0 सूखे से कराह रही जनता को नरक में धकेलने के लिए एक और धक्का देने में नही चूक रहे अधिकारी
cropped-12065564_1515048802143994_20145587447710710_n.jpgउरई। मनरेगा के नाम पर हो रहे मखौल की खूब पोल सोशल आॅडिट में खुल रही है। लेकिन इसमें ऊपर से लेकर नीचे तक प्रशासन की अली बाबा चालीस चोर कंपनी शामिल है। जिसको देखते हुए लगता नही हैं कि औपचारिक रिपोर्ट में पकड़ी जा रही कमियों का उल्लेख हो सके।
मनरेगा व गांवों में चलाई जा रही जनकल्याणकारी योजनाओं की हकीकत परखने के लिए हर ब्लाॅक में उसी के क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं की टोली बनाई गई है जो इन दिनों सोशल आॅडिट करने में जुटी हुई है। इन टोलियों का जिस सच से सामना हो रहा है अगर उन्हें उसकी सही-सही रिपोर्ट तैयार करने की स्वतंत्रता दे दी जाये तो अधिकारियों की खाट खड़ी हो सकती है।
कदौरा ब्लाॅक के जोल्हूपुर गांव में सोशल आॅडिट करने वाली टोली को जो देखने को मिला वह इस बात की बानगी है कि गांवों में किस तरह सरकारी योजनाओं का पोस्टमार्टम करके बजट की बंदरबांट की जाती है। जोल्हूपुर में मनरेगा के तहत चार बीघा पटटे की जमीन की मेड़बंदी कराई गई। लेकिन मजदूरी का काम केवल कागजों पर हुआ। यथार्थ में ट्रैक्टरों से काम कराकर कुल खर्च का 75 प्रतिशत प्रधान जी और सचिव साहब मिलकर डकार गये। यह दूसरी बात है कि गांव के बजट की यह बंदरबांट केवल उन तक सीमित नही रहती बल्कि उनके जरिए ब्लाॅक और जिले के अधिकारियों को भी इसमें से अच्छा खासा शेयर पहुंचता है।
सोशल आॅडिट टीम ने जब मौके पर मौजूद सचिव महोदय से पूंछा कि मनरेगा के काम में ट्रैक्टर कैसे चल गया तो पहले तो उन्होंने इस बात को सिरे से नकारने की कोशिश की। लेकिन जब उनसे कहा गया कि पूरा गांव यहां स्वराज ट्रैक्टर से काम होने की बात कह रहा है तो उनके मुंह से निकल गया कि स्वराज नही दूसरे ट्रैक्टर से काम हुआ है। फिर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने तपाक से दोबारा जबान पल्टी और बोले कि ट्रैक्टर नही मजदूरों से ही काम कराया गया है।
सोशल आॅडिट टीम मनरेगा से ही बने एक किलो मीटर के संपर्क मार्ग को जांचने के लिए पहुंची तो वहां भी दुखी करने वाला नजारा था। भारी भरकम खर्च करके भी ऊबड़-खाबड़ संपर्क मार्ग बनाया गया था। शायद दरेसी कराये बिना उसका पैसा हजम कर जाने का यह नतीजा रहा। जिससे संपर्क मार्ग बन जाने पर सुविधा पूर्वक गांव आने-जाने की उम्मीद सजाये ग्रामीण निराश थे। इसी बीच कुछ जाॅब कार्ड धारक आये जिन्होंने बताया कि काम उन्होंने किया और दिन बिना काम करने वाले मजदूरों के जाॅब कार्डों पर चढ़ा दिये गये। जिससे वे मजदूरी से महरूम हैं। फर्जी मजदूरों और प्रधानों के बीच पैसे का बटवारा हो गया है। यही नही खडंजा के दोनो किनारों पर नाली स्टीमेट से काफी कम चैड़ाई की बनाई गई है और नाली में एक तरफ ही ईंट लगाई गई है। दूसरी तरफ का पर्दा खडंजे को ही समझ लिया गया। जिससे नाली का पानी बहकर खडंजे पर चढ़ रहा है।
इंदिरा आवास के लाभार्थियों ने बताया कि सूची में उनका नाम होते हुए भी तब तक उन्हें आवास बनाने की मंजूरी नही मिली जब तक कि उन्होंने पांच हजार रुपया एडवांस सचिव और प्रधान को नही चढ़ा दिया। पैसे न दे पाने की वजह से ही अग्निकांड पीड़ित का इंदिरा आवास डीएम की घोषणा के बावजूद प्रधान ने नही बनने दिया।
जोल्हूपुर की तरह ही अन्य ब्लाॅकों के गांवों में भी मनरेगा सहित सारी योजनाओं का इसी तरह का हश्र देखने को मिला। एक ओर सूखे की वजह से खेती में काम नही मिल रहा। दूसरी ओर गरीबों को भुखमरी और पलायन से बचाने की योजनाओं में भ्रष्टाचार की इंतहा। बदकिस्मती के इस गठजोड़ ने जिले के गांवों में गरीब जनता की दुश्वारियां चरम सीमा पर पहुंचा दी हैं।

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