स्वाधीनता के बाद हुई उपेक्षा का शिकार रही कोंच रेल सेवा
कोंच-उरई। रेल सेवा विस्तार के लिहाज से कोंच-उरई के बीच मेमू टेªन चलाने के प्रस्ताव का यहां के लोगों ने जोरदार स्वागत किया है और इसे यातायात के लिहाज से कोंच और आसपास के इलाके के लिये संजीवनी मानने वालों की कमी नहीं है लेकिन शर्त यह है कि कोंच-एट के बीच फिलवक्त जारी शटल ट्रेन के जो फेरे हैं और इस शटल का एट में जिन ट्रेनों से कनैक्शन मिलता है वे मिलते रहें।
गुजरे दिनों उत्तर-मध्य रेलवे के महाप्रबंधक अरूण सक्सेना का उरई दौरा था जिसमें उन्होंने कोंच को लेकर एक अहम् बात कही थी कि कोंच-उरई के बीच मेमू ट्रेन चलाने का वह प्रस्ताव भेज रहे हैं और सब कुछ ठीक ठाक रहा तो यह प्रस्ताव मूर्त रूप भी लेगा जिससे कोंच इलाके को रेल सेवा के मामले में उम्दा विकल्प मिल सकेगा। इस प्रस्ताव का स्वागत करने में कोंच के लोगों ने कतई कंजूसी नहीं दिखाई है और चैतरफा से इसे भारी समर्थन मिला है। पालिका चेयरपर्सन प्रतिनिधि विज्ञान विशारद सीरौठिया, दरिद्र नारायण सेवा समिति के संयोजक कढोरेलाल यादव, अवकाश प्राप्त प्राचार्य प्रो. वीरेन्द्रसिंह, मथुराप्रसाद महाविद्यालय एजूकेशन सोसाइटी के मंत्री ओमशंकर अग्रवाल, युवा साहित्यकार अभिनव सरकार, वरिष्ठ रंगकर्मी नरोत्तम स्वर्णकार आदि का मानना है कि अगर कोंच से सीधे जिला मुख्यालय उरई तक रेल सेवा प्रदान करने का विचार रेल विभाग के बड़े अधिकारियों के दिमाग में आया है तो निश्चित रूप से यह कोंच के लिये सौभाग्य का विषय है, वरना अभी तक कोंच रेलवे स्टेशन सरकारी उपेक्षा का दंश आजादी के बाद से ही झेलने के लिये मजबूर रहा है। इन लोगों का मानना है कि इलाके की उखड़ी सड़कों से बुरी तरह चरमराई यातायात व्यवस्था को उरई-कोंच मेमू चलाने से संजीवनी मिलेगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस प्रस्ताव को पटल पर रखते वक्त यह देखने की जरूरत जरूर होगी कि अभी चल रही कोंच-एट शटल के फेरों से जिन गाडियों के कनैक्शन एट जंक्शन पर मिलते हैं वे यथावत् मिलते रहें ताकि रेल यात्रियों को किसी किस्म की असुविधा का सामना न करना पड़े।
इंसेट में-
ये है ब्रिटिश हुकूमत और अपनी सरकार के बीच का फर्क
कोंच-उरई। आज खाद्यान्न उत्पादन में पंजाब राज्य से होड़ लगाने बाला कोंच कभी कपास उत्पादन का भी प्रमुख केन्द्र रहा है, यहां से कपास के मुंबई, कोलकाता या अन्य प्रांतों के लिये निर्यात को देखते हुये ब्रिटिश हुकूमत ने इस छोटे से कस्बे को रेल मार्ग से जोडने की जो पहल शताब्दी भर पूर्व की थी उसे अगर सही दिशा दी जाती तो कोंच आज बुंदेलखण्ड का मेनचेस्टर होता, किंतु स्वाधीनता के बाद मिले उपेक्षा के दंश ने कोंच क्षेत्र के औद्योगिक क्षेत्र बनने के सपने को चकनाचूर करके रख दिया है। कपास एवं खाद्यान्न उत्पादन में अग्रणी कोंच क्षेत्र की उपयोगिता को समझते हुये बरतानवी हुकूमत ने कोंच में रेल यातायात की सुविधा प्रदान की थी। जब ब्रिटिश हुक्मरानों ने देखा कि कोंच न सिर्फ बुंदेलखण्ड क्षेत्र का ही अपितु देश का अग्रणी कपास उत्पादक केन्द्र है तो उन्होंने इस ऐतिहासिक और पौराणिक कस्बे को झांसी-कानपुर मुख्य रेलमार्ग पर अवस्थित एट को जंक्शन बना कर एट-कोंच के बीच 13 किमी लम्बी रेल लाइन बिछा कर रेल यातायात से जोड़ा था। बर्ष 1902 में शुरू हुई यह रेल परियोजना दो साल में पूरी हो गई और 1904-05 में इस लाइन पर रेल यातायात शुरू हो गया। ब्रिटिश हुक्मरानों की सोच थी कि इस रेल लाइन को आगे दिबियापुर तक बढा कर इस क्षेत्र को सीधे दिल्ली से जोड़ा जाये ताकि कोंच से उद्योग व्यापार का सीधा रास्ता खुल सके। उन्होंने अपनी इस सोच को अमली जामा पहनाने की दिशा में शुरूआती होमवर्क भी किया था और आगे की लाइन का सर्वे आदि भी कराया गया लेकिन तब तक पहले विश्व युद्घ के बादल मंडराने लगे थे और ब्रिटिश शासन में शुरू हुई इस परियोजना को ठंडे बस्ते में जाना पड़ा।
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कोंच-एट शटल का छठा फेरा शीघ्र मिलने की उम्मीद
कोंच-उरई। पिछले तकरीबन दो बर्ष से कोंच-एट शटल का छठा फेरा बढ़वाने के लिये लगातार प्रयास करने बालों में प्रमुख चेहरा समाजसेवी अधिवक्ता सुनील लोहिया का उभर कर सामने आता है। महाप्रबंधक के उरई प्रवास को लेकर पहले से ही होमवर्क करके उरई पहुंचे सुनील ने महाप्रबंधक से मुलाकात कर एक बार फिर अपनी मांग दोहरा डाली और उन्हें इस दिशा में सकारात्मक संकेत भी मिले हैं जिनके आधार पर उन्होंने इलाकाई लोगों को आश्वस्त किया है कि कोंच के लोगों को छठे फेरे की सौगात जल्दी ही मिलने की उम्मीद है।
एक मुलाकात में सुनील ने बताया है कि उन्होंने उत्तर मध्य रेलवे के महाप्रबंधक से भेंट कर उन्हें अपनी मांग के समर्थन में ज्ञापन जब दिया तो उन्होंने बताया कि डीआरएम झांसी ने भी इस आशय का प्रस्ताव उन्हें दिया है और रेलवे यात्री हित को ध्यान में रखते हुये इस फेरे को बढाये जाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। बताना समीचीन होगा कि इस छठवें फेरे की मांग यहां के लोग अरसे से करते आ रहे हैं और समाजसेवी सुनील लोहिया ने इस मसले पर प्रभावी पैरोकारी करते हुये मंडल से लेकर रेल मंत्रालय तक प्रभावी लिखापढ़ी की है जिसके फलीभूत होने की उम्मीद दिखाई देने लगी है। इस छठें फेरे जिसे सुबह आठ बजे एट से कोंच और 9 बजे कोंच से एट चलाने की मांग की जा रही है उससे पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा करने बाले गरीब यात्रियों को काफी राहत मिलेगी।







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