konch7कोंच-उरई। यहां ब्लॉकेश्वर महादेव मंदिर पर जारी देवी भागवत पुराण के दौरान रविवार की कथा में कथा व्यास स्वामी शिवशंकरानंद सरस्वती ने भगवती जगदम्बा को समस्त प्रकार के भयों और ब्याधियों का नाश करने वाली निरूपित करते हुये कहा कि मां जगज्जननी देवताओं, सिद्धों, विद्याधरों, मुनियों एवं समस्त मानव जाति को शरण देने वाली हैं। वे राजभय, चोरभय एवं पीड़ाओं से मुक्ति दिलाने बाली हैं।
देवी भागवत कथा आरम्भ होने से पूर्व कथा परीक्षित राजाराम कुशवाहा ने कथा व्यास का माल्यार्पण कर सम्मान किया। कथा प्रवाह को आगे बढाते हुये कथा व्यास कहते हैं कि शुम्भ निशुम्भ नामक दानवों के अत्याचार से पीड़ित देवताओं ने जगदम्बा की आराधना की, भगवती पार्वती गंगा में स्नान करने के लिये पर्वत गुफा से निकलीं तो भयभीत देवताओं ने उनसे रक्षा करने का अनुरोध किया। मां पार्वती के शरीर कोश से अम्बिका का प्राकट्य हुआ। उस परम सौंदर्यशाली गौरी के रूप को देखकर चंडमुंड ने शुम्भ को जाकर कहा कि उस नारी रत्न को आप अपने यहां लाइये। शुम्भ ने सुग्रीव नामक दैत्य को भेज अपना प्रणय निवेदन किया। जगदम्बा ने अपने प्रण की व्यवस्था बतलाई कि जो उन्हें युद्घ में जीतेगा उसी के साथ उनका विवाह होगा। धूम्रलोचन अपना प्रस्ताव लेकर गया और भगवती की हुंकार मात्र से भस्म हो गया। चंडमुंड को मां चामुंडा ने सिर काटकर मां कौसकी के पास रखा इसलिये उनका नाम चामुंडा पड़ा। सभी देवियों ने मिल कर दैत्यों से युद्घ आरम्भ किया, भगवान शंकर को शुम्भ के पास दूत बना कर भेजा इसलिये जगदम्बा का एक नाम शिवदूती पड़ा। कालिका एवं चामुंडा ने रक्तबीज का रक्तपान किया और वह निष्प्राण हुआ। इस प्रकार आसुरी सेना का विनाश देख शुम्भ निशुम्भ विचार करने लगे और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक दिन तो सभी को मरना है इसलिये उद्यम करना चाहिये-
सुखं, दुरूखं तथैवार्यु जीवितं मरणं नृणामं्।
काले भवति सम्प्राप्ते सर्वथा दैवर्निमिते।।
घनघोर युद्ध के बाद शुम्भ निशुम्भ का उद्धार हुआ, राजा सुरथ को मां की कृपा से खोया राज्य वापिस मिला एवं समाधी वैश्य को निर्मल ज्ञान की प्राप्ति हुई। ब्रह्मा विष्णु के विवाद को महादेव ने शांत कराया। माता के 108 शक्तिपीठों का भी कथा व्यास ने दर्शन कराया।

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