tarpan
कोंच। पितृ पक्ष जारी हैं और परंपरानुसार लोग अपने पितरों का तर्पण करने के लिये सागर तालाब पर उपस्थित हैं। पितृपक्ष में सभी शुभ कार्य निषिद्घ हो जाते हैं और लोग अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिये श्राद्घकर्म, तर्पण आदि में लिप्त हो जाते हैं। विद्वानों का मत है कि तर्पण और श्राद्घकर्म करने बालों से उनके पितर प्रसन्न होते हैं और उन्हें तथा उनकी संतति को दीर्घायु प्रदान करते हैं। नगर के विद्वान ब्राह्मïण और कर्मकांड बिशेषज्ञ पं. विनोद द्विवेदी ‘दरोगाजीÓ तर्पण और श्राद्घकर्म का महत्व बताते हुये इसे श्राद्घकर्ता के लिये कल्याण कारक मानते हैं। वे कहते हैं कि पितर अत्यंत दयालु होते हैं, वे अपने पुत्र पौत्रादिकों से पिंडदान और तर्पण की आकांक्षा रखते हैं। श्राद्घादि क्रियाओं द्वारा पितरों को परम प्रसन्नता और संतुष्टिï मिलती है तथा वे प्रसन्न होकर तर्पण व श्राद्घकर्ता को दीर्घायु, संतति, धन, धान्य, विद्या, राज्य, सुख, यश, पुष्टिï, बल, पशु, श्री, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करते हैं।
‘आयु: प्रजा विद्या स्वर्ग मोक्षं सुखानि च,
प्रयच्छन्ति तथा राज्य पितर: श्राद्घतर्पिता।Ó
‘आयु: पुत्रान यश: स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिïं बलं श्रियम्
प्रशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।Ó
पं. विनोद द्विवेदी कहते हैं कि जल तर्पण, श्राद्घ तथा ब्राह्मïणों को भोजनादि कराना परंपरा नहीं है अपितु पितरों की मोक्ष प्राप्ति का साधन है। मनुष्य पृथ्वी पर जन्मता है और सांसारिक सुखों का भोगादि करके एक निश्चित समय के उपरांत मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। उसका मृत शरीर यहीं छूट जाता है किंतु उसकी आत्मा उसके कर्मों के अनुसार जन्म लेने के लिये भटकने लगती है। चौरासी लाख योनियों में से वह आत्मा किस योनि में जन्म ले यह उसके कर्मों और आचरणों पर निर्भर करता है। इसी भटकती आत्मा की तृप्ति के लिये तर्पण, श्राद्घ एवं ब्राह्मïण भोजन कराने का विधान है।
‘बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञान वान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:।।Ó
वे कहते हैं कि व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति की कामना ही होना चाहिये। ईश्वर ने मनुष्य का जन्म ही इसी लिये दिया है कि वह इस योनि में रह कर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करे, सत्कर्म करे और परमात्मा को प्राप्त करने का यत्न करे, किंतु इस उत्कृष्टï योनि में भी आकर वह सांसारिक चक्र में पड़ कर अपना जीवन बर्बाद कर लेता है और अंत में नाना प्रकार की इच्छायें मन में लिये इस नश्वर जगत को छोड़ दूसरी योनियों में प्रवेश के लिये भटकने लगता है। पं. सत्यनारायण, रामचंद्र लोहिया, मिथलेश गुप्ता, वीरेन्द्र तिवारी, जितेन्द्र अग्रवाल, गोविंदसिंह कुशवाहा, केके छावला, ओमप्रकाश अग्रवाल, बलराम कुशवाहा, रामकुमार सोनी आदि मौजूद रहे।

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