12065564_1515048802143994_20145587447710710_nमाधौगढ़-उरई। राज्य सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट में शुमार 108 नंबर एंबुलेंस योजना की साख को अब बुरी तरह बटटा लगना शुरू हो गया है। इस एंबुलेंस की सेवा कागजों पर सिमट कर रह गई है। चिकित्साधीक्षक के रिपोर्ट देने के बावजूद एंबुलेंस सेवा को सुधारने का कोई जतन नही हो पा रहा है। सीएमओ एंबुलेंस संचालक निजी कंपनी पर इतने मेहरबान है कि सही रिपोर्ट भेजने पर चिकित्साधीक्षक को उनकी फटकार झेलनी पड़ती है।
प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद लागू की गई योजनाओं में जिसे सबसे ज्यादा जनप्रियता मिली थी वह 108 नंबर एंबुलेंस योजना है। कहीं से कोई फोन आया कि एंबुलेंस मरीज को लाने के लिए फौरन उसके दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई। लेकिन अब इसकी अच्छाइयां बीते दिनों की बात बनकर रह गई हैं। कहीं से कोई काॅल आती है तो तपाक से कह दिया जाता है कि एंबुलेंस खराब है। चिकित्साधीक्षक डाॅ. वीके राजपूत की परेशानी यह है कि अस्पताल में आंखों के सामने एंबुलेंस खड़ी देखकर मरीज के तीमारदार उन्हीं से झगड़ पड़ने को उतारू हो जाते हैं। जबकि एंबुलेंस का इटावा जिले का स्टाॅफ उन्हें दो टूक जबाव देने को तत्पर रहता है।
एंबुलेंस में जीपीएस सिस्टम लगाया गया था जिसे इरादतन खराब कर दिया गया है। इस कारण तकनीकी आधार पर एंबुलेंस न जाने की पकड़ खत्म हो गई है। दूसरी ओर चिकित्साधीक्षक की एंबुलेंस स्टाॅफ के खिलाफ रिपोर्ट का महत्व सीएमओ ने समाप्त कर दिया है। अव्वल तो वे रिपोर्ट देखते ही चिकित्साधीक्षक को मोबाइल पर फटकार सुनाना शुरू कर देते हैं। इसके बाद उन्हें इतने पर ही संतोष नही होता बल्कि वे उनकी रिपोर्ट को फाड़कर एंबुलेंस कंपनी के पक्ष में अपने हस्ताक्षरों से नई रिपोर्ट तैयार कर देते हैं। ताकि निदेशालय की आंखों में धूल झोंक सकें।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि एंबुलेंस स्टाॅफ का रवैया भी काफी अभद्र है। मरीजों के परिजनों से कई बार उनका झगड़ा हो चुका है। यही हालत रामपुरा सीएचसी की एंबुलेंस का है। पहले 108 नंबर योजना को लेकर राज्य सरकार की जितनी सराहना होती थी आज उससे ज्यादा कोसना सरकार को उक्त रवैये की वजह से मिल रही है।
क्लीनिकल कचरे को बटोरने की गाड़ी का आना बंद
जिस तरह से एंबुलेंस योजना को सरकार की कृपापात्र कंपनी की कमाई का जरिया बना दिया गया है वैसा ही हाल अस्पतालों के क्लीनिकल कचरे को बटोरने के लिए तय किये गये ठेकेदार का है। सरकार का वरदहस्त होने की वजह से चिकित्सीय कचरा बटोरने के लिए अनुबंधित कंपनी बिना काम किये भुगतान ले रही है। नियम यह है कि उक्त कंपनी की गाड़ी विकिरण के जहरीले प्रभाव को पैदा करने वाली चिकित्सीय कचरे को नियमित अंतराल में सरकारी अस्पतालों से उठवाकर उसके सुरक्षित डिस्पोजल की व्यवस्था करेगी। इस सिलसिले में गाड़ी आने पर जब तक प्रभारी चिकित्साधिकारी या चिकित्साधीक्षक सत्यापन न कर दें तब तक उसे भुगतान नही मिलना चाहिए। चिकित्साधीक्षक ने गाहे-बगाहे ही गाड़ी आने की वजह से जब उसकी लाॅग बुक में इसे इंद्राज कर दिया तो नाराज होकर कंपनी ने यहां गाड़ी भेजना बंद कर दिया है। अब चिकित्साधीक्षक को खुद ही कचरा बटोरवाकर उसे जमीन में गहरे में दफन करने के प्रबंध करने पड़ रहे हैं। हालांकि इस काम का भुगतान फिर भी अनुबंधित कंपनी को ही दिया जा रहा है।

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