कटुता की राजनीति के खिलाफ जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे मोदी

कटुता की राजनीति के खिलाफ जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे मोदी

लोकसभा चुनाव का इस बार का जनादेश कटुता की राजनीति के खिलाफ था और सत्तारूढ़ पार्टी को यह नसीहत देने के लिए था कि वह देश के हित, सुरक्षा और विकास के लिए विवादों से परे होकर काम करे ताकि अनावश्यक टकराव में सरकार और राजनीतिक शक्तियों की ऊर्जा बर्बाद न हो। पिछले 10 वर्षो में प्रधानमंत्री की बढ़ती मनमानी से लोग वितृष्णा अनुभव करने लगे थे। हालांकि उनकी क्षमताओं और काम करने की दिशा के लोग कायल भी रहे। इसलिए लोगों ने ऐसा जनादेश दिया कि सरकार के काम में व्यतिक्रम भी न हो पर उसकी छुट्टा रफ्तार में लगाम भी लग सके। उम्मीद थी कि अकेले दम पर बहुमत हासिल न कर पाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी के रवैये में सुधार होगा और जैसा कि उन्होंने तीसरी बार अपनी सरकार के गठन के अवसर पर कहा था कि सरकारें बहुमत से बनती हैं लेकिन देश सर्वसम्मति से चलता है इस भावना के अनुरूप फैसलें लिये जायेंगे।
लेकिन नई संसद के कार्यारम्भ के दिन ही मोदी ने जो किया उससे जाहिर हो गया कि वे नहीं सुधरने वाले। एक तो ओम बिड़ला को लोकसभा का पुनः अध्यक्ष बनाना ही गलत था। अपने पहले कार्यकाल में बिड़ला ने अध्यक्ष के रूप में स्वतंत्र होकर फैसले लेने की क्षमता दिखाने की बजाय सरकार के अनुचर की तरह की भूमिका निभाई थी जिससे स्वस्थ्य संसदीय परंपराओं को धक्का लगा था। इनमें बड़ी संख्या में विपक्षी सांसदों का निष्कासन का फैसला शामिल रहा। संवैधानिक रूप से 17वी लोकसभा में भले ही किसी दल के पास विपक्ष का दर्जा पाने लायक संख्या बल न रहा हो लेकिन अगर वह चाहते तो सरकार से कांग्रेस के नेता को एलओपी का दर्जा देने का आग्रह कर सकते थे जो सदन की सार्थकता के लिए बहुत उचित होता लेकिन प्रधानमंत्री के आगे अपनी अलग राय रखने की दिलेरी बिड़ला कैसे दिखा पाते इसलिए एलओपी की नियुक्ति के मामले में वे खामोश रहे जिससे पिछली लोकसभा पूरे कार्यकाल में अधूरी लंगड़ी सी दिखायी देती रही। कई महत्वपूर्ण विधेयक उनके सहयोग के कारण ही सरकार बिना विपक्ष के पास कराने में सफल रही जो कि जनोन्मुखी संवैधानिक व्यवस्था पर बड़े आघात की तरह का काम था।
बहरहाल सरकार के अड़ियल रवैये से विपक्ष को ओम बिड़ला के खिलाफ उम्मीदवार उतारने का फैसला लेना पड़ा लेकिन विपक्ष ने फिर भी उच्च परंपराओं का ध्यान रखा जिसके कारण उसने नाममात्र के विरोध तक इस मामले में अपने को सीमित किया और ध्वनि मत से ओम बिड़ला के चुने जाने की घोषणा मंजूर कर ली, मत विभाजन की मांग नहीं की। इतना ही नहीं इसके बाद ओम बिड़ला को उनके आसन पर ले जाने में भी नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पूरे शिष्टाचार का पालन किया और प्रधानमंत्री के साथ जाकर उन्हों कुर्सी पर बैठाया। इससे सौमनस्य का जो वातावरण बना था मोदी के इशारे पर ओम बिड़ला ने अगले ही क्षण नष्ट भ्रष्ट कर दिया। दरअसल यह अचानक नहीं हुआ बल्कि मोदी पहले से ही यह दिखाने पर आमादा थे कि जनादेश का उनके मनोबल पर कोई असर नहीं होगा और वे विपक्ष के प्रति ज्यों का त्यों ढ़ीठ रवैया दिखायेंगे। यही कारण है कि उन्होंने संसद के पहले सत्र के लिए आपातकाल लागू करने के समय को चुना और इसके अनुरूप अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते ही ओम बिड़ला ने आपातकाल के गढ़े मुर्दे को सबसे पहले उखाड़ा जिसका कोई औचित्य नहीं था।
आपातकाल के फैसले का विरोध जताते हुए मतदाताओं ने 1977 में इन्दिरा गांधी को गद्दी से उतार दिया था लेकिन ढाई वर्ष बाद ही वे इसे लेकर पछतावा करने पर आ गये। 1980 में लोगों ने इन्दिरा गांधी का फिर बड़े बहुमत से राज तिलक कर दिया। इस तरह बाद में आपातकाल का मुद्दा उठाना जनादेश का अपमान करने जैसा काम था इसलिए 1980 के बाद कई बार फिर गैर कांग्रेसी सरकारें बनी, यहां तक कि भाजपा की सरकार भी बनी पर किसी ने आपातकाल को लेकर सदन में कांग्रेस की निंदा करने पर कोई जोर नहीें दिया। पर मोदी की सबसे बड़ी पूंजी अतीत राग है जबकि वर्तमान के प्रदर्शन को लेकर उनके खाते में इतनी उपलब्धियां हैं कि उनकी चर्चा उनके लिए ब्रह्मास्त्र साबित हो सकती। लेकिन उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि लोग अपनी आदत के बंधक बन जाते हैं और मोदी भी आदत से मजबूर होने का अपने पर चस्पा टीका छुटा नहीं पा रहे हैं।
आपातकाल के बेतुके जिक्र के पीछे उनकी यह रणनीतिक सोच भी थी कि इस मुद्दे को पुनर्जीवित करने से चुनाव में दिखाये गये संविधान बदलने के खतरे के मुद्दे को वे विपक्ष के लिए वे बूमरेंग कर सकेंगे। चुनाव में खासतौर से दलितों ने और साथ में ओबीसी ने भी यह दिखाया था कि बाबा साहब द्वारा तैयार किये जाने के कारण भारत का संविधान उनके लिए पवित्र ग्रंथ जैसा दर्जा रखता है जिसे खत्म करने की हिमाकत वे किसी को नहीं करने दे सकते। सोच यह थी कि भाजपा पर तो यह आरोप काल्पनिक था लेकिन यह साबित होने पर कि कांग्रेस अपने समय जरूर संविधान को खत्म करने की कोशिश कर चुकी थी तो लोग वर्तमान माहौल में कांग्रेस पर बुरी तरह भड़क जायेंगे। लेकिन मोदी और उनके सहयोगी यह विचार न कर सके कि हर मुद्दे के कई ऐंगल होते हैं। सवाल यह है कि जिससे चर्चा की जानी है उसके लिए इसका सेंस क्या है। लोगों ने आरक्षण को धता बताने की साजिश के सेंस के बतौर संविधान बदलने की चर्चा को संज्ञान में लिया जबकि आपातकाल में आरक्षण को कमजोर करने जैसी किसी भी कार्यवाही की झलक तत्कालीन सरकार द्वारा नहीं दी गई थी इसलिए आपातकाल की चर्चा के द्वारा संविधान बदलने के मुद्दे को विपक्ष की ओर डायवर्ट किये जाने का सवाल ही नहीं उठता।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा में टकराव के आसार के और प्रगाढ़ होने की स्थितियां बन गई हैं। विपक्ष के नेता के रूप में बोलते हुए राहुल गांधी ने लोकसभा में लंबा भाषण दिया जो इतना प्रहारक था कि पूरा सत्ता पक्ष तिलमिला गया। 10 सालों में पहली बार यह देखा गया जब प्रधानमंत्री को राहुल के प्रतिवाद के लिए स्वयं खड़े होना पड़ा। अमित शाह तो राहुल गांधी के प्रहार से बचाने के लिए आसन का संरक्षण मांगने को मजबूर हो गये। चूंकि काम के आधार पर विपक्ष को पस्त करना चाहें तो सरकार के तरकश में तीरों की भरमार है लेकिन अर्ध सत्य बातों को आधार बनाकर विपक्ष के खिलाफ दुष्प्रचार का सहारा ही उसे जबाव के नाम पर ठूसता है और राहुल गांधी के भाषण के संदर्भ में भी भाजपा अपने इस तरीके से बाज नहीं आयी है। राहुल गांधी ने कहा यह था कि भाजपा हिन्दू हो ही नहीं सकती क्योंकि उसने अपने हिन्दुत्व को हिंसा और नफरत से जोड़ रखा है जो कि हिन्दू मिजाज के खिलाफ है। भाजपा ने उनके इस बयान को तोड़ मरोड़कर यह प्रचारित करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है कि भाजपा ने सारे हिन्दुओं को हिंसक कहकर हिन्दुओं का अपमान किया है। पर भाजपा के झूठे स्यापे के इस तरीके से आम लोग परिचित हो चुके हैं इसलिए उसके आरोप पर कोई व्यापक उद्वेलन जनता में नहीं हो पा रहा। इस बीच राहुल गांधी के भाषण के कई अंश लोकसभा की कार्यवाही से निकलवा दिये गये हैं जबकि यह कतई विधि संम्मत नहीं है क्योंकि राहुल गांधी ने कोई ऐसा कथन नहीं किया जो असंसदीय हो। पिछले सत्र में भी जब राहुल गांधी ने हिंडनवर्ग रिपोर्ट मामले में चर्चा के समय कई बार अदाणी के रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिया तो बिड़ला द्वारा उन अंशों को भी हटवा दिया गया था जो स्पष्ट रूप से सीनाजोरी थी। लोकतंत्र में विपक्ष प्रधानमंत्री की आलोचना नहीं करेगा तो क्या रिक्शे वाले की आलोचना करेगा। ऐसा लगता है कि किन कथनों को लोकसभा की कार्यवाही में शमिल किया जाये और किन्हें हटा दिया जाये इसका कोई नियम नहीं है। होना यह चाहिए था कि राहुल गांधी के कथनों को सदन की कार्यवाही से डिलीट कराने की बजाय अपनी बारी आने पर प्रधानमंत्री राहुल गांधी को चारों खाने चित करने वाले जबाव देने का कौशल दिखाते लेकिन शायद इस मामले में उनका आत्मविश्वास लड़खड़ा रहा था।
मोदी जी को यह प्रदर्शित करने के उन्माद से उबरना चाहिए कि उन्हें किसी जबावदेही में नहीं बांधा जा सकता और न ही उन पर सवाल उठाने का अधिकार किसी को दिया जा सकता। यही हेकड़ी उन्हें 18वी लोकसभा के चुनाव में ले डूबी भले ही सरकार उन्होंने बना ली हो। इसलिए उन्हें सदबुद्धि से काम लेना चाहिए जिसमें विपक्ष को विश्वास में लेकर देश के लिए बड़े फैसले लेना शामिल हैं। उनके प्रयास करने भर की देर है कि जिस गठबंधन सरकार को चलाने में उन्हें तौहीन महसूस हो रही है वह उनके लिए वरदान का अवसर बन सकती है। सहयोग के रचनात्मक माहौल में सरकार चलाकर वे पहले से ज्यादा बड़े फैसले लेकर दिखा सकते हैं।

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