गोहन-उरई। गर्मी का जोर बढ़ने के साथ-साथ सूखे के कारण भीषण पेयजल संकट भी तेजी से पैर पसारने लगा है। सरकार और प्रशासन लोगों को प्यास से बेहाल न होने देने की कसमें तो खा रहे हैं लेकिन विपदा इतनी गंभीर है कि प्रयास के नाम पर उनकी असहायता उजागर हुए बिना नही रह पा रही है।
क्षेत्र के दर्जनों गांवों में पिछले एक हफ्ते से हैंडपंप पानी न निकलने की वजह से ठूठे होते जा रहे हैं। हमारी टीम ने लगभग ढाई हजार की आबादी वाले जैतपुर गांव का दौरा हालात का जायजा लेने के लिए किया। तो ग्रामीणों की व्याकुलता द्रवित करने के लिए मजबूर कर देने वाली रही।
इस गांव में हैंडपंपों के ठप्प होने का सिलसिला तेजी से चल पड़ा है। पूर्व माध्यमिक विद्यालय का हैंडपंप तो पहले ही ठप्प हो चुका था। जिसके कारण सत्र पूरा होने के पहले ही बच्चे इस स्कूल से मुंह मोड़ने को मजबूर हो गये। इसी कड़ी में सरताज और शकूर के दरवाजे पर लगे हैंडपंप भी जबाव दे गये हैं। नतीजतन उक्त इलाके में पानी भरने के लिए हाहाकार की स्थिति बन गई है। वैसे तो गांव में 22 हैंडपंप स्थापित हैं। लेकिन किसी इलाके में कोई हैंडपंप ऐसा नही है जिसका डिस्चार्ज लगातार कम न हो रहा हो। इसलिए हैंडपंपों पर पानी भरने वालों की लाइन लग जाती है और आपाधापी में मारामारी की स्थिति बनी रहती है।
सरताज का कहना है कि अगर पानी से जुड़े महकमें आम दिनों की तरह ही खरामा-खरामा काम करने की कार्यशैली पर कायम रहे तो उनकी सुस्ती क्षेत्र में कानून व्यवस्था बिगाड़ने का कारण बन जायेगी। शकूर का भी कहना है कि पानी को लेकर संभावित बड़ा फसाद रोकना है तो पुलिस को सुबह शाम हैंडपंप देखने के लिए गश्त करने का निर्देश जिलाधिकारी को जारी करना पड़ेगा।
उधर जिलाधिकारी द्वारा ग्राम पंचायतों को राज्य वित्त की पहली किस्त का उपयोग पेयजल व अन्य जल संसाधनों को दुरुस्त रखने के लिए करने का निर्देश कागजी साबित हो रहा है। एसडीएम और बीडीओ भी इस मामले में चैकसी बरतने की जरूरत महसूस नही कर रहे। प्रशासन और पंचायतों की अमानवीय बेरुखी से यह समस्या कितने गंभीर संकट का कारण बन सकती है शायद इसका कोई अंदाजा प्रशासन को नही है।





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