लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की प्रगति को निदेशक सोनिया नित्यानंद ने पंख लगाये

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लखनऊ के डा0 राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की वर्तमान निदेशक डा0 सोनिया नित्यानंद की कल्पनाशीलता और प्रगतिवादी दृष्टिकोण के कारण संस्थान में विस्तार की कई परियोजनाओं को पंख लगते नजर आ रहे हैं। डा0 सोनिया नित्यानंद के पास अत्याधुनिक और उच्चतम चिकित्सा केन्द्र के बतौर इस संस्थान को मुकम्मल तौर पर गढ़ने के लिए विस्तृत रूपरेखा है। समय चक्र टाइम्स के संपादक राकेश कुमार से बातचीत में संस्थान की भविष्य की परियोजनाओं की जानकारियां देते हुए वे अत्यंत उत्साहित रहीं। प्रस्तुत है उनसे हुई यह बातचीत-
सम्पादक- मैम अभी हाल ही में कोरोना की दूसरी लहर आई थी और आप ने कुछ ही दिन पहले पदभार ग्रहण किया था। इस मुश्किल हालात के बीच आपका निदेशक के रूप मे कार्य करने का अनुभव कैसा रहा?
निदेशक मैडम- निदेशक के रूप में मैंने 17 मई 2021 को पदभार संभाला जिसके अगले दिन मैंने यहां 200 बेड वाले कोविड अस्पताल का निरीक्षण किया जो कि मातृ एवं बाल चिकित्सा रेफरल केंद्र शहीद पथ पर स्थित है, इसे कोविड अस्पताल में परिवर्तित किया गया है, क्योंकि यहां सुविधाएं बेहतर है,यहां कंट्रोल रूम है, 200 बेड है, आईसीयू है, एचडीयू है, आइसोलेशन रूम है, यहां का प्रबंधन काफी अच्छा है, जिससे यहां का निरीक्षण मुझे बेहद सुखद अनुभूति प्रदान करने वाला बन गया।
सम्पादक- संस्थान को औरविकसित करने के लिए कौन सी योजनायें आपके मस्तिष्क में चल रहीं हैं। कृपया इस पर प्रकाश डालें।
निदेशक मैडम- कोविड अस्पताल के निरीक्षण के दौरान मैंने पाया कि यहां पर पोस्ट कोविड नाम की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। जैसा कि सर्वविदित है कि कोविड के ठीक होने के बाद भी लम्बे अंतराल तक लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि फेफड़ों में सूजन हो जाना। कई सारी परेशानियां में मरीजों को आईसीयू की जरूरत पढ़ती है, मैंने यहां पहले 24 बेड इसके बाद 20 बेड, कुल 44 आईसीयू बेड की सुविधा अस्पताल में शुरू की, दूसरी योजना के तहत इस संस्थान में उपलब्ध एमबीबीएस की सीटें जो 1 साल पहले 150 से बढ़कर 200 कर दी गई हैं। इन बढ़ी हुई सीटों के मानक को पूर्ण करना बेहद आवश्यक है जिससे आईएमसी की मान्यता पूरे 200 सीटों के लिए मिल जाए इसमे सबसे महत्वपूर्ण मानक सीटों के सापेक्ष बेड की व्यवस्था है। हमारा ध्येय आवश्यक मानकों को पूर्ण करते हुए 500 बेड़ों की उपलब्धता के लिए नवनिर्माण करना है जिससे हमें 2023 में 200 सीटों की मान्यता मिल जाए।
संस्थान शहर के केंद्र में है इस कारण से यहां आपात उपचार के लिए रोजाना करीब 300-400 मरीज रोज आते हैं, वर्तमान में इमरजेंसी वार्ड मात्र 50 बेड का ही है, मेरा लक्ष्य 400 बेड तक का आपात सेवा का एक तंत्र खड़ा करना है जिसके लिए एक नई इमरजेंसी बिल्डिंग बनाने की योजना है। इसके बाद यहां के 14 बेड वाले आईसीयू को आवश्यकतानुसार कम से कम 50 बेड तक बढ़ाना है जिसको हमारी इमरजेंसी की नई बिल्डिंग के टॉप फ्लोर पर बनाने की योजना है। यह सभी योजनाएं अति आवश्यक है। सभी योजनाओं के सार के बारे में कहा जाए तो किसी अस्पताल में सबसे प्रमुख बात होती है मरीजों की सेवा तो इस संस्थान में सभी योजनाओं में बेडो की संख्या बढ़ाने पर ही ध्यान दिया गया है साथ ही यहां पर पीजीआई की तर्ज पर रिवाल्विंग फंड है, जिसका मकसद होता है सारी दवाएं संस्थान के भीतर एक फार्मेसी में उपलब्ध हों जिससे आवश्यक दवाओं के लिए मरीज के तीमारदारों को संस्थान के बाहर इधर उधर भटकना ना पड़े इसके लिए मैंने बैठकें की है यहां पर मेरी पीजीआई के जैसा ही पूर्णतया एचआरएफ (भ्त्थ्) बनाने की प्रक्रिया रहेगी
साथ ही मैंने ध्यान दिया है कि यह एक शिक्षण संस्थान है तो यहाँ एक रजिस्ट्रार होना चाहिए, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक होना चाहिए, फाइनेंस ऑफिसर होना चाहिए ,खरीद-फरोख्त ऑफिसर होना चाहिए, जो पद खाली है उनकी नियुक्तियां करना और अतिरिक्त जिन पदों की आवश्यकता है उनके लिए शासन से आग्रह करना तो शिक्षण के पदों हो या गैर शिक्षण पद हों उनकी नियुक्तियां करना भी हमारा ध्येय है

सम्पादक-इन योजनाओं को पूर्ण करने के लिए अभी जो बजट मिल रहा हैै क्या वह पर्याप्त है या आपको लग रहा है कि इसे बढ़ाने के लिए प्रयास करने होंगे।
निदेशक मैडम-अभी तक यहां जो बजट है वो वर्तमान में मशीनों के संचालन कर्मचारियों के वेतन, आकस्मिक व्यय में खप जायेगा। मगर आगे जब स्टाफ बढ़ेंगा, बेडों की संख्या बढ़ेगी और चूंकि अस्पताल और इंस्टिट्यूट का विलय हो गया है जिससे विभागों की संख्या बढ़कर 39 हो गई है तो जाहिर है अग्रिम वर्षों में हमें ज्यादा धनराशि की आवश्यकता होगी, हम तो शासन से सप्लीमेंट्री भी मांगने वाले हैं, यहां बड़े उपकरणों की बहुत आवश्यकता है जैसे डत्प् मशीन, एक नई ब्ज् मशीन हैं, ये 10 साल पुरानी हो गई हैं, ब्रेकडाउन की स्थिति में इनके कलपुर्जे नहीं मिलते तथा इनकी देखरेख भी बंद हो जाती है

सम्पादक- यहां पर पैरामेडिकल और मेडिकल स्टाफ की क्या स्थिति है?
निदेशक मैडम- हमारे यहां जो स्टाफ है हम लोगों को उससे कहीं ज्यादा की आवश्यकता है, जैसा कि मैंने पहले भी बताया था कि जो पद कई वर्षों से रिक्त हैं उनके विज्ञापन के लिए मैंने कार्य शुरू कर दिया है, जिन अति आवश्यक रिक्त पदों पर नियुक्तियां करनी है उसके लिए प्रस्ताव बनाकर हम लोग शासन के सामने रखेंगे कि अगर इस संस्थान को राष्ट्रीय स्तर का बनाना है तो सभी आवश्यक पदों पर नियुक्तियां जल्द हों।

सम्पादक- अभी हाल ही में माननीय मुख्यमंत्री जी ने लोहिया संस्थान को काफी सराहा है, मैं आपसे पहले भी मिल चुका हूं मेरी नजर में आप सरल और मृदुभाषी हैं, अनुशासन के मामले में आप कोई समझौता नहीं करती यह स्वभाव आपका बचपन से रहा है या बाद में कार्यक्षेत्र के दौरान हो गया ?

डायरेक्टर मैडम- मेरे करियर के शुरुआती समय में ही मेरे ऊपर प्रशासनिक सेवाओं की जिम्मेदारी आ गई। सन 1993 में मैने संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर (क्मचजज.व िपउउनदवसवहल) के रूप में जॉइन किया था, उस समय स्वर्गीय डॉक्टर एस एस अग्रवाल, प्रमुख थे वो अमेरिका के सबसे बड़े अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण केंद्र से 3 माह की ऑब्जर्वरशिप करके आए थे, वह उस समय एक युवा अध्यापक की तलाश कर रहे थे जो संस्थान में अस्थि-मज्जा प्रत्यारोपण विभाग को स्थापित कर सके।
जब मैंने संस्थान ज्वाइन किया तो उन्होंने मुझे यह चुनौती दी की आप यहां अस्थि-मज्जा विभाग स्थापित करिए तो मेरी नेतृत्व क्षमता या प्रशासनिक जिम्मेदारियां तभी से शुरू हो गई क्योंकि ऐसे बड़े बड़े कार्यक्रमों को स्थापित करने के लिए विशेषज्ञता चाहिए, इससे भी बड़ी बात है कि इसमें टीमें बनानी पड़ती है और यह टीम मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ की होती है, तो 6 माह के भीतर ही मैंने चुनौती के लिए हामी भर दी और उस अस्थि-मज्जा प्रत्यारोपण प्रोग्राम की स्थापना बिल्कुल शून्य से करी,
आज भी प्रदेश में अस्थि- मज्जा प्रत्यारोपण का यह एकमात्र सफल कार्यक्रम है, उसमें मुझे पूरे पैरामेडिकल स्टाफ को कंधे से कंधा मिलाकर चलाना पड़ा क्योंकि इसमें जीरो-काउंट के मरीज होते हैं जिनके लिए नर्सिंग केयर बेहद जरूरी होती है। हम डॉक्टर लोग लाख अच्छा ट्रांसप्लांट कर लें लेकिन यदि कोई सफाई कर्मी संक्रमण लेकर मरीज के कमरे में चला जाएगा तो मरीज की मृत्यु ही हो जाएगी तो मैंने पूरे पैरामेडिकल स्टाफ को सख्ती के साथ छाती से लगाकर प्रेम दिया जिससे वह मरीज को अपना समझकर उसकी सेवा करें क्योंकि इसमें जीवन मृत्यु का मामला होता है, चूंकि ट्रांसप्लांट के ज्यादातर मरीज ब्लड-डिसऑर्डर्स के होते हैं तो उस वक्त इस तरह के मरीज संस्थान मैं काफी ज्यादा आने लग गए तो फिर शासी निकाय ने सन 2002 में निर्णय लिया कि इसके लिए अलग विभाग होना चाहिए जो कि सन 2003 में स्थापित हुआ और मैं उसकी विभागाध्यक्ष बनी। फिर मुझे पूरी टीम बनानी थी, अध्यापकों की, गैर शिक्षण पदों की, तब मैंने नेतृत्व क्षमता से रोल निभाया और प्रशासन के सामने इस विभाग के लिए एक अलग बिल्डिंग बनाने का प्रस्ताव रखा, इसमें बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी थी और एक अनुशासन भी लाना जरूरी था क्योंकि कंस्ट्रक्शन एजेंसियों से डील करना आसान नहीं होता, फिर मैंने उनसे बिल्डिंग तैयार करवाई जिसे सेंटर फॉर हिमाटोलॉजी बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन कहते हैं और उसमें स्टेट-ऑफ-द-आर्ट वार्ड हैं और अस्थि-मज्जा ट्रांसप्लांट यूनिट है और वही से मेरी प्रशासनिक जिम्मेदारियां शुरू हुईं। आगे चलकर मैंने संस्थान में विश्वस्तरीय स्टेम सेल रिसर्च सेंटर भी स्थापित किया। यहां रहकर मैंने सरकार से समन्वय स्थापित करना सीखा, कंस्ट्रक्शन कंपनियों से तालमेल करना सीखा और जल निगम से भी तालमेल बैठाना सीखा जिसकी हम लोग समय-समय पर समीक्षा करते थे जिसमें जल निगम का पूरा साथ भी मिलता था।

नेतृत्व किसी इच्छित कार्य को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इस प्रकार कराने की कला हैं, जिसको वह व्यक्ति यह समझकर करे कि वह स्वयं करना चाहता हैं।

निदेशक साहिबा की पिछले कार्य अनुभवों की नेतृत्व कुशलता एवं प्रसाशनिक क्षमता के आधार पर ये पंक्तियां एक सटीक बैठती है।