उरई। जालौन जिले में राजनैतिक जगत के वट वृक्ष कहे जाने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री बाबूराम दादा के निधन से यहां की सियासत के एक महत्वपूर्ण अध्याय का पटाक्षेप हो गया है। बाबूराम दादा लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। बुधवार की रात उन्होंने लखनऊ स्थित सहारा हाॅस्पिटल में अंतिम सांस ली। रात में ही यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे जिले में फैल गई। जिससे जिले भर में शोक व्याप्त हो गया। आज उनका पार्थिव शरीर एंबुलेंस से यहां पहुंचा तो सैकड़ों लोगों की भीड़ उनके अंतिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी।
बाबूराम दादा को राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। वैसे तो उनके चुनावी कैरियर की शुरुआत 1988 में उरई नगर पालिका के अध्यक्ष बनने पर हुई। लेकिन इसके कई दशक पहले से वे जिले की राजनीति में किंग मेकर की भूमिका निभाते रहे थे। 1983 में हुए माधौगढ़ विधान सभा के उपचुनाव में उन्होंने चैधरी शंकर सिंह के साथ संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार जितेंद्र शाह को विजयी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1977 में उरई विधान सभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए श्यामजी के चुनाव संयोजन में भी उनकी भूमिका सबसे अहम रही थी।
भारतीय जनता पार्टी से उनका जनसंघ के समय से ही नाता जुड़ा रहा। राजनीति के शुरूआती जीवन में वे पार्टी से उरई नगर पालिका के वार्ड मेंबर भी चुने गये। इमरजेंसी के दौरान उन्होंने जेल यात्रा की थी। भारतीय जनता पार्टी को उन्होंने ही जिलाध्यक्ष बनने के बाद सिफर से शिखर तक पहुंचाया। वे सगंठनात्मक प्रतिभा के धनी थे। सांसद भानूप्रताप वर्मा, पूर्व विधायक केशव सिंह सेंगर और पूर्व ब्लाॅक प्रमुख उमा जखौली जैसे दिग्गजों की परवरिश उन्ही की राजनैतिक नर्सरी में हुई।
बाबूराम दादा ने पहली बार 1989 में विधान सभा चुनाव में जोर आजमाइश की लेकिन अकबर अली के मुकाबले वे नाकामयाब रहे। इसके बाद 1991 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने अकबर अली से अपनी हार का बदला ले लिया। लंबे समय तक उनकी और अकबर अली की चुनावी प्रतिद्वंदिता चली जिसे अली और बली के मुकाबले का नाम दिया जाता था। लेकिन इसके बावजूद निजी तौर पर अकबर अली से उनके घनिष्ट संबंध बने रहे। यही उनकी राजनीति की विशेषता थी कि उन्होंने राजनैतिक प्रतिद्वंदिता की वजह से कभी निजी संबंधों में बिगाड़ नही आने दिया। उनकी चैधरी शंकर सिंह और रामकुमार दीवोलिया के साथ त्रयी जिले की राजनीति में मशहूर रही है। जबकि तीनों ही नेता परस्पर विरोधी दल में थे।
बाबूराम जी पहली बार 1991 में कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में खाद्य एवं रसद राज्यमंत्री के रूप में सम्मिलित हुए। इसके बाद वे 1997 में भाजपा, बसपा के गठबंधन से बनी मायावती सरकार में भी मंत्री बने। कल्याण सिंह के दूसरे मुख्यमंत्रित्व काल और राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में वे आबकारी और वाणिज्यकर जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे। 2007 में उनके छोटे पुत्र अवधेश गुप्ता का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया और इसी के साथ पार्टी ने उनका विधानसभा चुनाव का टिकिट भी काट दिया। बाबूराम जी इससे बेहद आहत हुए। हालांकि बाद में उन्हें पार्टी ने एमएलसी के रूप में राजनीति की मुख्यधारा में बहाल करने का प्रयास एक बार फिर अपनी गलती सुधारते हुए किया। लेकिन पुत्र के असमय निधन ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया था। जिससे वे निढाल हो गये थे। इसी बीच राजनीति के मैदान के इस अप्रतिम योद्धा पर बीमारियां हावी होती चली गयी। जिसके कारण उनकी भूमिका राजनीति के मैदान में सिमटती गई।
पारिवारिक सूत्रों ने बताया है कि बाबूराम जी का अंतिम संस्कार शुक्रवार को किया जायेगा। उनकी राजनैतिक विरासत सहेजने के लिए लोगों की निगाहें अब उनके ज्येष्ठ पुत्र राकेश गुप्ता की ओर टिकी हुई हैं।






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