योगी मंत्रिमंडल का नीरस विस्तार

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उत्तर प्रदेश में योगी मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार आखिरकार हो गया है। इस विस्तार में जिनके नामों की चर्चा पहले से थी उन्हें जगह नहीं मिल पायी है, जितिन प्रसाद को छोड़कर। बेहद लो प्रोफाइल वाले विधायकों को समायोजित करके विस्तार की यह कवायद पूरी कर ली गई जो लोगों में किसी भी तरह का रोमांच पैदा करने में विफल रही है। इस विस्तार के माध्यम से योगी ने एक बार फिर जता दिया है कि यूपी मायने सिर्फ योगी है। केन्द्र के रिमोट कंट्रोल का उन पर कोई जोर चलने वाला नहीं है।
उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चायें काफी समय से चल रही थी लेकिन पार्टी हाईकमान द्वारा इसमें सुझाये जा रहे नाम योगी गवारा नहीं कर रहे थे जिससे विस्तार टलते-टलते यह नौबत बन गई थी कि लोगों ने मान लिया था कि अब जब चुनाव के लिए बहुत कम समय बचा रह गया है तो योगी विस्तार क्या करेंगे। इसी बीच उत्तर प्रदेश के नये प्रभारी बनने के बाद धर्मेन्द्र प्रधान लखनऊ आये तो उन्होंने योगी का मिजाज बदला जिससे अचानक 26 सितम्बर को घोषणा हुई कि आज शाम प्रदेश में नये मंत्रियों को शपथ ग्रहण कराई जायेगी। इसके कारण लोगों में कौतूहल रहा कि कौन नये मंत्री बनते हैं और कौन वर्तमान मंत्री हटते हैं। पर जब विस्तार की तस्वीर सामने आयी तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया की कहावत चरितार्थ दिखी।
आसन्न चुनाव के समय जब मंत्रिमंडल में परिवर्तन होता है तो विवादित मंत्री हटाये जाते हैं ताकि एन्टी इन्कम्बेंसी फैक्टर को उनके साथ काफी हद तक विदा किया जा सके। पर योगी ने ऐसे किसी मंत्री पर गाज गिराना उचित नहीं समझा। उन बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश चन्द्र द्विवेदी पर भी नहीं जिनके भाई को सवर्ण गरीबों के आरक्षण कोटे से कालेज में प्रवक्ता की नौकरी दिलाने का प्रयास किया गया था और जब मीडिया में इसका खुलासा हुआ तो उन्हें बैकफुट पर जाना पड़ा था। पूर्व नौकरशाह एके शर्मा जो प्रधानमंत्री सचिवालय से इस वायदा के साथ वीआरएस दिलाकर लखनऊ भेजे गये थे कि वे लखनऊ में योगी सरकार के रिमोट कंट्रोल की भूमिका में स्थापित किये जायेगें, उन्हें योगी पहले से ही कोई भाव नहीं दे रहे थे फिर भी लोगों को उत्सुकता थी कि अब इतने दिनों बाद योगी कुछ पसीजे है कि नहीं तो एके शर्मा का नम्बर फिर योगी ने नहीं लगाया। हालांकि केन्द्र की जितिन प्रसाद को मंत्रिमंडल में जगह देने की बात उन्होंने संतुलन बनाने के लिए मान ली।
जितिन प्रसाद को ब्राह्मणों को संतुष्ट करने के नाम पर प्रदेश मंत्रिमंडल में स्थान दिलाया गया है लेकिन कितने लोग हैं जो जानते हैं कि जितिन प्रसाद ब्राह्मण हैं। दूसरी ओर उनके मंत्री बनते ही उनके परिवार के गैर बिरादरी कनेक्शन की पोस्ट सोशल मीडिया पर छाने लगी जिससे उनकी रही सही प्रमाणिकता भी धराशायी हो गई। जितिन प्रसाद ने बिकरू कांड के बाद उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा ब्राह्मणों के कथित दमन के खिलाफ अभियान चलाया था। अब वे उन्हीं योगी की टीम का हिस्सा बन गये हैं यह उनकी कितनी बड़ी फजीहत है। वैसे भी जबकि उनके पिता प्रधानमंत्री के रूप में नरसिंहाराव के सलाहकार और कांग्रेस की बड़ी हस्ती रह चुके थे साथ ही वे खुद मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री सुशोभित हो चुके हैं। इसके बावजूद अब उनका प्रदेश मंत्रिमंडल में शामिल होना आसमान से गिरे खजूर में अटके की तरह की दुर्गति है। जितिन प्रसाद के नाम के अलावा अन्य नये मंत्री व्यापक रूप से प्रदेश के लोगों के लिए अपरिचित जैसे हैं। कटाक्ष में कहा तो यहां तक जा रहा है कि खुद योगी भी अपने नये सहयोगियों के नाम अभी याद नहीं कर पाये होंगे।
मंत्रिमंडल विस्तार में अपनी क्षमता और प्रतिभा को लेकर निखरी पहचान वाले चेहरों को शामिल करने पर ध्यान दिया जाता है ताकि इसका सकारात्मक संदेश लोगों तक उनका दिल जीतने के लिए पहुंचाया जा सके। इस दृष्टि से भी यह विस्तार नाकाम है। इस नीरस विस्तार में केवल जातिगत जोड़तोड़ पर निगाह फेंकी गई है। एक ब्राह्मण, तीन पिछड़े, दो दलित और जनजाति सदस्य को स्थान देकर। वैसे जातिगत समीकरण साधते हुए भी सदस्यों का चयन उनकी व्यक्तिगत विशिष्ट पहचान के आधार पर भी संभव हो सकता था जो कि दूरदर्शिता और बुद्धिमततापूर्ण कहलाता।
योगी के स्वभाव में है कि उन्हें दमखम वाले नेताओं के साथ टीम बनाना रास नहीं आता। जैसे पिछड़ों में पूर्व मुख्यमंत्री स्व0 कल्याण सिंह के सुपौत्र संदीप सिंह को मंत्रिमंडल में लिया जाता तो वे लाभप्रद हो सकते थे चूंकि कल्याण सिंह पिछड़ी जातियों को संवेदित करने वाला बड़ा नाम था। पर संदीप सिंह योगी का अनुग्रह नहीं प्राप्त कर सके। इसी तरह अनुसूचित जाति से पल्टूराम व दिनेश खटीक को समायोजित किया गया है। ये दोनों ही खटीक बिरादरी के हैं लेकिन इसी बिरादरी के मजबूत नेता विद्यासागर सोनकर को उन्होंने उपेक्षित कर दिया। मंत्री पद के दावेदारों में एक नाम संजय निषाद का भी था लेकिन उन्हें भी मंत्री नहीं बनाया गया। ब्राह्मणों में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का नाम उन्हें सुझाया गया था लेकिन योगी ने उनको भी दरकिनार कर दिया।
नये मंत्रियों में सिर्फ जितिन प्रसाद को कैबिनेट का दर्जा मिला है जबकि छत्रपाल सिंह गंगवार, पल्टूराम, संगीता बलवंत बिन्द, संजीव कुमार गौड, दिनेश खटीक व एमएलसी धर्मवीर प्रजापति राज्यमंत्री बनाये गये हैं। इस संबंध में ध्यान देने वाली बात यह है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल से कुछ दिनों पहले संतोष गंगवार की छुटटी कर दी गई थी जिससे बरेली क्षेत्र के गंगवार कुर्मियों में भाजपा के प्रति नाराजगी पनप रही थी। उन्हें मनाने के लिए छत्रपाल सिंह गंगवार का नाम दिल्ली से दिया गया होगा लेकिन योगी ने इस पर वीटो नहीं लगाया।
पिछड़ों और दलितों को अब बेचारगी गवारा नहीं है। दूसरों पर प्रभावी होने की क्षमता रखने वाले दलित और पिछड़े चेहरे ही अपनी बिरादरी में मान्य हो पाते हैं जबकि योगी की निगाह में उनका यह गुण उदंदडता की कोठी में ठहरता है। इसलिए इस विस्तार में योगी ने दलितों और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व तो बढ़ाया लेकिन बेचारे प्रजाति के चीन्हकर। इन वर्गो के मंत्रियो को अपने निर्वाचन क्षेत्र के बाहर कोई नहीं जानता और न ही वे इतने तेज तर्रार हैं कि मंत्री बनने के बाद कोई बड़ी पहचान प्रदेश स्तर पर बना सकें।
दिनेश खटीक मेरठ के हस्तिनापुर से निर्वाचित हैं। उन्हें मंत्री बनाने के पीछे एक अंधविश्वास का हाथ माना जा रहा है। कहा जाता है कि हस्तिनापुर से जिस पार्टी का विधायक चुना जाता है उसी पार्टी की सरकार बनती है। दिनेश खटीक को मंत्री बनाकर हस्तिनापुर में फिर से उनकी जीत सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है ताकि वे प्रदेश में योगी सरकार के लिए खुशामदीद साबित हो सकें। दूसरी ओर एक और अंधविश्वास का निर्वाह न होने से  मंत्रिमंडल के विस्तार का यह अवसर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कुपित होने का भी कारण बन गया है। मान्यता यह है कि पितृ पक्ष में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता पर योगी ने यह जानते हुए भी मंत्रिमंडल विस्तार के लिए पितृ पक्ष का ही मुहुर्त चुनकर उलटबांसी लिखने का दुस्साहस कर डाला।
इस बीच विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। नवम्बर के महीने में मतदाता सूची का पुनरीक्षण शुरू हो जायेगा जिससे प्रशासनिक फैसलों पर प्रतिबंध लग जायेंगे। नवम्बर के बाद एक दो महीने ही बचेगे जिनमें सरकार काम कर सके। इस तरह नये मंत्रियों को कुछ कर दिखाने के लिए केवल कुछ हफ्तों का समय मिलने वाला है और उस पर भी तुर्रा यह है कि उनका पराक्रम संदिग्ध है तो शासन की छवि सुधारने में उनकी उपयोगिता कितनी साबित हो पायेगी यह बताने की जरूरत नहीं है।
उत्तर प्रदेश आबादी की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है। जो 80 लोकसभा सदस्य चुनकर दिल्ली भेजता है। दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी इस बहुत कुछ दारोमदार उत्तर प्रदेश पर टिका रहता है। इसलिए उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व काफी संवेदनशीलता दिखा रहा था लेकिन अब उसने योगी की जिद के आगे घुटने टेक दिये हैं और उत्तर प्रदेश को पूरी तरह योगी के भरोसे छोड़ दिया है। अगर योगी चुनाव में सफल होते हैं तो उनकी राष्ट्रीय दावेदारी तक मजबूत हो जायेगी लेकिन अगर  भाजपा की सीटें 200 से कम रह गई तो उत्तर प्रदेश में केन्द्रीय नेतृत्व को चेहरा बदलने का अवसर मिल जायेगा। इस तरह योगी के लिए स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं देखना है कि इनसे पार पाने में वे कितना खरा साबित हो पाते हैं।