• September 12, 2023

सनातन धर्म के मुद्दे का भाजपाई तीर क्यों हो रहा बेअसर

सनातन धर्म के मुद्दे का भाजपाई तीर क्यों हो रहा बेअसर

सनातन धर्म के मुद्दे का रंग नहीं चढ़ पा रहा है जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया था कि वे इस संबंध में उदयनिधि स्टालिन द्वारा दिये गये बयान का करारा जबाव दे ताकि विपक्ष के उत्साह को धरातल पर लाया जा सके। इसके अनुसरण में कई मंत्री सक्रिय हुये। उन्होंने स्टालिन के साथ साथ इंण्डिया गठबंधन और खासतौर से कांगे्रस पार्टी को इस मामले में लपेटने के लिये पूरा जौहर दिखाया लेकिन जनता से उन्हें वैसा रिस्पांस नहीं मिला जिसकी वे अपेक्षा कर रहे थे। इस कारण उनका जोश ठंडा पड़ गया।
कुछ महीनों से यह अचानक हुआ है कि भाजपा विपक्ष के विरोध में जो नये नये विमर्श गढती है उसे लोगों का पहले जैसा समर्थन नहीं मिलता। पहले भाजपा नेताओं के कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने के अभियान का नया कदम आते ही सारे देश में आग लग जाती थी। लेकिन अब लगता है कि जैसे लोगों की सोच से भाजपा का मुलम्मा उतर गया है। जनता पहले की तरह उनके भड़काने से भड़कती नहीं है। भाजपा की मारक शक्ति को यह क्या हो गया है इस पर पार्टी और सरकार की कोर कमेटी चिंतन कर रही है।
इसके लक्षण कर्नाटक विधानसभा के चुनाव अभियान के समय सामने आये जब कांग्रेस ने सत्ता में आने पर बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का बयान दिया तो भाजपा के लोगों ने हमेशा की तरह इसे ले उड़ने की कोशिश की। कांगे्रस पर यह कहते हुये हमला किया जाने लगा कि वह बजरंगबली पर रोक लगाना चाहती है। कर्नाटक में जगह जगह बजरंगबली के जयकारे के नारे लगने लगे, हनुमान चालीसा पढ़ा जाने लगा। इस घेराबंदी से कांग्रेस के भी कई नेता परेशान हुये लेकिन केंद्रीय नेतृत्व स्थिर रहा। उसने भाजपा के हमले पर रक्षात्मक होकर सफाई देने की बजाय उस पर 40 परसेंट कमीशन की सरकार को बदलने के आवाहन के रूप में प्रत्याक्रमण शुरू कर दिया। यह रणनीति काम कर गयी और चुनाव नतीजों में कांग्रेस ने भाजपा को बुरी तरह ढेर कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की विश्वसनीयता आखिर इतनी क्यों घट गयी है कि उनके द्वारा कैसा भी हउआ खड़े करने की कोशिश को लोग नोटिस नहीं करते। इसका सबसे बड़ा कारण है भाजपा का पाखंड जिसकी कलई लोगों के सामने खुल चुकी है। उदाहरण के तौर पर सनातन धर्म का अंत करने की बात करके उदयनिधि स्टालिन ने इंण्डिया के लिये बड़ा धर्म संकट खड़ा कर दिया था। बात यहीं तक सीमित नहीं रही जब कांगे्रस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सुपुत्र ने भी उनका समर्थन कर दिया तो कांग्र्रेस मुसीबत में घिर गयी थी। अनुमान यह था कि यह मुद्दा बेहद संवेदनशील साबित होगा और इंण्डिया गठबंधन की लुटिया डुबो देगा। लेकिन शायद लोगों को भाजपा की करतूतें याद आ गयीं। सनातन धर्म के खिलाफ विष उगलने वालों को भाजपा ने कौन कम कंठहार बनाया है। उसका रिकाॅर्ड भी बताता है कि भाजपा ने कई ऐसे नेताओं को राजनीतिक फायदे के लिये आयात किया जो सनातन धर्म पर हमलों के लिये बेहद बदनाम थे। जैसे उदितराज को 2014 में भाजपा ने ही संसद में पहुंचाया था जो बसपा से होड़ करने के लिये हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ आग उगलते थे। उत्तर प्रदेश में चाहे संजय निषाद हों या ओमप्रकाश राजभर इन्होंने तो भाजपा से जुड़ने के बाद भी हिंदू अवतारों के खिलाफ न जाने क्या क्या कहा लेकिन भाजपाई कभी आहत नहीं हुये। लोगों को यह भी याद है कि भाजपा ने मुफ्ती मुहम्मद सईद की पार्टी से कश्मीर में सरकार बनाने के लिये समझौता किया और पहले मुफ्ती मुहम्मद को और इसके बाद उनके दिवंगत होने पर उनकी पुत्री महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री बनाया जबकि वे लोग खुलेआम अलगाववाद का समर्थन करते थे। राष्ट्रवाद की बात बात पर दुहाई देने वाली भाजपा को विपक्ष की ऐसी कोई कमजोरी पकड़ में आने पर बात का बतंगड़ बनाने में महारत हासिल होती थी लेकिन अपनी बारी आने पर राजनीतिक फायदे के लिये राष्ट्रवाद की जड़ें हिलाने वालों को गले लगाने में उसे कोई आपत्ति महसूस नहीं होती थी।
भाजपा को सत्ता में आये लगभग साढ़े 9 वर्ष हो गये हैं। पहले लोग हिंदुत्व, राष्ट्रवाद आदि को लेकर बहुत आवेशित रहते थे लेकिन अब लगता है कि मतदाताओं ने स्थितिप्रज्ञता को स्पर्श कर लिया है जिसके कारण वे ठंडे दिमाग से और पूरे विवेक के साथ हर बात में चिंतन करते हैं। लोग समझ चुके हैं कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व आदि बातें राजनीतिक पैतरेबाजी है। देश में न कोई पार्टी हिन्दू विरोधी है और न राष्ट्रविरोधी। खासतौर से देशभर में लोगों का अच्छा खासा समर्थन करने वाली पार्टियां इन बातों में उतनी ही निष्ठावान है जितनी भाजपा है। जिस दिन कोई देशव्यापी पार्टी राष्ट्रविरोधी आचरण करने लगेगी उस दिन लोगों की बड़ी तादाद उसके साथ खड़ी नहीं रह जायेगी। लेकिन सबको राजनैतिक मजबूरियों का, राजनैतिक सुविधा का ध्यान रखना पड़ता है फिर वह भाजपा हो या कांग्रेस। इसीलिये कांग्रेस सफाई न भी देती तो लोग द्रमुक नेता के बयान के कारण उसे सनातन धर्म विरोधी नहीं ठहराते। द्रमुक के साथ किसी राष्ट्रीय पार्टी का पहला गठबंधन नहीं है। अटल बिहारी बाजपेयी भी अपनी सरकार में द्रमुक को शामिल कर चुके हैं जबकि द्रमुक तो शुरू से हिंदू धर्म के खिलाफ रही है। उसके प्रेरणा श्रोत पेरियार ने भगवान राम तक के खिलाफ अलख जगायी थी और उनके विचारों को लेकर ही द्रमुक तमिलनाडु में अपनी हैसियत बना पायी थी। एक समय लगता था कि द्रमुक पार्टियों के इस रूझान के कारण तमिलनाडु में देश से अलग होने का रूझान जोर न पकड़ ले। तमिलनाडु को समग्र भारत में समाहित रखना एक दुष्कर चुनौती की तरह था लेकिन जब राष्ट्रीय पार्टियों के साथ उसने गठजोड़ को स्वीकार किया तो अब इस चुनौती का अंत हो चुका है। लोकतंत्रीकरण ने भारत में अदभुत चमत्कार किया है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में नजर आने वाली अलग अलग राष्ट्रीयताओं को अपनी सहिष्णुता से आखिर यह देश जज्ब करने में सफल रहा। भारत की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है जिसके साथ क्षुद्र राजनैतिक स्वार्थो के लिये खिलवाड़ बहुत भारी पड़ सकता है यह बात भाजपा को समझनी पड़ेगी।
जहां तक सनातन धर्म की बात है उसके दीर्घजीवी होने का रहस्य उसकी गतिशीलता में निहित है। अगर दूसरे धर्मों जैसी जड़ता और कट्टरता उसमें होती तो यह धर्म भी अंत के मुहाने पर पहुंच चुका होता। अध्यात्म की पक्षधरता के लिये माने जाने वाले सनातन धर्म ने तो भौतिकवाद के प्रचारक चरक को भी अपने एक ऋषि के रूप में स्वीकार किया है। यह लचीलापन ही उसकी शक्ति है। कबीर ने कहा था कि मेरे इष्ट राम हैं लेकिन किसी दशरथ के पुत्र नहीं। रविदास ने भी कुछ ऐसी ही बात भगवान राम के लिये की थी लेकिन इन दोनों को भी सनातन धर्म ने अपने महान संत के रूप में वरेण्य किया। सनातन धर्म कहता है कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। यहां तक कि आदिगुरू शंकराचार्य ने भी अपने समय की धार्मिक मान्यताओं को संशोधित, परिष्कृत कर अद्वैतवाद की नयी स्थापना का प्रतिपादन किया था तो आज सनातन धर्म की पुस्तकों में समयानुुकूल परिवर्तन क्यों नहीं हो सकते। इस मामले में हठवाद दूसरे धर्मों के प्रभाव का अनुशीलन है जो कतई स्वीकार्य नहीं होना चाहिये। यह स्थिति राजनीति के लिये धर्म के इस्तेमाल के परिणाम स्वरूप बनी है जिसके परिणाम दूसरे धर्म में मची आपसी मारकाट की तरह ही अपने लिये भी विनाशकारी हैंै। बहरहाल यह शुभ संकेत हैं कि मतदाता लौकिक राजनीति की चालों को धार्मिक संदर्भों में देखने की मानसिकता से उबर चुके हैं। भाजपा को इंण्डिया गठबंधन को पीछे धकेलना है तो लोगों के इस संदेश को समझते हुये उसका राजनैतिक मोर्चे पर प्रयास करने की निपुणता अपने अंदर विकसित करनी होगी।

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