आरएसएस का चित्रकूट मंथन-सांस्कृतिक संगठन का सत्ता राग

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अपनों के बिगड़ते संस्कारों की सिरदर्दी को झटककर मध्य प्रदेश के चित्रकूट में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पांच दिन के शिविर में मुख्य रूप से सत्ता राग गाया गया। आरएसएस की तपस्या अब राजनीतिक साधना में इतनी डूब चुकी है कि वह बेखुदी का शिकार नजर आने लगा है। 09 जुलाई से 13 जुलाई तक चले उक्त मंथन में यही विडम्बना उभरकर सामने आयी।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय संगठनों के पदाधिकारियों, क्षेत्र प्रचारकों और प्रांत प्रचारकों का यह शिविर उसकी रीति-नीति के निर्धारण की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है जो कि प्रतिवर्ष जुलाई के महीने में ही आयोजित होता है। हालांकि गत वर्ष कोविड-19 की बंदिशों के चलते यह चिंतन शिविर आयोजित नहीं हो सका था।
घोषित रूप से तो संघ में किसी भी पार्टी के हिन्दुत्ववादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोग शामिल हो सकते हैं और अतीत में संघ ने हिन्दू हितों की खातिर दलबदी की सीमायें लांघकर धर्मनिरपेक्ष समझी जाने वाली कांग्रेस तक की मदद की थी। खासतौर से 1985 के लोकसभा चुनाव में खालिस्तानी आंदोलन का फन पूरी तरह कुचलने के जज्बे के तहत संघ कांग्रेस पर इस कदर न्यौछावर हो गया था कि भारतीय जनता पार्टी का चुनाव मैदान में बुरी तरह दिवाला पिट गया था। देश भर में दो स्थानों पर बमुश्किल से जीत मिल सकी थी। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के शलाका पुरूष अटल विहारी वाजपेयी को भी हार की शर्मिंदगी झेलनी पड़ गई थी।
पर आज राजनीति में संघ की मानस संतान भारतीय जनता पार्टी इतना आगे निकल चुकी है कि संघ के लिए दूसरी ओर ताकने की जरूरत महसूस नहीं हो सकती। चाहे मूल रूप से संघ में दीक्षित कार्यकर्ता हों या दूसरे दलों से आये बहिरागत नेता भाजपा में अब सभी को संघ का बौद्धिक आचमन ग्रहण करते रहना अनिवार्य सा बना दिया गया है ताकि वे राजनीति में आदर्श स्थापित करने की भावना से कार्य कर सकें। संघ द्वारा पैदा की गई इसी हूक के कारण मोदी के पहले की भाजपा पार्टी विथ ए डिफरेंस की बात करती थी और अपने मुददों के अलावा नेताओं और कार्यकर्ताओं के चाल, चरित्र और चेहरे का भी ध्यान रखती थी। लेकिन क्या आज भी यह बात बनी रह गई है यह एक ऐसा सवाल है जो संघ के लिए विचारणीय होना चाहिए।
वास्तविकता यह है कि पहले भाजपा में नग्न व्यवहारिकता के कायल नेता और कार्यकर्ता अपवाद स्वरूप ही पाये जाते थे जबकि आम भाजपाईयों में लोक लाज का भय बना रहता था जिससे उनमें एक सीमा से अधिक गिरावट को चिंहित करना मुश्किल था। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी बहुमत से सरकार के गठन के तत्काल बाद वृंदावन में संघ और भाजपा की समन्वय बैठक आयोजित हुई थी जिसमें पार्टी के नये नवेले विधायकों के पहले दिन से ही दूसरी पार्टियों की तरह लूट खसोट में लग जाने पर काफी हल्ला मचा था। संघ के शीर्ष अधिकारियों को इस पर कड़ी चितवन प्रदर्शित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यह हालत संभालने के लिए निर्देशित करना पड़ा था। तब से लखनऊ में गोमती में कितना पानी बह चुका है पर अब ऐसे आचरण पर लगाम की बात तो दूर संघ में इस पर चर्चा की आवश्यकता भी महसूस नहीं की जा रही है।
एक समय था जब संघ को उसकी विचारधारा के कारण विवादित संगठन मानने वाले लोग भी उसके स्वयं सेवकों को उनके त्याग और ईमानदारी के कारण आदर की निगाह से देखते थे लेकिन आज यह स्थिति नहीं रह गई है तो कायदे से संघ के नेतृत्व को इस पर बैचेन हो जाना चाहिए क्योंकि अगर उसने इस मामले में अपनी साख गंवा दी तो दूरगामी तौर पर उसकी अस्तित्व तक के लिए खतरा पैदा हो सकता है। सही बात तो यह है कि संघ की पवित्र गायें सत्ता के संस्पर्श के बाद पूरी तरह पतित हो चुकी हैं। भाजपा की नैतिक मूल्यों के मामले में निगरानी के लिए विभिन्न स्तरों पर उसके द्वारा नियुक्त किये जाने वाले संगठन मंत्री तक सांसारिक ग्लैमर के ऐसे शिकार हो गये हैं कि अपना वैभव बढ़ाने के लिए सत्ता के निर्लज्ज दोहन में उन्हें कोई संकोच नहीं रह गया है। ऐसा नहीं है कि संघ के अधिकारियों की आंखे और कान मुंद गये हों। उन्हें भी कुछ ही वर्षो में इनकी हैसियत में हुई बढ़ोत्तरी को देखने और सुनने को मिल रहा है पर लगता है कि संघ के नेतृत्व ने दुनियादारी के आगे हथियार डाल दिये हैं। उन्होंने आदर्शवादिता पर डटे रहने की बजाय व्यवहारिकता से पूरी तरह समझौता कर लिया है।
हर राजनीतिक पार्टी के लिए अपेक्षा की जाती है कि उस पर नैतिक नियंत्रण के लिए एक ऐसा शक्ति केन्द्र हो जिसका सत्ता से कोई सरोकार न हो। कांग्रेस के समय गांधी जी इसकी मिसाल थे तो जब केन्द्र में पहली गैर कांग्रेस सरकार बनी तो जनता पार्टी के उस दौर में लोकनायक जय प्रकाश नारायण यह भूमिका निभा रहे थे। आज भाजपा की सत्ता के लिए ऐसा केन्द्र राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। इसलिए चित्रकूट मंथन में संघ को सत्ता संगठन के लिए आचार संहिता बनाने जैसी कोई पहल करनी चाहिए थी। पर इस तरह की जिम्मेदारी के मामले में स्वयं को वीतराग जताकर वह छुटटी पा ले रहा है। भाजपा के मामले में संघ जिस भूमिका में है उसमें इस तरह के हस्तक्षेप से मुंह मोड़ना उसके लिए मुनासिब नहीं हो सकता है।
मूल रूप से चित्रकूट मंथन की बैठकों में क्या विमर्श हुआ यह गोपनीयता के आवरण में रहा क्योंकि मीडिया को मंथन शिविर के आसपास दूर-दूर तक नहीं फटकने दिया गया था। मीडिया में जितनी खबरें आयी वे संघ के उन सूत्रों से हैं जिन्होंने सुनियोजित ढ़ंग से आफ दि रिकार्ड के नाम पर मीडिया के अपने मित्रों को ब्रीफ किया। लेकिन फिर भी इन्ही खबरों से चित्रकूट चिंतन का सार काफी हद तक सामने ला दिया गया है। सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के अभाव में इस मंथन में संघ के लिए जो विस्तारवादी योजनायें बनी वे कारपोरेट कंपनी के बाजारवादी हथकंडों का प्रतिबिम्ब बनकर रह गई हैं। कहा गया है कि संघ की शाखाओं की संख्या बढ़ाकर एक लाख तक की जायेगी। राम मंदिर के लिए जिन 12 करोड़ 70 लाख लोगों से योगदान लिया गया है उन्हें संघ संवाद के लिए टारगेट करेगा क्योंकि उनमें से अधिकांश को संघ से जोड़ने में सफलता प्राप्त करने की आशा रखी जा सकती है।
संघ मुसलमानों में भी भाजपा का आधार तैयार करेगा। इसके लिए मुस्लिम बस्तियों में संघ की शाखायें शुरू कराने की योजना शिविर में बनाई गई है। पश्चिम बंगाल में हाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बावजूद संघ ने अपनी कोशिशों में हार नहीं मानी है। इस राज्य में उत्तर प्रदेश की तरह अपने सघन विस्तार का उपक्रम करते हुए उसने पश्चिम बंगाल को तीन प्रांतों में बांट लिया है। इसी बीच संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। 2025 में उसकी शताब्दी मनाई जायेगी। संघ के अधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने अपने उददेश्यों के लिए दशकों तक संघर्ष किया जिसमें उन्हें तमाम कष्ट और यातनायें भी झेलनी पड़ी। इस दौरान पता नहीं था कि कब उनकी मंजिल करीब आयेगी। यहां तक कि अटल-आडवाणी युग के अंतिम चरण में भाजपा सत्ता से इतनी दूर छिटक चुकी थी कि अभी कई और दशक संघ के लोगों को चरैवेति-चरैवेति करते-करते संघर्ष जारी रखना पड़ेगा फिर भी उनकी जिजिविषा नहीं टूटी थी। पर अब उनमें यह ताब नहीं रह गई है। निद्वंद्व सत्ता के लम्बे भोग ने सुविधा भोगी बनाकर संघर्ष के उनके माद्दे को चुका डाला है जो परिस्थितियां बदलने पर सामने आ जायेगा।
सत्ता के चलते संघ के जिला कार्यालय तक आलीशान हो गये हैं। प्रचारकों को वातानुकूलित गाडि़यों में और पार्टियों में भाग लेने का चस्का लग गया है। अब वह किसी वैचारिक प्रण के लिए नहीं सुख सुविधाओं का यह सिलसिला बरकरार रखने को बेकरार हैं। अब सत्ता से दूर होने की वे कल्पना भी नहीं कर सकते। अनुमान कीजिये कि ऐसी हालत में अगर भाजपा की सत्ता पर कोई विपत्ति आ गई तो समूचे संघ परिवार सहित उसमें कैसी भगदड़ मचेगी।
सत्ता की इस तड़प की वजह से ही संघ का चित्रकूट शिविर सांस्कृतिक संगठन की मर्यादा के अनुरूप सांस्कृतिक प्रश्नों से अपने का अलहदा कर उत्तर प्रदेश में सरकार की वापसी की चिंता के लिए समर्पित हो गया। गो कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है जहां सत्ता फिसल जाने का मतलब आगे चलकर केन्द्र की भी सत्ता गंवा देना हो सकता है। बेतरतीब उछल कूद उलटबासियों को जन्म देती है। शायद संघ परिवार में भी ऐसा हो रहा है। सांस्कृतिक मोर्चे पर गिनाने के लिए वैसे तो उसके पास कई काम हैं जो भाजपा की सत्ता में हुए हैं। अयोध्या में भव्य राममंदिर बन रहा है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर की पर्यटन नगरी के रूप में संवर रही है, मथुरा और कांशी में भी हिन्दू गौरव को पुर्नस्थापित करने की पींगें मजबूती से बढ़ रही हैं, हिन्दू पर्व राजकीय पर्व का दर्जा लेते जा रहे हैं, शहरों और स्थानों के नये नामकरण का सिलसिला चल रहा है वगैरह-वगैरह। दूसरी ओर आयातित संस्कृति के समर्पण की चपेट भी जोर पकड़ती जा रही है। नई नस्लों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रत्यारोपण की मुहिम नजर आने वाली कान्वेंट शिक्षा प्रणाली को इस सरकार में पहले से ज्यादा प्रश्रय मिल रहा है, उपभोक्तावाद का नशा नैतिकता और शील के सारे तटबंध तोड़ने पर आमादा है, मंत्रियों और नेताओं की संतानों के विवाह समारोह व अन्य पार्टियों में बाजारवाद का रगीला विस्फोट देश की सांस्कृतिक मर्यादाओं की विनाशलीला की कहानी सुना रहा है। यह दृश्य भारतीय समाज को सांस्कृतिक काकटेल की ओर धकेल रहे हैं जिसमें अपनी प्राचीन गौरवशाली अस्मिता को सहेजने का दावा छल से अधिक नहीं रह गया है। क्या संघ को इस पर गौर करने की जहमत नहीं उठानी चाहिए।

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