जब्त न हो गई होती। उनका कच्चा चिटठा खोलने वाले बताते हैं कि 2014 में भी वे धौरहरा से हार गये थे। इसके बाद उन्हें विधानसभा के चुनाव में भी पराजय का मुंह देखना पड़ा था। यहां तक कि हाल के पंचायत चुनाव तक में वे अपने परिवार की एक महिला को प्रतिष्ठा लगाने के बावजूद नहीं जिता सके थे। राजनीतिक प्रयोजन से उन्हें चाहे जितना बढ़ा चढ़ाकर प्रदर्शित किया जा रहा हो लेकिन वास्तविकता में उनका भाव दगे हुए कारतूस से अधिक नहीं है। सहीं बात यह है कि उनके दल बदल से भाजपा को तो कोई लाभ नहीं होने वाला लेकिन उनके दिन जरूर बहुर सकते हैं। उनकी पूर्व पार्टी कांग्रेस तो पूर्ण अवसान की तरफ जा रही है। उत्तर प्रदेश में तो कई वर्षो से वह दुर्दिनों की शिकार है जिसमें सुधार आने के कुछ झौंके सलमान खुर्शीद के अध्यक्ष काल जैसे काल खंडों में आये लेकिन वह भी परवान नहीं चढ़ सके पर अब तो दूसरे उन राज्यों में भी उसे नकारा जाने लगा है जो उसके गढ़ थे। इसी के कारण असम में उसे फिर सत्ता में आने का अवसर नहीं मिल सका और केरल में भी लोगों ने प्रतिद्वंदी मोर्चों के एक के बाद दूसरे के आने का क्रम तोड़ दिया। ऐसे में कांग्रेस में बने रहकर अच्छे दिन के इंतजार में बुढ़ापे तक बैठे रहने का सब्र अगर जितिन प्रसाद ने नहीं दिखाया तो यह स्वाभाविक ही है।
वैसे उत्तर प्रदेश में पार्टी की कमजोर होती स्थिति को भांपने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी राधामोहन सिंह ने जो मंथन किया था उसमें ब्राह्मणों की नाराजगी के कारण को तो गौंण तौर पर बताया गया था, मुख्य वजह पिछड़ों और दलितों यानी बहुजन के शासन प्रशासन में उनकी उपेक्षा को लेकर असंतोष व नौकरशाही की मनमानी और भ्रष्टाचार को बताया गया था। योगी में वर्ण व्यवस्था की ग्रन्थि इतनी गहराई और व्यापकता से धसी हुई है कि वे आज के समय में समावेशी व्यवस्था के स्थापित हो चुके महत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। चाहे शासन में महत्वपूर्ण पद देने का मामला हो या बड़े जिलों में डीएम और एसपी की तैनाती का, बहुजन के अधिकारी उनकी हिकारत का शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि मंत्रिमंडल में भी बहुजन नेताओं को उन्होंने महत्वपूर्ण पोर्ट फोलियों सौंपना गवारा नहीं किया है। इसके कारण बेगानेपन की अनुभूति ने उन्हें भाजपा से छिटकने का आधार तैयार कर दिया है।
पहले की स्थितियां अलग थी जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हां मैं जन्मना नीच हूं की क्रंदननुमा डींग से न केवल विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया था बल्कि बहुजन में भी यह विश्वास बन गया था कि वे उनके ही बीच के हैं। उन दिनों प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में बाबा साहब के विचारों को भी बड़ी मार्मिकता से कोट करते थे जिससे यह विश्वास और ज्यादा पुख्ता होता था। नतीजतन ओबीसी की सारी जातियां और दलित भी भाजपा पर उसके राज में अपने आदमी को सबसे शक्तिशाली पद मिलने से न्यौछावर हो गई थी पर जब प्रधानमंत्री के व्यवहार में पिछड़ों के हितों के लिए कोई कटिबद्धता नहीं झलकी तो उनमें छले जाने जैसी भावना घर करने लगी। जो हाल उत्तर प्रदेश में है वही केन्द्रीय सचिवालय में है। वहां भी महत्वपूर्ण विभागों के सचिव पद जैसे सवर्णो के लिए आरक्षित हैं। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी बहुजन को बड़े पदों से दूर रखा गया है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद केशव प्रसाद मौर्य की मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी स्थितियों के मददे नजर सर्वथा न्यायपूर्ण थी पर मोदी ने उनकी पैरवी का उत्साह नहीं दिखाया। मोदी के प्रति बहुजन में मोह भंग की हालत का असर अब चुनावों में दिखने लगा है। शायद संघ को भी इसका भान हो गया है इसलिए आने वाले विधानसभा चुनाव उनके चेहरे को आगे करके न लड़ने की सलाह संघ की ओर से दी जा रही है। उत्तर प्रदेश में भाजपा से बहुजन के समर्थन का चरण किस तरह थामा जाये यह कोशिश फिलहाल नदारत है।
अगर उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति सुधारने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व गंभीर होता तो अधिकारियों के स्वैच्छाचारी व्यवहार पर रोक लगाने के उपाय सामने आते। ऐसे अधिकारी डीएम एसपी के रूप में पोस्ट किये जाते जो लोगों को विश्वास में लेकर काम करने के कायल होते। ईमानदारी और निष्पक्षता न केवल होनी चाहिए बल्कि दिखनी भी चाहिए। इस सोच के अधिकारी भी सफल हो सकते थे। अगर उनकी ईमानदारी लोगों में दिखती जो कि निहित स्वार्थो के खिलाफ कठोर मुहिम चलाने से परिलक्षित होती है तो नेताओं की बात न मानने वाले अधिकारी भी कार्यकर्ता की पसंद बन जाते जैसा कि अतीत में हुआ है। लेकिन अधिकारी तो ऐसे हैं जो किसी बुराई से भिड़ना भी नहीं चाहते लेकिन नेता पर गुर्राना चाहते हैं। जन शिकायतों पर कार्रवाई में रूचि न लेने की वजह से मनमानापन और भ्रष्टाचार दोनों बढ़ा है। प्रदेश में पार्टी की खराब स्थिति के कारणों का पुलिंदा लेकर गये उक्त दोनों महानुभावों को नौकरशाही की वजह से उत्पन्न असंतोष के उन्मूलन के लिए जन शिकायतों की प्रभावी जांच और कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को प्रेरित करना चाहिए था जिसके आसार भी नदारत हैं।
ऐसे में जितिन प्रसाद को पार्टी में शामिल करने का तौर तरीका अगर योगी के तिरस्कार को प्रदर्शित करने के बतौर जनमानस में संज्ञान में लिया जा रहा है तो इसमें अन्यथा क्या है। इसी कारण अंदाजा लगाया जा रहा है कि अब इस अनुष्ठान के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा में अंदरूनी अदावत का एक और मोर्चा खुल गया है।

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