उरई। ओडीए के स्टाॅफ को तो किसी मुगल शहंशाह के जमाने में पैदा होना चाहिए था जिसमें उसके एस्थैटिक सेंस के शाहजहां जैसे कद्रदान होते। बुरा हो इस जमाने का जो गलत समय में इनका जन्म हो गया। जिसमें इनके हुनर को दाद देने वाले आका कहीं नजर नही आते।
ओडीए का संचालन अभी कलैक्ट्रेट की एक बड़ी गुफानुमा कोठरी में हो रहा है। जबकि विकास शुल्क के रूप में भारी आमदनी की आवक की वजह से ओडीए के अभियंताओं और स्टाॅफ की ऐसी जगह बैठने की मजबूरी उनका सारा जायका खराब कर रही है। इसीलिए प्राधिकरण क्षेत्र के विकास से पहले अपने ठाटबाट की सुध ओडीए को लेनी पड़ी। भारी भरकम बजट खर्च करके ओडीए कार्यालय का ताजमहल चुर्खी रोड पर दुग्ध संघ के कार्यालय के समीप महीनों पहले तैयार हो चुका है। लेकिन इसका विधिवत शुभारंभ इसके कर्ताधर्ताओं के रंगीले असमंजस की वजह से संभव नही हो पा रहा।
ओडीए में आईआईटीयंस अभियंताओं की तैनाती है। इसके बावजूद चैराहों के सिरे इन लोगों ने ऐसे टिकाये हैं कि आये दिन शहर में हादसे होते रहते हैं। ओडीए द्वारा कराये गये अन्य कार्याें में भी तुगलकी अभियंत्रण कौशल के नमूने देखे जा सकते हैं। दूसरी ओर आईआईटी में कलर सेंस की भले ही कोई पढ़ाई न होती हो लेकिन इस मामले में इनकी दिलचस्पी कोई जबाव नही है जिसकी दीवानगी में इन्होंने आर्कीमिडीज को भी पीछे छोड़ दिया है। ओडीए तीन महीने से इस माथापच्ची में लगा है कि इस भवन में कौन सा कलर सबसे ज्यादा फबेगा। इनके जुनून से भवन का निर्माण कराने वाले ठेकेदार जब लगभग पागल हो गये तो कलर के लिए उन्हें किसी दूसरे को ठेका देने का मशविरा देना पड़ा। यह ठेकेदार भी फिलहाल तमाम रंगों में से एक रंग चुनने में जुटा है जिससे ओडीए के अधिकारी संतुष्ट हो सकें। उसे ठेका इस शर्त पर दिया गया है कि अगर बिल्डिंग का कलर उन्हें नही जंचा तो वे दूसरा कलर अपने खर्च से करायेंगे।






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