16orai14कोंच-उरई। जिले में लंबे अरसे से जारी अबैध खनन के मामला राष्ट्रीय पटल पर चिंता का विषय बना है, सांसद भानुप्रताप वर्मा ने इस मुद्दे को बिगड़ते पर्यावरण से जोड़ते हुये संसद में भी उठाया है। संसद में बोलते हुए भाजपा सांसद भानुप्रताप सिंह वर्मा ने कहा कि पर्यावरण एक ऐसा मुद्दा है जिसकी चिंता आज वैश्विक पटल पर प्रत्येेक राष्ट्र कर रहा है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पर्यावरण के मुद्दे को लेकर खासे चिंतित हैं, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार पर्यावरण के मुद्दे पर बिल्कुल संवेदनशील नहीं है। दिनोंदिन बढ रहे पर्यावरण असंतुलन के कारण प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ रहा है। अभी हाल ही में उत्तर भारत में आया भूकंप इसका ताजा उदाहरण है। इस भूंकप के झटके उनके लोकसभा क्षेत्र समेत समूचे बुंदेलखंड में भी महसूस किये गये थे। उन्होंने कहा कि इस पर्यावरण असंतुलन का एक बड़ा कारण नदियों से धुवांधार तरीके से होने वाला अवैध उत्खनन है जिस पर कारगर ढंग से लगाम लगाने की जरूरत है।
गत दिवस सांसद भानुप्रताप सिंह वर्मा ने लोकसभा में जबर्दस्त तरीके से अवैध खनन के मुद्दे पर कहा कि पर्यावरण असंतुलन के कारण दुनिया का भविष्य आज संकट में है। वह बताना चाहेंगे कि पर्यावरण असंतुलन के कारण ही उनका क्षेत्र पिछले कई सालों से सूखे की मार झेल रहा है। उनका लोकसभा क्षेत्र जालौन-गरौठा-भोगनीपुर जो बुंदेलखण्ड क्षेत्र के अंतर्गत आता है, से कई नदियां निकलती हैं जिसके कारण यहां उच्च गुणवत्ता बाली बालू है जिसकी कीमत बाजार में अन्य बालू के मुकाबले कहीं अधिक है, अतरू इसकी जबर्दस्त मांग के चलते उनके क्षेत्र में बालू खनन बेलगाम तरीके से चल रहा है। आश्चर्य यह है कि इसे अभी तक पर्यावरण मंत्रालय द्वारा आवश्यक मंजूरी नहीं मिली हैं इसके बाबजूद यहां चोरी से बालू का व्यापक पैमाने पर अबैध खनन किया जा रहा है जिससे सरकार को हानि के साथ साथ पर्यावरण को बहुत नुकसान झेलना पड़ रहा है। किसान तबाह हो चुका है, उसकी सिंचाई की एकमात्र उम्मीद भूगर्भीय जल पर टिकी है जो दिन रात लगातार चल रहे बालू खनन के कारण धुंधली होती जा रही है। यह सर्वविदित है कि बालू खनन के कारण जल स्तर नीचे चला जाता है और जमीन की उत्पादन क्षमता भी घट जाती है। उनके संसदीय क्षेत्र जालौन-गरौठा-भोगनीपुर के अधिकतर लोग कृषक कार्यों से जुड़े हुये हैं और बालू खनन के कारण उन्हें खेती में लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। गिरते जलस्तर के कारण हजारों बोरिंग और ट्यूबवैल फेल हो चुके हैं फलतः कई किसान अपनी खेती को पानी भी नहीं दे पाते हैं। यह भी पर्यावरण से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है।
बालू खनन के कारण उनके क्षेत्र की कई नदियों की गहराई बढ़ गई है, जिसके कारण वह अपने आगे का रास्ता तय नहीं कर पा रही हैं, इस वजह से यह चिंता स्वाभाविक ही है कि आने वाले वर्षों में यह नदियां शायद अपना वजूद ही खो दें। खनन के आस पास के क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को दमें और श्वांस संबंधी अन्य बीमारियां भी हो रही हैं। अतरू उनकी केन्द्र सरकार से मांग है कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड में चल रहे बालू खनन पर तत्काल प्रतिबंध लगाकर इन बालू के घाटों की नए आधार से एक केन्द्रीय समिति बनाकर समीक्षा की जाये कि कितने घाटों ने पर्यावरण मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिये हैं और जो घाट बिना पर्यावरण मंत्रालय की अनापत्ति प्रमाण पत्र के चल रहे हैं उनको तत्काल प्रतिबंधित कर दोषी व्यक्तियों पर कार्यवाही की जाये ताकि बुंदेलखण्ड पर्यावरण असंतुलन के कारण होने वाली दैवीय आपदा की मार से बच सके।

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