उरई। 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा के आम चुनाव में देश में चक्रवर्ती शासन कर रही कांग्रेस पार्टी को बुरे दिनों का सामना करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पूरी 85 सीटों पर हार का मुंह देखने को मजबूर हुई। यहां तक कि खुद इंदिरा गांधी भी रायबरेली से चुनाव में मात खा गई। गर्दिश के इन दिनों में लोकसभा में इंट्री लेने के लिए इंदिरा गांधी ने कर्नाटक की चिकमंगलूर लोकसभा सीट कांग्रेस के तत्कालीन सांसद से इस्तीफा देकर खाली कराई और इसके बाद वे उपचुनाव में खुद उम्मीदवार बनी। उरई से चिकमंगलूर के बीच उस समय ईरान से तूरान का फासला था। चिकमंगलूर में कन्नड़ बोली जाती थी। जिसका एक शब्द उरई के होल टाइमर कांग्रेसी राधाचरण नामदेव नही जानते थे लेकिन उन्हें कांग्रेस और अपनी नेता इंदिरा गांधी का इतना नशा था कि वे अपना लाउडहेलर कंधे पर टांगकर गिरते पड़ते चिकमंगलूर पहुंच गये और चुनाव के पूरे महीने भर तक दीवानों की तरह लाउडहेलर से चिकमंगलूर के हर गांव गली में इंदिरा गांधी जिंदाबाद कांग्रेस पार्टी जिंदाबाद करते रहे और तभी लौटे जब इंदिरा गांधी की जीत का एलान हो गया। कांग्रेस पार्टी ऐसे ही नीव के पत्थरों की बदौलत देश में वर्षों तक छाई रही और आज तक उसका नाम जिंदा है। लेकिन यह दूसरी बात है कि राधाचरण नामदेव जैसे बदनसीब कार्यकर्ताओं को बिसराकर कांग्रेस पार्टी का कारवां आगे बढ़ रहा है जिसकी बानगी 19 सितंबर को उरई में राहुल गांधी के रोड-शो के लिए निर्धारित कार्यक्रम में भैरव गुटखा वाली गली में पूड़ी की छोटी सी ठिलिया लगाने वाले राधाचरण के पुत्रों से मिलकर उन्हें याद करने की कोई गुंजाइश न रखे जाने में साफ दिखाई दे रही है।
कांग्रेसियों की पुरानी पीढ़ी को याद दिलाया जाये तो राधाचरण नामदेव का चेहरा जरूर ही याद आ जायेगा। दर्जीगीरी के पेशे से परिवार चलाने वाले नामदेव कांग्रेस से जुड़ने के बाद पार्टी के धुनी कार्यकर्ता बन गये। उन्होंने पार्टी की सेवा के लिए अपने घर-परिवार की बलि चढ़ा दी। इंदिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी ने जहां भी चुनाव लड़ा वहां राधाचरण नामदेव अपने खर्च पर पहुंचते रहे और उनके पूरे चुनाव भर घर-परिवार छोड़कर उन्हीं के निर्वाचन क्षेत्र में बने रहे। बुंदलेखंड में तो वे कांग्रेस पार्टी के चलते-फिरते ब्रांड अंबेस्डर थे। कांग्रेसी झंडे का लिबास पहने, लाउडहेलर टांगें और खादी की सफेद टोपी पहने राधाचरण नामदेव को लोगों द्वारा उन्हें नमूना समझे जाने से कोई शर्म नही थी। दूसरी पार्टी तक के लोग यह कहते थे कि अगर नामदेव जैसे कार्यकर्ता उनको भी मिल जायें तो उनकी पार्टी का बड़ा नसीब साबित होगा।
लेकिन कांग्रेस पार्टी ने केंद्र और कई राज्यों में दशकों तक सरकारें रहने के बावजूद राधाचरण नामदेव का कोई उद्धार नही किया। फाकाकशी में राधाचरण नामदेव 2004 में स्वर्गवासी हो गये। इसके बाद उनके नाम तक को पार्टी के लोग भुला बैठे। उम्मीद यह थी कि 19 सितंबर को राहुल गांधी के उरई में रोड-शो के समय उनके कार्यक्रम का संयोजन कर रहे लोग राधाचरण नामदेव के परिवार से उन्हंे मिलवाने की व्यवस्था जरूर रखेगे तांकि कांग्रेस के लिए जीने-मरने वाले उन जैसे सैंकड़ों परिवारों की वर्तमान पीढ़ी में भी उन्हीं की तरह पार्टी के लिए जज्बे का संचार किया जा सके। लेकिन लगता है कि पार्टी के आगे बढ़ते कारवां के गुबार में दफन ऐसे कांग्रेसियों को याद करने की जरूरत पार्टी के लोगों को महसूस नही होती।






Leave a comment