कोंच-उरई। छह दिसम्बर देश के इतिहास में हलचल मचा देने वाला दिन है, इसी दिन बर्ष 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे का ध्वंस 06orai02 06orai03हुआ था और पूरे देश में आग सी लग गई थी। लेकिन कहते हैं कि वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है, देशवासी धीरे-धीरे इस घटना को बुरा सपना समझ कर भूलने लगे हैं और जिंदगी की गाड़ी काफी आगे निकल आई है। इस दिन को लेकर कभी पूरे देश में हाई अलर्ट होता था और प्रमुख जगहों पर प्रशासन और पुलिस सतर्क रहा करती थी लेकिन गुजरते वक्त के साथ अब ऐसा कुछ भी नहीं दिखता है और जनजीवन सामान्य गति से आगे बढता जा रहा है।
वर्ष 1992 की वह छह दिसम्बर का ही दिन था जब अयोध्या में राम जन्मभूमि या बाबरी मस्जिद कहलाने बाला विवादित ढांचा भीड़ ने ढहा दिया था। इस दिन को किसी ने शौर्य दिवस के रूप में मनाया तो किसी ने काला दिवस मना कर गम का इजहार किया। यह परम्परा तकरीबन डेढ दशक तक जारी रही और इस मुद्दे को राजनैतिक रूप से भुनाने की कवायदें भी होती रहीं। इस दिन को लेकर समूचे देश में हाई अलर्ट घोषित किया जाता रहा है जिसके तहत रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों आदि पर भारी पुलिस बल तैनात रह कर स्थिति पर नजर रखता रहा है, लेकिन कहते हैं कि वक्त बड़े-बड़े जख्म भरने की सीरत रखता है सो जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है बैसे बैसे देशवासी इस दिन को विसराते जा रहे हैं। शायद लोग समझ चुके हैं कि अगर पुराने जख्मों को ही कुरेदने की प्रवृत्ति बनी रही तो विकास की दौड़ में पिछड़ने के अलावा और कुछ भी हाथ लगने बाला नहीं है, लिहाजा उस घटना को लोग बुरा सपना समझ कर भुलाने और बिना पीछे मुड़े आगे बढते रहने की कोशिशों में तल्लीन हैं। अब प्रशासन और पुलिस भी एहतियातन प्रमुख जगहों की निगहबानी से कतराने लगी है। आज कोंच रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर पुलिस का एक भी जवान नजर नहीं आया, यहां तक कि आज की पीढी से जब च दिसम्बर को लेकर पूछा गया तो एक भी युवा ऐसा नहीं मिला जिसे यह दिन किसी खास घटना की वजह से याद रखने की जरूरत महसूस हुई हो। विहिप, बजरंग दल या किसी अन्य मुस्लिम संगठन ने भी इस दिन को लेकर कोई ऐसा आयोजन नहीं किया जिसे शौर्य दिवस या काले दिवस की संज्ञा दी जा सके।

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