बहुमत बनाम गठबंधन सरकार

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2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात माडल की चर्चा ने बड़ा गुल खिलाया था। आजकल आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बंगाल का राजनीतिक माडल चर्चाओं के केन्द्र में है। हालांकि 2024 अभी बहुत दूर है लेकिन विपक्ष अभी से भाजपा के खिलाफ शिकंजा कसने की तैयारी में जुट पड़ा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि तीसरी बार पश्चिम बंगाल में धमाकेदार ढंग से चुनाव जीतने के बाद तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाने की भूमिका रच रही हैं और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अपनी अहंकार ग्रन्थि को किनारे करके उन्हें प्रोत्साहित करने की मंशा दिखा रही है।
पश्चिम बंगाल का चुनाव संग्राम इस बार भीषण था जिसे ममता बनर्जी को करो या मरो के अंदाज में लड़ना पड़ा। हालांकि इस कटिबद्धता के कारण उन्हें तृणमूल कांग्रेस के समर्थक मतदाताओं के तो वोट मिले ही बल्कि किसी भी पार्टी के भाजपा को हराने के लिए प्रतिबद्ध मतदाताओं ने भी आखिर में सिर्फ उन्हीं को चुनने में गनीमत मानी। जिसकी वजह से राज्य से वामदलों और कांग्रेस का सफाया हो गया। ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा ही परिदृश्य गढ़ने को उद्यत हैं।
उनकी योजना गैर एनडीए दलों का एक फ्रंट बनाने की है जिनमें से कई उनकी तरह अपने-अपने राज्यों में सरकार चला रहे हैं। इसके पीछे उनके चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का भी दिमाग है। हाल ही में प्रशांत किशोर ने प्रियंका गांधी बाड्रा और राहुल गांधी से मुलाकात की थी। कांग्रेस की ऐसे फ्रंट में क्या भूमिका होगी यह स्पष्ट नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस का रूख फिलहाल ममता बनर्जी के लिए उत्साहजनक है। कांग्रेस ने अधीर रंजन चैधरी को बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इसलिए हटा दिया ताकि तृणमूल नेतृत्व को खुश किया जा सके। इसी कड़ी में ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को पेगासस जासूसी का शिकार बताते हुए कांग्रेस ने उनकी तस्वीर अपने ट्विटर हैंडिल पर डाल दी। जिससे टीएमसी के साथ संबंध को और बल मिला। पार्टी ने राज्य सभा में अपने नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को संसद में टीएमसी के साथ समन्वय के लिए नियुक्त भी कर दिया है। इसी बीच तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार देश की राजधानी की पांच दिन की यात्रा पर आयी ममता बनर्जी ने नई दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात की है और दोनों के बीच लंबी राजनीतिक चर्चा हुई है।
पेगासस जासूसी मामले में संसद में सबसे ज्यादा आक्रामक रूख टीएमसी सांसदों ने ही दिखाया है जबकि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने इस मामले की जांच के लिए दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन कर दिया है जिसमें उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मदन बी लोकुर और कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ज्योर्तिमय भट्टाचार्य को शामिल किया गया है। यह कदम जताते हैं कि विपक्ष की धुरी बनने के लिए ममता बनर्जी किस कदर संजीदा हैं। भाजपा के सर्वसत्तावाद के खतरे को अगर वे ढंग से उभारने में सफल रहती हैं तो लगभग सभी राज्यों के प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़ सकती हैं। उधर कांग्रेस ने भी वास्तविकता से समझौता करते हुए भाजपा को केन्द्र की सत्ता से अपदस्थ कराना अपनी प्राथमिकता स्वीकार कर लिया है। भले ही इसके बाद भी सत्ता उसके हाथ में आये या नहीं।
ममता बनर्जी के फ्रंट के मामले में कांग्रसे का रोल संयुक्त मोर्चा सरकार युग जैसा हो सकता है। चुनाव में संयुक्त मोर्चा के दलों के उम्मीदवारों से कांग्रेस उम्मीदवारों की भिड़ंत हुई थी लेकिन चुनाव बाद सरकार बनाने के मौके पर भाजपा को सत्ता से दूर रखने के नाम पर उसे संयुक्त मोर्चा को समर्थन देने में परहेज नहीं हुआ। यह भी सवाल किये जा रहे हैं कि अगर गैर एनडीए फ्रंट बनाने में ममता बनर्जी का प्रयोजन खुद को आगामी चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट करना रहा तो क्या अन्य दलों के क्षत्रप उनसे छिटक नहीं जायेंगे। इस मामले में ममता बनर्जी की ओर से यह स्पष्ट किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री पद के लिए अभी से उनको क्या किसी को भी प्रोजेक्ट करने की क्या जरूरत है। आखिर संयुक्त मोर्चा की सरकार बनने के पहले किसने एचडी देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने की कल्पना की थी। इस कारण प्रधानमंत्री का नाम तो चुनाव बाद भी आसानी से तय हो जायेगा।
गठबंधन की सरकारें रेडिकल चेंज नहीं कर सकती इसलिए उनसे जनता की भलाई संभव नहीं है यह मिथक भाजपा की भारी बहुमत की सरकार के प्रदर्शन से टूट गया है। जनता के विभिन्न वर्गो की आकांक्षाओ का समायोजन गठबंधन सरकार में ही प्रतिबिंबित हो सकता है जबकि पूर्ण बहुमत की सरकार कारपोरेट इजारेदारी के राजनैतिक प्रतिफलन के नतीजे में सामने आयी है जो अपने आकाओं की स्वार्थ पूर्ति के लिए जनता के भीषण शोषण की नीतियां लागू करने के लिए अभिशप्त है। अगर विपक्ष का संभावित फ्रंट इस धारणा के अनुरूप एजेंडा बनाकर मैदान में उतरता है तो वह जनमत का रूख मोड़ने में भी सफल हो सकता है।
बहरहाल पश्चिम बंगाल में भाजपा की करारी हार ने विपक्ष को अपना खोया मनोबल वापस हासिल करने का अवसर दे दिया है जिसके कारण उसमें पैनी रणनीतियां तैयार करने का माद्दा लौट आया है। यह कवायद आगे बढ़ी तो तात्कालिक तौर पर उत्तर प्रदेश सहित अगले वर्ष की शुरूआत में होने वाले पांच राज्यों के चुनाव में इसका असर होता दिखाई पड़ सकता है। जिनमें भाजपा पिछड़ी तो मनोवैज्ञानिक तौर पर उसके प्रभाव के क्षरण का सिलसिला चल पड़ेगा।