डाॅ. राकेश द्विवदी
0 खाबरी के कांगे्रेस में आते ही विजय चैधरी का बसपा में शामिल होने का प्रयास तेज
उरई। पूर्व सांसद बृजलाल खाबरी बसपा की तरह कांग्रेस में भी एक बड़ा पद पाने की ओर बढ़ रहे हैं। पद देने संबंधी घोषणा किसी भी दिन हो सकती है। पीके टीम की ओर से नजरे हटाकर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अब उन लोगों पर विश्वास जताने जा रहा है जिनमें सामाजिक पैठ बनाने की क्षमता है। खाबरी में भी वही गुण देखा जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर का कोई पद दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त बुंदेलखंड और कानपुर क्षेत्र के टिकट वितरण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।
बसपा से बृजलाल खाबरी का बड़ा पुराना संबंध रहा है। वह 1984 में बसपा में थे। वर्चस्ववादी राजनीति के कारण ऐसा भी हुआ जब उन्हंे या तो पदच्युत किया गया या फिर पार्टी से निष्कासित किया गया। बीच-बीच में उन्हें उभारा भी गया। पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाने के अलावा झारखंड प्रभारी का दायित्व दिया गया। इन दिनों वह उपेक्षित थे। तगड़ा झटका तब लगा जब प्रखर विरोध तिलक चंद्र अहिरवार को बुंदेलखंड का काॅर्डिनेटर बनाकर भेजा गया। बृजलाल खाबरी को उम्मीद थी कि इस बार विधानसभा के चुनाव के टिकट बुंदेलखंड में वह अपने हिसाब से तय करेंगे। उरई से वह अपने रिश्तेदार सत्येंद्र प्रताप सिंह उर्फ श्रीपाल को प्रत्याशी बनवाना चाहते थे। कालपी से वह छोटे सिंह के स्थान पर किसी दूसरे को मौका दिलवाते जबकि प्रगांढ़ संबंधो के कारण माधौगढ़ में कांग्रेस लीडर विनोद चतुर्वेदी के लिए ब्राहमण उम्मीदवार की जगह किसी दूसरी बिरादरी का प्रत्याशी बनवाने में अपनी सारी क्षमताओं का प्रयोग करते। खाबरी होते तो गिरीश अवस्थी की दावेदारी किसी सूरत में नही रहती।
कांग्रेस में उन्हें लाने में विनोद चतुर्वेदी की भूमिका अहम मानी जा रही है। इस विधानसभा चुनाव में वह खाबरी की क्षमताओं को अपने लिए भुनाना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने जो राजनैतिक तीर चलाया है उसका उददेश्य रामाधीन और विजय चैधरी को भी घायल करना है। इन दोनों नेताओं की पहुंच राहुल गांधी समेत कुछ बड़े पार्टी नेताओं तक है। अस्तित्ववादी राजनीति के पोषक विनोद चतुर्वेदी को यह बात लंबे समय से खल रही थी। इन दोनों नेताओं को कमजोर करने के लिए उन्होंन श्यामसुंदर चैधरी को आगे जरूर बढ़ाया किंतु इससे रामाधीन-विजय को टक्कर नही मिल पा रही थी। रामाधीन व विजय से खाबरी के बीच भी पर्याप्त दूरियां हैं। खाबरी भी नही चाहते रहे कि उक्त दोनों नेताओं को राजनीति में कोई टिकाऊ जगह मिले। बृजलाल खाबरी के कांग्रेस में आने से विनोद चतुर्वेदी को ऐसा नेता मिल गया है जिससे विजय चैधरी को हर तरह की टक्कर दी जा सकेगी। जो अनुभव लेकर खाबरी कांग्रेस में पहुंचे हैं वह विजय को पीछे धकेलने के लिए पर्याप्त है। इसे भांपकर ही विजय चैधरी फिर से बसपा में अपना मुकाम तलाशने में जुट गये हैं। इस वक्त तिलक चंद्र उनके काम आ सकते है। बसपा की सदस्यता ग्रहण करने को उपयुक्त मौके की तलाश हो रही है। यदि सत्येंद्र प्रताप सिंह को उरई से बसपा टिकट नही देती तो फिर खाबरी उनके लिए कांग्रेस से टिकट दिलाने का प्रयास कर सकते हैं। फिलहाल अभी सत्येंद्र बसपा में रहने की ही बात कह रहे हैं। उनका यह बयान योजनाबद्ध माना जा रहा है।
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी खाबरी को एक बड़ी जिम्मेदारी देने जा रही है। दीपावली के पहले ही इसकी घोषणा होने की संभावना है। सूत्रों की माने तो उन्हें बसपा की तरह कोई राष्ट्रीय स्तर का पद मिलने वाला है। इसके अतिरिक्त कानपुर और बुंदेलखंड क्षेत्र में भी प्रत्याशी चयन में उनकी क्षमताओं का लाभ लिया जायेगा। कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्याम सुंदर चैधरी, पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी का स्नेह बंटने से म नही मन दुखी हैं। अभी तक वह चतुर्वेदी के सबसे ज्यादा निकट थे। लेकिन अब खाबरी के रूप में एक बड़ा विकल्प उभर आया है श्याम सुंदर की बजाय खाबरी से ज्यादा फायदा मिलना माना जा रहा है। इसके अलावा जिलाध्यक्ष की उरई विधानसभा से भी दावेदारी कमजोर हुई है। उनकों फायदा तभी मिलेगा जब खाबरी उरई विधानसभा में कोई व्यक्तिगत रुचि नही रखेगें।






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