नये डीजीपी पुलिस और पब्लिक दोनों के चहेते

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एचसी अवस्थी के रिटायर होने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक के रूप में मुकुल गोयल का चयन विशुद्ध मेरिट के आधार पर किया गया है। भले ही उनकी नियुक्ति को राजनीतिक निहितार्थो से भी जोड़ा जा रहा हो। सपा की सरकारों में मुकुल गोयल कई बार अपनी कार्यकुशलता के कारण महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से नवाजे गये लेकिन उन पर राजनीति के आधार पर काम करने का ठप्पा कभी नहीं लगा। इसीलिए उनकी नियुक्ति के समय सामने आयीं शंकाओं को दरकिनार कर दिया गया। मुकुल गोयल को अपेक्षाकृत सबसे कम उम्र में उत्तर प्रदेश पुलिस के इस सर्वोच्च पद को संभालने का मौका मिला है नतीजतन अगर सेवानिवृत्ति तक वे इस पद पर डटे रहे तो यूपी मंे यह एक रिकार्ड होगा।
एचसी अवस्थी के उत्तराधिकारी की तलाश के दौरान पहले दिन से ही मुकुल गोयल का नाम सबसे ऊपर लिया जा रहा था। हालांकि उन्होंने स्वयं इसके लिए जोड़तोड़ करने का कोई उत्साह अपने स्वभाव के चलते नहीं दिखाया। वैसे लगभग एक दर्जन अफसरों के नाम इस पद की दौड़ में शामिल किये जा रहे थे लेकिन संघ लोक सेवा आयोग की बैठक में जब तीन नामों का अंतिम पैनल तैयार किया गया तो इसमें 1986 बैच के नासिर कमाल और 1987 बैच के मुकुल गोयल व आरपी सिंह रह गये। वर्तमान सरकार की राजनीतिक बाध्यताओं के कारण नासिर कमाल का इस पद के लिए चयन तो पहले से ही संभव नहीं दिख रहा था, आरपी सिंह का सेवाकाल दो वर्ष से कम बचा होने की वजह से वे भी पिछड़ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी के चयन के लिए जो मानक तैयार किये थे उनके मुताबिक ऐसे अफसर को प्राथमिकता देने की मंशा व्यक्त की गई थी जिसे कम से कम दो वर्ष काम करने का अवसर मिल सके।
यह शर्त पक्ष में होने के साथ-साथ मुकुल गोयल के साथ कई और विशेषतायें जुड़ी हुई थी। उनके पूर्ववर्ती एचसी अवस्थी के चयन का आधार उनकी चैबीस कैरेट की ईमानदारी बनी थी लेकिन फील्ड का उनका अनुभव न के बराबर होना एक बड़ी कमजोरी भी साबित हुआ जिससे वे बेहतर नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करने मे ंविफल रहे। मुकुल गोयल के पास इस अनुभव की प्रचुरता है। उन्होंने फील्ड पर लंबी पारी खेली है। अपनी सेवा की शुरूआत उन्होंने नैनीताल में सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में की। इसके बाद बरेली में एसपी सिटी और अल्मोड़ा, जालौन, आजमगढ़, हाथरस, वाराणसी, गोरखपुर, सहारनपुर और मेरठ में जिला पुलिस प्रमुख, कानपुर, आगरा व बरेली रेंज में डीआईजी, बरेली जोंन में आईजी के पदों पर रहे। इसके बाद एडीजी ला एण्ड आर्डर भी रहे। एडीजी रेलवे और एडीजी सीबीसीआईडी के बतौर भी उन्होंने अपनी सेवायें दी। लगभग 10 वर्ष तक उन्होंने केन्द्रीय संगठनों में प्रतिनियुक्ति पर कार्य किया। जाहिर है कि उनका फील्ड का अनुभव विस्तृत है। वे अत्यंत सौम्य हैं लेकिन प्रशासन में उतने ही सख्त। अपराधियों के मामले में उन्होंने कभी राजनीतिक दबाव को मंजूर नहीं किया। पिछली सरकार ने इसी कारण उन्हें एडीजी ला एण्ड आर्डर के पद से कुछ ही दिन में हटा दिया था। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि अपनी फोर्स और पब्लिक दोनों के चहेते बनना उन्हें आता है।
मुकुल गोयल का सेवाकाल फरवरी 2024 तक है। अगर वे पूरे समय डीजीपी रहे तो कई आईपीएस अधिकारियों को इस पद तक पहुंचने की अपनी हसरत अधूरी छोड़कर रिटायर हो जाना पड़ेगा। इनमें 1988 बैच के कमल सक्सेना हैं जिनको जुलाई 2022 में सेवानिवृत्त होना है। इसी बैच के जीएल मीणा का सेवाकाल जनवरी 2023 तक, आरपी सिंह का फरवरी 2023 तक, डीएस चैहान का मार्च 2023 तक, 1988 बैच के अनिल अग्रवाल का अप्रैल 2023 तक, आरके विश्वकर्मा का मई 2023 तक और विजय कुमार का जनवरी 2024 तक है। यहां तक की मौजूदा सरकार की एक और पसंद आनंद कुमार को अप्रैल 2024 में सेवानिवृत्त होना है जिससे मुकुल गोयल के बाद उनका सेवाकाल 6 माह से कम का बचेगा। परिणामस्वरूप बाद में डीजीपी पद के लिए उनके नाम पर विचार संभव नहीं रह जायेगा।
निवर्तमान डीजीपी यानी एचसी अवस्थी दौरों पर विश्वास नहीं करते थे जिससे फील्ड के अफसरों पर उनकी पकड़ कमजोर हो गई थी। हाल के कुछ महीनों से जोंन और रेंज के अफसरों ने तो बड़े से बड़े कांड में मौके पर न जाने की आदत बना ली थी लेकिन मुकुल गोयल जोंन, रेंज और जिलों में जाकर सीधे पुलिस के कामकाज को परखने का महत्व समझते हैं। अनुमान किया जाता है कि उनके कार्यकाल में एक ओर पुलिसजनों के कल्याण के लिए बढ़ चढ़कर कदम उठाये जायेंगे दूसरी ओर उनकी निरंकुशता पर भी निगाह रखी जायेगी। मुकुल गोयल के कार्यकाल में फील्ड के अफसरों को हर बात में जबावदेही का अहसास करना पड़ेगा जो उनके पूर्ववर्ती से भिन्न अनुभव होगा। वैसे मुकुल गोयल की एक विशेषता यह भी है कि मीडिया फ्रेंडली होने के बावजूद उन्हें अनावश्यक मुखरता और सनसनीखेज वक्तव्यांे से परहेज है। खासतौर से वे अन्य अफसरों पर सार्वजनिक रूप से आलोचनात्मक टिप्पणी करने से बचते हैं।
उन्हें ऐसे समय में यह गुरूतर जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला है जब विधानसभा के नये चुनाव के लिए कुछ ही महीनों का समय शेष रह गया है। इन चुनावों को निष्पक्षता और शांतिपूर्ण ढ़ंग से संपन्न कराना सचमुच बड़ी चुनौती है। लेकिन उनकी व्यवहारिक निपुणता को देखते हुए उम्मीद है कि वे इस जिम्मेदारी को बहुत बेहतर ढ़ंग से निभा पायेंगे।
नये पुलिस महानिदेशक की एकेडमिक पृष्ठभूमि भी शानदार है। उन्होंने आइआइटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की बैचलर डिग्री हासिल की। इसके बाद एमबीए किया। अग्रेजी हिन्दी के अलावा उन्हें फ्रैंच का भी ज्ञान है। उनके कैरियर के साथ कई सेवा सम्मान जुड़े हैं। 2003 में उन्हें राष्ट्रपति का वीरता पुरस्कार दिया गया था। 2012 में विशिष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक मिला था। गत वर्ष उन्हें केन्द्रीय गृह मंत्री ने अति उत्कृष्ट सेवा पदक से नवाजा। अपनी पहली प्रेस वार्ता में उन्होंने छोट से छोटे अपराधों में कार्रवाई करने, थानों में पीड़ितों की सुनवाई की स्थिति की समीक्षा कराने और पुलिसिंग में तकनीक के ज्यादा समावेश की नीति पर अमल कर ऐलान किया है। इससे कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण को लेकर उनकी बारीक समझ का पता चलता है।