कोंच-उरई। सूखे की त्रासदी में बुंदेलखंड के लोगों को हर तरह से राहत देने की सरकार की प्रतिबद्धता का अधिकारियों और कर्मचारियों पर कोई असर नही है। सूखा जानवरों के लिए भी उतना ही विकराल साबित हो रहा है जितना इंसानों के लिए। इसके बावजूद पशु चिकित्सा विभाग बेजुबानों के प्रति निष्ठुरता से बाज नही आ रहा। पशुधन प्रसार अधिकारी की एक बीमार बछिया के मामले में बेरुखी उसके लिए जानलेवा साबित हुई। गौवंश का मामला लोगों की धार्मिक आस्था से भी जुड़ा है जिससे बछिया के बेमौत दम तोड़ने से लोगों में जबर्दस्त उबाल आ गया। लेकिन अधिवक्ता ने अपनी नागरिक जिम्मेदारी निभाते हुए खुद के आक्रोश पर काबू कर उन्हें ठंडा किया। अन्यथा लोगों की प्रतिक्रिया इतनी उग्र थी कि संवेदनशीलता के इतिहास को समेटे कस्बे में कानून व्यवस्था की हालत नाजुक होने का एक और अध्याय यहां जुड़ जाता।
बृजेंद्र बाजपेयी कस्बे के जाने-माने अधिवक्ता हैं। यहां तक कि जिला बार में भी उन्हें सम्मानजनक स्थान दिया जाता हे। तपिश के कारण उनकी बछिया की हालत आज अचानक बिगड़ गई। उन्होंने तत्काल पशुधन प्रसार अधिकारी यशवंत सिंह सेंगर से संपर्क किया। श्री बाजपेयी ने बछिया की तड़पती हालत का हवाला भी दिया। लेकिन बिना पसीजे यशवंत सिंह का लठठमार उत्तर था कि वे 2 बजे के पहले किसी के यहां जानवर देखने नही जाते। वरिष्ठ अधिवक्ता होने के नाते बृजेंद्र बाजपेयी के सामने वे मुंह तो नही खोल पा रहे थे लेकिन इशारों से उन्होंने यह बतलाने में कसर नही छोड़ कि उन्हें बिना फीस लिये सरकारी डयूटी करना भी गंवारा नही है।
यशवंत सिंह की हठधर्मिता से बृजेंद्र बाजपेयी की बछिया को समय पर इलाज नही मिल सका जिससे उसकी हालत चरमसीमा तक बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया। मोहल्ले में इस खबर के फैलने से लोग भड़क गये। गौ भक्तों की भीड़ पशु चिकित्सालय पर धावा बोलने के मूड़ में थी। बृजेंद्र बाजपेयी ने मौके की नजाकत को समझा। वे अपनी बछिया को खोने का गम भुलाकर भीड़ को रोकने में जुट पड़े। आखिर बमुश्किल लोग शांत हुए। जिससे एक बड़ा बबाल टल गया।





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