डाॅ. राकेश द्विवदी
0 लहूलुहान हो खूब चीखीं-चिल्लाईं पर सब बहरे हुए
0 इसी तरह की चनौतियों से अब बहू को जूझना होगा
cropped-27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ce11.pngउरई। वृद्धा ठकुरा देवी कर्मठ थी और स्वाभिमानी थी अपनी मेहनत पर इस 83 वर्षीया महिला को पूरा यकीन था। आखिरी सांसों तक वह कर्तव्यनिष्ठ बनी रहीं। दुनियां से विदा होते-होते वह एक झकझोरने वाला सवाल जरूर खड़ा कर गईं कि हमार तंत्र अभी भी कितना बेहरा और लचर हैं कि एक वृद्धा की वेबजह जान चली गई। तीन दिनों तक उसका शरीर खेतों पर पड़ा रहा जिसे जंगली जानवर नोंचकर खा गये। क्या सारा दोष ठकुरा की गरीबी और लाचारी का है?
हादसा विचलित करने वाला है ठकुरा देवी ने कालपी की 100 वर्षीय वृद्धा बुद्धिया की याद दिला दी। परिवार के भरण-पोषण के लिए वह भी जूता गांठ कर पैसा कमाती थी। इन दोनों महिलाओं को किसी के सामने हाथ फैलाना गंवारा नही होता था। ठकुरा देवी का जीवन भी जिंदगी भर मुसीबतों में तपता रहा। पति रामस्वरूप पाल का निधन बहुत पहले हो गया था फिर भी जमालपुरा की इस महिला ने हिम्मत नही छोड़ी। दोनों बेटों बाबूराम और इंदर को कभी पिता न होने का एहसास नही होने दिया। बच्चों के लिए वह मां के साथ पिता भी बन गई। मेंहनत भरी मजदूरी से गृहस्थी की गाड़ी खींचने लगी। अनायास जिंदगी में एक ऐसा चक्रवात आया जिसने ठकुरा को पूरी तरह परास्त करने की कोशिश की। बाबूराम और इंदर दोनों कुछ अंतराल में काल के गाल में समा गये। ठकुरा हतप्रभ रह गई। उसकी योजना को उसके दोनों बेटे धोखा देकर चले गये। विधवा हुई छोटी बहू और उसके दोनों बच्चों की चिंता सताई। एक बार फिर से अपने आत्म विश्वास को टटोलकर आगे बढ़ी। बहू ने भी उसके साथ कदम बढ़ाया। घर में मेहनत की रोटियां सिकने लगी। ठकुरा का इरादा अब दोनों पौत्रों पुष्पेंद्र और नीरज को काबिल बनाना था। ठकुरा को अपनी मेहनत पर सदैव भरोसा था। तभी तो वह इस अवस्था में भी राशन की सामग्री को लेने दो किलोमीटर पैदल चलकर जमालपुरा से मई पहुंचीं। कोटेदार से राशन सामग्री लेकर जब वह घर लौटने लगीं तो उन पैने तारों से उलझ गई जिन्हें एक किसान के द्वारा पशुओं से फसल बचाने के लिए लगाया गया था। बताते हैं कि तेज धूप के कारण वह इन तारों को देख नही सकीं। खेतों पर उभरे निशान बयां करते हैं कि उसने अपनी जान को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया वह बचाव का जितना प्रयास करती रही उतना ही लहूलुहान होती चली गई। बचाव में वह खूब चीखीं-चिल्लाई होगी लेकिन गरीबी व संघर्षों में जीने वाली इस वृद्धा की आवाज किसी के कानों तक नही पहुंची। सरकारी तंत्र भी इतना सुस्त व जंग लगा साबित हुआ कि वह प्राण गंवाने वाली महिला तक नही पहुंच पाया। तीन दिनों तक उसका शव खेतों में पड़ा रहा। बहू रमाकांति ने समझ लिया कि अम्मा (सास) किसी मंदिर में जाकर वहीं ठहर गईं हैं जबकि कर्मठ ठकुरा के शव को जंगली जानवर खाने में जुटे रहे। यह ठकुरा का दुर्भाग्य ही है कि जिंदगी भर मेहनत और संघर्ष करके जीने का हौसला बटोरे रही फिर भी मौत आने तक उसका संघर्ष जारी रहा। स्वाभिमान से वह विदा भी नही हो पाई। अब उसके त्रयोदशी का संकट है। जिन मुसीबतों के दौर से ठकुरा के दिन गुजरे उसी तरह के कठिन छड़ रमाकांति के सामने आ गये हैं। गांव वाले भरोसा तो दे रहे है कि संकट का समाधान होगा किंतु यह वक्त बतायेगा कि इस परिवार को कितनी अग्नि परीक्षा के दौर से और गुजरना पड़ेगा।

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