02-bhagwat-kathaजालौन-उरई। कलियुग बीते सतयुग, त्रेता तथा द्वापर तीनों युगों से महान् है। पूर्व में युगों में जो फल लोगों को हजारों वर्ष की तपस्या व पूजा-अर्चना से प्राप्त होता है, वही फल कलियुग में लोगों को बस जरा से प्रयास में मिल जाता है। उक्त बात लौना रोड पर आयोजित श्रीमद् भागवत् कथा सप्ताह के अंतिम दिन कथा-व्यास पं. गगन जी महाराज द्वारा श्रोताओं के समक्ष कही गई।
लौना रोड पर मोहल्ला नयाखंडेराव में आयोजित श्रीमद् भागवत् कथा के सातवें दिन सुदामा-चरित तथा कलयुग की महिमा का वर्णन कथा-व्यास पं. गगन महाराज द्वारा किया गया। जिसमें उन्होंने श्रृद्धालुओं को कथा का श्रवण कराते हुए कहा कि ईश्वर अपने भक्त को बिन माँगे ही सब कुछ दे देता है। जैसे सुदामा को बिन माँगे ही सब कुछ मिल गया। भगवान् अपने भक्त के लिए हमेशा ही तत्पर रहते हैं। सिर्फ उन पर विश्वास करने की जरूरत है। सुदामा जी के दरिद्र होने पर उनकी पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर सुदामा अपने बालसखा श्रीकृष्ण से कुछ मांगने की इच्छा लिए उनसे मिलने द्वारिकापुरी जाते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण के भव्य महल व राजसी ठाठ-बाट देखकर वह संकोच में पड़ जाते हैं। वह श्रीकृष्ण को अपने आने का उद्देश्य भी नहीं बता पाते हैं। लेकिन भगवान् तो अपने भक्तों के मन तक की बात को भली- भाँति जानते हैं। श्रीकृष्ण ने जान लिया कि सुदामा किस उद्देश्य से उनसे मिलने आए हैं। जिस पर उन्होंने सुदामा के कुछ मांगे बिना ही उन्हें सबकुछ दे दिया। जब सुदामा अपने घर पहुंचते हैं, तो वहां की कायाकल्प देखकर पर भौंचक्के रह जाते हैं। इसके उपरांत कथा-शास्त्री द्वारा कलियुग का चरित्र वर्णन किया गया। जिसमें उन्होंने कहा कि कलियुग बीते सतयुग, त्रेता तथा द्वापर तीनों युगों से महान् है। पूर्व में युगों में जो फल लोगों को हजारों वर्ष की तपस्या व पूजा-अर्चना से प्राप्त होता है, वही फल कलियुग में लोगों को बस जरा से प्रयास में मिल जाता है। परंतु आवश्यकता है कि प्रभु का जो भी ध्यान किया जाए वह निःस्वार्थ भाव से किया जाए। इस मौके पर पारीक्षित श्रीधर ओझा सहित श्रीमती ममता सिंह चैहान, गिरजेश देवी, मनोज पुजारी, विनीत कुमार, रोहित मिश्रा, सलिल शुक्ला, अनिल पुरवार, पवन महाराज, गोलू श्रीवास्तव, शीलू तिवारी झम्मन पांडे, नितिन बुधौलिया, शक्कर लाल, ओमप्रकाश याज्ञिक, सर्वेश महाराज, राहुल श्रीवास्तव, बाबा तिवारी, पप्पू दौन, नारज पोरवाल, नितिन पाठक आदि सहित लगभग एक सैंकड़ा से अधिक श्रोतागण उपस्थित रहे।

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