23orai02उरई। अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह कर देय यह कहावत बेघर ग्रामीणों के लिए चलाई जा रही इंदिरा आवास योजना पर एकदम खरी उतर रही है। आवास योजना का लाभ पात्र न होते हुए भी सरकारी कर्मचारियों की हेराफेरी से उन लोगों को तो आसानी से मिल जाता है। जिनके पास पहले से पक्की छत है लेकिन जो लोग एक अदद मकान न होने के कारण शरणार्थी के तौर पर यहां-वहां गुजारा कर रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों में उनके लिए दया नाम का शब्द उनकी डिक्शनरी में नही है।
किस्सा रामपुरा विकास खंड के जमरेही सानी गांव का है जहां पर बेबा कालिंद्री देवी लंबे समय से अपने बेटे राजीव कुमार के साथ घर न होने के कारण पंचायत घर में रहने को मजबूर है। जिसमें से उसे खदेड़ने की बार-बार धमकी सचिव और प्रधान द्वारा दी जाती है। इसे देखते हुए कालिंद्री ने कई बार खंड विकास अधिकारी को आवास मुहैया कराने के लिए प्रार्थना पत्र दिये लेकिन उन्होंने 2002 की बीपीएल सूची में उसका नाम न होने की सरकारी गलती को उसे आवास से वंचित रखने के लिए अपने पास ब्रहमास्त्र का बल बना लिया है। उन्होंने लोहिया आवास योजना में उसका समायोजन करने का लालीपाप थमाया था लेकिन अंदर से कोई सदभावना न होने के कारण उन्होंने इसे पूरा करने की कोई जहमत अभी तक नही उठाई है।

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