0 कई महीनों तक नहीं आता उनके खातों में पैसा
0 पहले जमा करो फिर होता उनका भुगतान
0 डीजल बीज खाद सभी के दाम आसमान पर
cropped-27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ce11.pngउरई। किसानों को बीज या अन्य योजनाओं में जो अनुदान दिया जाता है वहउनके खातों में महीनों नहीं पहुंचता है और बीज इतना महंगा है कि किसान अब उसे खरीदने में अपने को असमर्थ सा महसूस कर रहा है। किसान केपास बैंकों का पैसा जमा करने के लिए धन का जहां अभाव है वहीं डीजल और खाद ने उसकी रीढ़ की हड्डी भी तोड़ डाली है। ऐसेमें किसान पलायन करने के लिए मजबूर हो रहा है।
बुंदेलखंड में अभी भी किसानों के हालात बद से बदतर हैं। आज यह हाल है कि चना दस हजार मटर सात हजार गेहूं इकत्तीस सौ हरी मटर सात हजार से लेकर तेरह हजार एवं अन्य जिंस जो कि किसान बोना चाहता है वह इतनी महंगी हो चुकी है कि किसान उन्हें खरीदने में अपने को असमर्थ सा महसूस कर रहा है। गेहूं एवं अन्य जिंस पर जो अनुदान मिलना है वह भी पहुंचने में लगभग छह माह लग जाता है तब तक किसान की दूसरी फसल आ जाती है और अनुदान जो मिलता है वह राज्य और केेंद्र अलग-अलग अंश भेजते हैं। किसान को यही पता नहीं चल पाता कि उसका अनुदान कब कितना और कैसे आएगा। जब किसान खेत बोने के लिए तैयार हुआ तो पेट्रोलियम कंपनियों ने डीजल के दाम दो से ढाई रुपए प्रति लीटर बढ़ादिए। खाद डीएपी और यूरिया पहले से ही महंगी हैं। किसान को ऐसीकोई सुविधा प्राप्त नहीं हो रही है जिससे वह खुशहाल हो सके। जो थोड़ी-बहुत पूंजी उसके पास शेष है वह बखरने और जोतने में उसकी स्वाहा हो गई। बीमा कंपनियों द्वारा बीमा का क्लेम अब तक किसान को नहीं मिला। बैंक वसूली के लिए अपना लगातार फरमान जारी किए हुए है। ऐसी परिस्थितियों में जो अनुदान का बीज किसान को मिल भी रहा है उसे वह खरीदने में असमर्थ सा महसूस कर रहा है। यही वजह है कि किसान का धीमे-धीमे सरकारी योजनाओं से ध्यान उठने लगा है और उसकी समझ में आ गया है कि चार के सोलह बनाना उसके वश की बात नहीं है। आज किसान अगर किसी भी फसल का बीज एक बार ले लेता है तो उसे तीन साल तक बीज पर अनुदान प्राप्त नहीं होगा। किसान हर छह महीने में जोता-बखरता है। स्कीम भी ऐसी चलाई जो किसानों के लिए सिर्फ लालीपाप साबित हो रहा है। किसानों को जितने बीज की जरूरत है वह भी उपलब्ध नहीं हो पाता है। अधिकतम दो हेक्टेयर का प्रावधान रखा गया है। ऐसे में लघु मध्यम और बड़े तीनों ही किसान परेशान हैं। किसान किसान दिवस में जाता है तोउसकी सुनी नहीं जाती है। मीटिंगों में सिर्फ खानापूर्ति की जाती है अगर वास्तविकता से किसान के हित में काम किया गया होता तो इस क्षेत्र का किसानभी खुशहाल बन जाता। चंद लोगों की मुट्ठी में सभी योजनाएं समाई हुई हैं। किसान को पता ही नहीं चलता कि कब कौन सी योजना आई है। योजनाओं का न पूर्ण रूप से प्रचार-प्रसार कराया जाता है। जो पहुंच गया किसान उसे पता चल जाता है और जो नहीं पहुंच पाया उसे तब एहसास होता है जब योजना बंद हो जाती है।

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