उरई। सड़क के किनारे बैलगाड़ियों में आशियाना बनाकर रहने वाले लौह गढ़ियों में नोट बंदी के असर की वजह से हाहाकार मच गया है। बुधवार को जब इस समुदाय की महिलाओं ने बच्चों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचकर रोना-धोना शुरू किया तो लोग द्रवित हुए बिना नही रहे। अधिकारियों ने उनका ज्ञापन तो ले लिया लेकिन उनकी मदद कर पाने में वे असहायता जता रहे थे।
नोटबंदी की वजह से मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है। इनमें लोहे के सामान पीटकर जैसे-तैसे पेट भरने वाले लौह गढ़िये समुदाय के लोग भी शामिल हैं। कैश की किल्लत के बाद से लोग उनके यहां झांकने तक नही पहुंचे। उनके पास खाने-पीने का जितना इंतजाम था सारा ठिकाने लग चुका। भूख से तड़पते बच्चों को देखकर इस समुदाय की महिलाएं आज बच्चों को साथ लेकर मदद की गुहार करने प्रशासन की चैखट पर पहुंच गईं। कलेक्ट्रेट में बाकायदा इन महिलाओं में से कई दहाड़ें मारकर रोने लगीं तो अजीब दृश्य बन गया। जिलाधिकारी ने सिटी मजिस्ट्रेट को भेजकर उनका ज्ञापन तो मंगा लिया लेकिन वे इसमें क्या मदद कर सकती हैं यह सवाल खुद उनकी ओर से पूंछने वालों से जड़ दिया गया। हांलाकि डीएम ने बाद में यह भी कहा कि अगर सरकारी स्तर से मदद की कोई व्यवस्था नही होगी तो वे व्यक्तिगत रूप से मानवीय आधार पर उनकी कुछ न कुछ मदद करने की कोशिश जरूर करेगीं।
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