जाको झूला मन न अघाय, रसिया न माने सजनी,दशम दिवस के झूला में शास्त्रीय और सुगम संगीत में हुई बेजोड़ प्रस्तुतियां

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कोंच। ऐतिहासिक रामलला मंदिर में जारी झूला महोत्सव के दसवें झूला में संगीत मर्मज्ञों ने शास्त्रीय और सुगम संगीत में बेजोड़ प्रस्तुतियों से रामलला सरकार को प्रसन्न करने का सफल प्रयास किया। कोविड के चलते बाहर के शास्त्रीय बिधा के जानकारों का जमावड़ा भले ही न लगा हो लेकिन स्थानीय पक्के रागियों की मौजूदगी झूला महोत्सव में चार चांद लगा रहे हैं।
मंदिर के एकादश गद्दीधर महंत रघुनाथ दास के सानिध्य में आयोजित झूला महोत्सव का शुभारंभ सेवानिवृत्त संगीत आचरण ग्यासीलाल याज्ञिक द्वारा संगीत की देवी मां शारदा के आह्वान से हुआ। उन्होंने राग जय जयवंती बड़ा खयाल एक ताल में प्रस्तुति दी, ‘पालना लग बाढे बढैया, रतन जड़त के बने हैं पालना’। राजेंद्र प्रजापति ने राग मालकौंस तीन ताल में गाया, ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज, मेरे तुम बिन बिगरे सबरे काज’। हरीश याज्ञिक ने राग यमन चार ताल में गाया, ‘विनती करत तोरे द्वार, रखियो प्रभु मोरी लाज’। देवयानी याज्ञिक ने झूला सुनाया, ‘प्यारी झूलन पधारो झुक आए बदरा, झुक आए बदरा घिर आए बदरा’। पूजा मिश्रा ने गाया, ‘तुमने बंशी बजाई शाम हो गई, कदम की डारी पे बैठे मुरारी’। तनिष पाठक ने राग भीमपलासी एक ताल में गाया, ‘कासे कहूं जिया की बात, ढीठ लगा छलिया श्याम’। शीतलसिंह बुंदेला, रिया कुशवाहा, सृष्टि वर्मा, वीरेंद्र त्रिपाठी, सौम्या त्रिपाठी, अपूर्व याज्ञिक, बुद्धसिंह बुंदेला, मंगल बाबा कुदरा, विनोद राही, ऋतु याज्ञिक, ऋचा याज्ञिक आदि ने पक्के रागों और सुगम संगीत में कर्णप्रिय भजनों का गायन किया। संचालन रामकृष्ण सिंह परिहार ने किया। तबले पर महेश कुमार और हारमोनियम पर रामप्रकाश संगत कर रहे थे। अंत में पुजारी गोविंददास ने रामलला सरकार की आरती उतारी और प्रसाद वितरित किया गया।