उरई। रविवार को अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम में पूर्व सांसद और एक समय मायावती के दाहिने हाथ के तौर पर गिने जाने वाले बृजलाल खाबरी ने बसपा छोड़कर नई दिल्ली में 24 अकबर रोड पर कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार करने की घोषणा कर दी है। बृजलाल खाबरी के इस फैसले को मनोवैज्ञानिक तौर पर बसपा सुप्रीमों मायावती के लिए ऐसे समय जबर्दस्त झटका माना जा रहा है जब हर रोज एक न एक प्रमुख नेता का उनकी पार्टी छोड़ने का तांता लगा हुआ है।
ध्यान रहे कि 1996 में जब बसपा सुप्रीमों ने पार्टी की सारी कार्यकारी शक्तियां मान्यवर कांशीराम के हाथों से अपने कब्जे में करने की शुरूआत की थी उस समय उन्होंने कांशीराम के बामसेफ के जमाने के निकट सहयोगी डाॅ. रामाधीन को बाहर का रास्ता दिखाकर उन्ही के शिष्य रहे बृजलाल खाबरी को जालौन में संगठन का जिलाध्यक्ष बनाकर इस जिले में रातों-रात पार्टी के सर्वेसर्वा के तौर पर स्थापित कर दिया था। इसके बाद जिले की राजनीति में ही नही समूचे बुंदेलखंड के लिए बृजलाल खाबरी मायावती के नाक-कान बन गये और उनके कहने से पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीराम पाल, अकबर अली जैसे दिग्गजों को पार्टी से बाहर कर दिया गया था और मिशनरी दलित नेता व चुनाव में पार्टी की पहली बोहनी कराने वाले चैनसुख भारती का भी टिकट काट दिया गया था।
इस उठापटक में बृजलाल खाबरी मायावती को शुरूआती दौर में इस कदर फले कि उनकी बदौलत 1999 के लोकसभा चुनाव में यह संसदीय सीट पहली बार बसपा की झोली में आ गई। मायावती ने उन्हें दूसरे कई राज्यों में पार्टी का प्रभारी बनाया। उन्हें पार्टी में नंबर सेकेंड तक माना जाने लगा था लेकिन 2007 में मायावती का मूड उनके प्रति इस कदर बदला कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के ऐन पहले बेआबरू करके उन्हें पार्टी से बाहर ही नही कर दिया बल्कि यह तक घोषणा कर दी कि अगर वे नाक भी रगड़ेंगे तो उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल नही किया जायेगा।
खाबरी को इसके बाद कुछ वर्ष तक भीषण दुर्दिनों का सामना करना पड़ा। उनके खिलाफ बसपा सरकार में वन कर्मियों पर हमले तक का मुकदमा कायम हो गया जिसमें उनकी गिरफ्तारी के आदेश भी कर दिये गये। इसके बावजूद खाबरी ने दूसरी पार्टी में जाना गंवारा नही किया। लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके विकल्प के रूप में लाये गये तिलक चंद्र अहिरवार जब कामयाब नही हो पाये तो मायावती ने एक बार फिर बृजलाल खाबरी को अपना लिया। न केवल इतना बल्कि मायावती ने उनको पूरे 6 वर्ष के लिए राज्यसभा में पहुंचा दिया। इसके बाद खाबरी ने चुन-चुन कर उन लोगों को सबक सिखाया जिन्होंने मायावती के आदेश के अनुपालन में उनसे दूरी बनाने का दुस्साहस किया था।
2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की सत्ता से बेदखली के बाद भी खाबरी की जालौन जिले के मामले में पार्टी के अंदर चलती रही लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जब वे भी पराजित हो गये तो मायावती के दरबार में उनकी उल्टी गिनती का दौर फिर शुरू हो गया। उन्हें जिले और बुंदेलखंड की राजनीति से बदर कर दिया गया और तिलक चंद्र अहिरवार को फिर झांसी मंडल में पार्टी का सर्वेसर्वा बना दिया गया। यही नही आगे चलकर उन्हें गालियां देने वाले पंकज अहिरवार को उरई विधानसभा क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवार बनाकर 2012 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार रहे खाबरी के साले श्रीपाल का पत्ता साफ कर दिया गया। छटपटाये खाबरी ने विधानसभा चुनाव का समय आने तक मायावती की नजदीकी फिर हासिल करने की भरपूर कोशिश की लेकिन उनकी दाल नही गल पाई। इस बीच कांग्रेस में उनके तार स्थानीय राजनीति के समीकरणों के तहत काफी पहले से जुड़े हुए थे। जिसकी वजह से आखिर उन्हें हृदय परिवर्तन के लिए तैयार कर लिया गया और इसके तहत आज उन्होने 24 अकबर रोड दिल्ली स्थित कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय पर गुलाम नवी आजाद, राज बब्बर और संजय सिंह के सामने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार करने की घोषणा कर दी।
बृजलाल खाबरी के साथ राठ विधानसभा क्षेत्र से तीन बार बसपा के एमएलए और प्रदेश मंत्रिमंडल के सदस्य रहे धूराम चैधरी ने भी कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली है।
फोटो नं.-10उरई01 बृजलाल खाबरी






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