0 बड़े रुतबे की वजह से हर जांच से है महफूज
0 सुरक्षा मामलों से भी ज्यादा बड़ा गोपनीय दर्जा हासिल
27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ce1उरई। वैसे तो जिले में सभी विभाग डीएम के प्रति जबावदेह रहते हैं लेकिन जालौन जिले में भूमि सुधार एवं जल संसाधन विभाग की बात अलग है जो डीएम की बजाय अपने को सीधे पीएम के प्रति जबावदेह मानता है। इस विभाग के गुमान का अंदाजा डीएम द्वारा आयोजित होने वाली बैठकों में इसकी लगातार गैरहाजिरी से लगाया जा सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील सूचनाएं गोपनीयता के लिए वर्गीकृत की जाती है यह तो सबको पता है लेकिन इस बात का पता शायद लोगों को नही है कि भूमि सुधार एवं जल संसाधन विभाग की सूचनाएं रक्षा सूचनाओं से ज्यादा संवेदनशील मानी जा रही है जिसकी वजह से सरकारी कार्य संस्कृति के पारदर्शिता के प्रमुख घटक से इस विभाग को कोई लेना-देना नही है। भूमि संरक्षण एवं जल संसाधन विभाग की ओर से हाल ही में अपनी कार्ययोजना के लिए 29 करोड़ रुपये के बजट की स्वीकृति मांगी गई लेकिन कार्य योजना के तहत कौन से कार्य कराये जाने हैं, कहां कराये जाने हैं, कार्यवार प्रस्तावित संरचना आदि का ब्योरा इतने भारी भरकम बजट की मांग में संलग्न नही किया गया। जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने डीएम की ओर से इस बारे में उपनिदेशक भूमि सुधार और जल संसाधन मो. आरिफ के लिए पत्र लिखे लेकिन विभाग अपनी आन से टस से मस नही हुआ।
किसान दिवस की बैठक में भी इस विभाग का कोई प्रतिनिधि आना गंवारा नही करता जबकि इसकी सभी योजनाएं किसानों की सहभागिता से संबंधित हैं। किसान नेताओं ने इस बारे में ऊपर तक शिकायतें की लेकिन विभाग के अधिकारियों पर कोई फर्क नही पड़ा। इस विभाग के अधिकारियों का अभिनंदन करने के लिए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल वाले मो. आरिफ के चक्कर लगाते घूम रहे हैं क्योंकि इस विभाग में बजट के 80 प्रतिशत की बंदरबांट कमीशनबाजी में हो जाती है। किसी भी विभाग को यह खुशनसीबी हासिल नही है। अगर भ्रष्टाचार का खेल ओलंपिक में शामिल होता तो भूमि सुधार और जल संसाधन विभाग गोल्ड मेडल हासिल करके देश और उत्तर प्रदेश का नाम रोशन कर देता।
मनमोहन सरकार के समय दिये गये अरबों रुपये के बंुदेलखंड विकास पैकेज के बजट का सबसे ज्यादा यानी लायन शेयर भूमि सुधार एवं जल संसाधन विभाग को मिला था। बजट इतना ज्यादा था कि हर खेत की मेड़बंदी हो जानी चाहिए थी और छोटे-बड़े चैकडेम से लेकर बांधों तक से पूरा बंुदेलखंड पट जाता। कागजों पर ऐसा हुआ भी लेकिन किसी प्रेत बाधा की वजह से मौके से यह सारा जल प्रबंधन फना हो चुका है। अगर यह जल प्रबंधन धरातल पर दावे के सापेक्ष 25 प्रतिशत भी हो जाता तो इस वर्ष के विकराल सूखे के बावजूद बुंदेलखंड में खेती पर बहुत ज्यादा असर नही पड़ता। हाल में बुंदेलखंड के सातों जिलों में सैकड़ों किसानों की असामायिक मौत का ठीकरा कोई भूमि सुधार एवं जल संसाधन विभाग के सिर फोड़ कर भी उसका क्या बिगाड़ लेगा। यह विभाग तो दिव्य प्रतापी शक्तियों के कारण हर तरह के दैहिक, दैविक, भौतिक ताप से संरक्षित और सुरक्षित है।

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