
उरई। नाराज किसानों ने सैकड़ों अन्ना जानवर भीतर करके कलैक्ट्रेट का मुख्य द्वार बंद कर दिया और लाठिया लेकर बाहर खड़े हो गये जिसकी वजह से कलैक्ट्रेट में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
जिले भर में अन्ना मवेशियों की धमाचैकड़ी से किसानों को फसल बचाना मुश्किल हो रहा है। दूसरी ओर प्रशासन इस मामले में किसानों की कोई सार्थक मदद नही कर पा रहा जिसके चलते गुस्साये किसानों का आक्रोश चरम सीमा पार करने लगा है। सत्याग्रह का नया तरीका अपनाते हुए पिछले एक महीने से अधिकारियों को एहसास कराने के लिए किसानों ने अन्ना जानवर कलैक्ट्रेट में छोड़ने का क्रम बना लिया है। इससे भीषण अव्यवस्था उत्पन्न हो रही है लेकिन सख्ती करने पर किसानों से टकराव की स्थिति में कानून व्यवस्था की समस्या सिर उठा सकती है। प्रशासन इसलिए बैकफुट पर बना हुआ है।
आज डकोर, कुसमिलिया व मुहम्मदाबाद से अन्ना पशुओं को घेरकर लाये किसानों ने सारे मवेशी कलैक्ट्रेट के भीतर हांककर वहां पशु बाड़ा जैसा नजारा बना दिया। यह जानवर भीतर से फिर बाहर न आ पाये इसके लिए कलैक्ट्रेट का गेट बंद कर किसान लाठियां लेकर खड़े हो गये। उधर कलैक्ट्रेट के भीतर अन्ना पशुओं के उत्पात से बचाव के लिए वकील, फरियादी और कर्मचारी इधर-उधर भागते नजर आये। राजाराम प्रजापति, अहिवरन सिंह, देव सिंह, जागेश्वर सिंह, मोनू यादव, राममनोहर, बंसत प्रजापति, संतोष यादव, नारायण दास, ठाकुर प्रसाद, भागीरथ और खेमचंद्र आदि किसानों ने बताया कि हफ्तों से अन्ना गायों के कारण उनकी नीद हराम है। कई किसान बीमार हो चुके हैं। फिर भी इन मवेशियों पर कोई नियंत्रण नही हो पा रहा। मवेशियों को अन्ना छोड़ने वालों पर मुकदमा कायम कराने और गुंडा एक्ट की कार्रवाई करने की आला अधिकारियों की घोषणाएं थोथी हैं। आज तक ऐसी एक भी कार्रवाई नही की गई है। वरना लोगों में खौफ पैदा करके उन्हें मवेशी छुट्टा ढीलने से रोका जा सकता था। उन्होंने कहा कि किसानों के सामने अब कोई विकल्प नही रह गया है। अभी हम लोग कलैक्ट्रेट में जानवर बंद करके अधिकारियों को चेता रहे हैं। आगे जरूरत पड़ी तो उनके बंगलों के भीतर भी अन्ना जानवर दाखिल कराने में संकोच नही किया जायेगा।







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