हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महात्मा गांधी से बड़ा ब्रांड बताने के अभद्र बयान के बाद राजनीति में तूफान आ गया और भाजपा को इसके चलते बैकफुट पर जाना पड़ा। बाद में अनिल विज ने यह कहते हुए अपना बयान वापस ले लिया कि उनका मकसद किसी की भावना को आहत करना नहीं है, लेकिन उन्होंने अपने बयान के लिए माफी मांगने से इंकार कर दिया। हरियाणा के मुख्यमंत्री सहित भाजपा के अन्य नेताओं ने विज के बयान से यह कहते हुए किनारा किया कि यह उनका निजी बयान था। जिससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन इस बयान के आधार पर विज के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की मंशा भी हरियाणा के मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी तक ने नहीं दिखाई।
इसके पहले भाजपा के सांसद साक्षी महाराज ने मुसलमानों को नीचा दिखाने के लिए एक बयान देकर बवंडर खड़ा कर दिया, जिसके बाद चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस जारी किया। अपने को फंसता देख साक्षी महाराज ने सफाई दी कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती जबकि चुनाव आयोग ने जो कारण बताओ नोटिस उन्हें भेजा है वह अंग्रेजी में है। चुनाव आयोग ने उनकी लचर लीपापोती पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। साक्षी महाराज को बेशर्मी के सारे रिकार्ड तोड़ने के मामले में गिनीज बुक ऑफ द वर्ल्ड रिकार्ड में जगह मिलना तय है और एक नया रिकार्ड कायम करने के लिए उन्हें पुरस्कृत भी करने की कोई योजना मोदी सरकार द्वारा बनाई जा सकती है।
यह तो कुछ उदाहरण हैं, वैसे भाजपा के नेताओं का एक वर्ग स्थापित राष्ट्रीय मान्यताओं के खिलाफ बयानबाजी करके राजनीतिक स्थिति को बहुत ही विवादपूर्ण मोड़ पर पहुंचा चुका है जो कि चिंता का विषय है। सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा के लिए आचरण में शील का निर्वाह भारतीय संस्कृति में अत्यंत अपरिहार्य माना गया है, लेकिन भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाला भाजपा के कॉडर के एक वर्ग का शील में कोई विश्वास नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुए अभी तीन वर्ष का समय भी नहीं हुआ है। इस बीच उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि मजबूत करने के लिए बाजारू हथकंडों का इस्तेमाल तो बहुत किया, जिसका उन्हें काफी हद तक लाभ भी मिला है। विमुद्रीकरण के उनके फैसले के पक्ष में एक भी वित्तीय विशेषज्ञ राय नहीं दे पा रहा लेकिन इसके बावजूद देश के बहुमत में यह धारणा बनी हुई है कि मोदी ने भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ बहुत बड़ा जेहाद बोला है इसलिए मोदी को राजनीतिक तौर पर कुल मिलाकर इस मामले में लाभकारी अवसर मिल रहा है। यह मार्केटिंग की दुनिया के महारथियों के द्वारा उनका इस्तेमाल करने के लिए उन्हें दिए जा रहे समर्थन का नतीजा है। उनकी ब्रांडिंग इसी में शुमार एक पहलू है।
लेकिन भाजपा के स्तरीय नेता तक अंदर ही अंदर यह मानते हैं कि देश के लिए मोदी अभी ऐसा कोई योगदान नहीं कर पाए जो उन्हें औसत से ऊपर खड़ा कर सके। उनमें कालजयी महानता को हासिल करने की महत्वाकांक्षा है तो इसे सकारात्मक माना जाना चाहिए क्योंकि देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर आसीन होने के नाते इस महत्वाकांक्षा के चलते वे देश में बहुसंख्यक गरीब आबादी के लिए कोई असाधारण कार्य कर गुजर सकते हैं, जिनसे देश की तमाम कमजोरियों और कुरीतियों का अंत हो सकता है। लेकिन फंतासी की बात और है। वास्तविकता में मोदी के कदम इस ओर बढ़ते दिख नहीं रहे हैं क्योंकि मोदी बहुत प्रेक्टिकल हैं। उन्हें मालूम है कि निहित स्वार्थों से टकराने का निर्णय दुधारी तलवार की तरह है। या तो इस फैसले से वे कामयाब होने पर इतिहास पुरुष बन सकते हैं या शक्तिशाली होने की वजह से निहित स्वार्थी तत्व उनके लिए इतिहास के कूड़ेदान में जा गिरने की नियति तय कर सकते हैं। इसलिए मोदी कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते। फिर भी हर्र लगै न फिटकरी रंग चोखा की तर्ज पर केवल भाषणों की हुंकार से अवतार का दर्जा हासिल करने का कोई मौका वे नहीं चूक रहे। उनके इसी इशारे के चलते भाजपा के नेताओं का एक वर्ग उनकी चाटुकारिता में आगे निकलने के लिए अभद्रता की सारी सीमाएं तोड़ने में गुरेज नहीं कर रहा।
संयोग से महात्मा गांधी मोदी से पहले गुजरात प्राइड हैं। यह अहसास मोदी को है इसलिए कांग्रेस के महिमामंडन के अवलम्ब के रूप में महात्मा गांधी की बन चुकी उपयोगिता को जानते हुए भी वे महात्मा गांधी के आदर में कमी का प्रदर्शन कर अपनी फजीहत कराने की सोच भी नहीं सकते। लेकिन आरएसएस में एक बड़ा तबका है जो अपनी हीन भावना के कारण इस बात को नजरंदाज करके देश के मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रह और शत्रुता का जहर अपने मन में कूट-कूट कर भरे हुए है कि मौजूदा मुसलमानों में कोई विदेशी नहीं है। इस समय के देश के लगभग पूरे मुसलमान कनवर्टेड हैं यानी हिंदुओं के ही भाई बंधु हैं। उनको दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में रखने की सोचना किसी भी तरह से न तो नैतिक और न ही वैधानिक दृष्टि से औचित्यपूर्ण है।
यह वर्ग महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के तमाम विराट पहलुओं को नजरंदाज कर उन्हें लेकर अपनी पूरी चेतना इसमें केंद्रित किए हुए है कि उन्होंने बंटवारे के बाद पाकिस्तान को अतिरिक्त मुआवजा क्यों दिलवाया। देश की एकता बनाए रखने के लिए महात्मा गांधी द्वारा किए गए त्याग को वे मुसलमानों को सिर चढ़ाने की उनकी बदमाशी के रूप में देखते हैं जबकि हकीकत यह है कि देश और समाज के लिए कुछ करने में उनके कितने भी बड़े आदर्श महात्मा गांधी के योगदान के सामने पासंग भी नहीं हैं। महात्मा गांधी अगर किसी राजनीतिक पद के तलबगार होते तब तो यह माना जा सकता था कि वे मुसलमानों को वोट के लिए रिझाने हेतु हिंदुओं की बलि उनके सामने च़ढ़ाने पर आमादा रहे पर महात्मा गांधी ने तो कोई पद हासिल किया ही नहीं। उन्होंने अपने परिवार को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए भी ऐसा नहीं किया। उनके पौत्र राजमोहन गांधी जनता दल के उम्मीदवार के रूप में 1989 में अमेठी से राजीव गांधी के मुकाबले हार गये जबकि इसे असली गांधी और नकली गांधी के बीच मुकाबले के रूप में पेश किया गया था। अगर गांधी कैलकुलेटिव होते तो क्या उनके वंश के किसी आदमी के चुनाव में हारने की नौबत आ सकती थी।
अनिल विज ने पहले भी महात्मा गांधी के प्रति भड़ास निकाली थी। उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी से बचाने के लिए जानबूझ कर महात्मा गांधी द्वारा प्रयास न करने को इस मामले में एक मुद्दा बनाया था। गांधी की अहिंसा के नाम पर कुछ न करने की नीति से आज तक की पीढ़ियों का एक बड़ा वर्ग उनसे नाराज है लेकिन अनिल विज इस मामले में किस मुंह से महात्मा गांधी की आलोचना कर सकते हैं। क्या वे और उनकी पार्टी भगत सिंह के रास्ते को सही मान सकती है। भगत सिंह घोषित रूप से नास्तिक और कम्युनिस्ट थे जबकि भाजपा के लिए ऐसे आदमी से बढ़कर पापी कोई नहीं हो सकता। तो भगत सिंह की आड़ में भाजपा के लोगों को महात्मा गांधी की फजीहत करने का क्या अधिकार है।
भगत सिंह हों या नेताजी सुभाष चंद्र बोस, निजी तौर पर गांधी जी से बहुत ज्यादा नुकसान झेलने के बावजूद वे गांधी के प्रति हमेशा आदर व्यक्त करते रहे। वर्ग चेतना के नाते उन लोगों के विचारों में कभी मेल नहीं हो सकता था लेकिन इसे लेकर महात्मा गांधी की नीयत में कोई खोट उन लोगों ने कभी नहीं दिखाया। इस नाते अनिल विज और आरएसएस के लोग भगत सिंह की गोद में बैठकर महात्मा गांधी को गाली देने का अनर्थ न करें, तो ही अच्छा है।
विज ने कहा कि खादी पर महात्मा गांधी का कोई पेटेंट नहीं है इसलिए खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर में गांधी की चरखा कातती तस्वीर की बजाय मोदी की चरखा कातती तस्वीर लगा दी गई तो इसमें कौन सा गुनाह हो गया। उनका सवाल बड़ा मासूम है लेकिन यह बेशक बहुत बड़ा गुनाह या दुस्साहस है। महात्मा गांधी के चित्र की वजह से बकौल अनिल विज खादी का पतन हो गया, यह कहने से ज्यादा मक्कारी कोई नहीं हो सकती। महात्मा गांधी पोरबंदर के प्रधानमंत्री के पुत्र थे और विदेश में पढ़े थे। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने बैरिस्टरी की। उनके संसार में अभिजात्य के निर्वाह के लिए विदेशी सूट-बूट में सजे रहना अपरिहार्य था लेकिन महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई में जन-जन को जोड़ने में रहन-सहन के फर्क को भी बड़ी बाधा माना तो उन्होंने एक झटके में विदेशी ताना-बाना झटक दिया और अपने हाथ से बुनी हुई खादी के कपड़े पहनने का व्रत ले लिया।
उन्होंने न केवल इस व्रत को अपने ऊपर लागू किया बल्कि देश के तत्कालीन पूरे भद्रलोक को रहन-सहन के मामले में इसी स्तर पर आने के लिए बाध्य किया जो कि बेहद कठिन कार्य था और त्याग की भावना के बिना यह सम्भव नहीं हो सकता था। इसलिए खादी की ब्रांडिंग में गांधी के अलावा कोई और चेहरा हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता। जहां तक मोदी की बात है, महात्मा गांधी की तुलना में उनकी दिशा तो एकदम उलटी है। वे खुद कहते हैं कि उन्होंने चाय बेची है यानी औसत से भी ज्यादा साधारण परिवार में उनकी परवरिश हुई। इसलिए महंगे और ब्रांडेड कपड़े, घड़ियां आदि उनकी मजबूरी नहीं हो सकती थी, लेकिन राजनीति में कामयाब होने के बाद उन्होंने अपने सहज रहन-सहन को एक किनारे करके ड्रेस सेंस के मामले में विश्व के किसी भी रईस और अभिजात्य परिवार से होड़ छेड़ दी। क्या कोई सोच सकता है कि मोदी चरखा चलाकर खुद अपने कपड़ों के लिए धागे बुनेंगे।
अनिल विज कितना बदतमीज है कि इसके बावजूद उसने यह कहा कि चरखे से बुनी खादी के लिए महात्मा गांधी की तुलना में मोदी ज्यादा बड़े ब्रांड हैं। मोदी को ब्रांड बनाने से तो खादी की असली भावना की हत्या ही हो जाएगी। हो सकता है कि विश्व के किसी भी नेता से बेहतर ड्रेस सेंस की बदौलत मोदी देश का बहुत भला कर जाएं क्योंकि किसी उद्देश्य को हासिल करने के कई रास्ते हो सकते हैं। लेकिन गांधी जी का खादी पर बल देने के पीछे जो इरादा था वह मोदी का रास्ता फुलफिल नहीं करता। इसलिए या तो खादी ग्रामोद्योग बोर्ड को ही अप्रासंगिक घोषित कर भंग कर दिया जाना चाहिए या उसमें ब्रांडिंग के लिए गांधी का चेहरा ही रहने देना चाहिए। अनिल विज ने बेहद धृष्टता की है इसलिए पीएम में जरा भी नैतिकता और बड़प्पन है तो उनको विज की हरियाणा मंत्रिमंडल और पार्टी से बर्खास्तगी सुनिश्चित कर देना चाहिए। अन्यथा यह माना जाएगा कि उनकी मानसिकता बेहद धूर्ततापूर्ण है।
विज से लेकर साक्षी महाराज तक भाजपा में ऐसे लोगों की भरमार है जो बेहयायी की पराकाष्ठा किए हुए है। इसके कारण आधुनिक कार्य संचालन में कितनी दिक्कत हो सकती है। खुद मोदी को इसका अहसास है। इसीलिए उन्होंने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के चुनाव में हाशिये पर डाल दिया। धर्मभीरुता के कारण स्वयंभू सर्वोच्चता का वरण किए हुए संन्यासियों के अहंकार से लोकतांत्रिक व्यवस्था तहस-नहस हो सकती है। इस सूत्र को समझते हुए जैसे उन्होंने योगी आदित्यनाथ को लो-प्रोफाइल में करने का विवेक दिखाया है वैसे ही विज और साक्षी महाराज के मामले में भी उन्हें दिखाना होगा। साक्षी महाराज की तो इंतहा है। वे कितने बड़े धार्मिक हैं, उनका इतिहास सब जानते हैं। जिन पर बलात्कार तक के आरोप लग चुके हैं।
लोकसभा चुनाव में सफलता के लिए भानमती का बेमेल कुनबा जोड़ना मजबूरी हो सकता था लेकिन अब फार्मूला फिल्म चलाकर गरिमा घटाने की कोई तुक मोदी के लिए नहीं रह गई। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के पहले साक्षी महाराज के एक और अवतार विनय कटियार ने अपनी कुंठा के चलते अयोध्या मुद्दे पर बहुत क्रांतिकारी तेवर दिखाने शुरू किए थे जिससे चुनाव बहुत संगीन परिस्थितियों में होने का अंदेशा बन गया था लेकिन मोदी ने नोटबंदी का पासा फेंककर इस मुद्दे को यूपी की राजनीति के केंद्र से बाहर कर दिया। यह भी एक बेहद विवेकपूर्ण कदम था। इसी तारतम्य में यह कहना होगा कि महानता इंपोज नहीं की जा सकती। आपकी करनी में दम है तो समाज और युग अंततोगत्वा इतिहास में आपको महान के रूप में बखानने की जगह बना ही देता है। साहित्य में मुक्तिबोध और राजनीति में बाबा साहब अम्बेडकर इसके उदाहरण हैं। जिन्हें अपने जीवित रहते हुए उपयुक्त सम्मान नहीं मिल पाया लेकिन बाद में वे एक युग के प्रतीक बन गये। इसलिए मोदी को अधीर नहीं होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि खुद को महान साबित कराने के लिए किसी महान शख्सियत को अपने मुकाबले बोनसाई साबित कराने की ट्रिक खलनायक की कोटि में खड़ा करने का काम करती है। इस मामले में तुलनाओं की जगह इतनी बड़ी लाइन खींचने की रणनीति कामयाब होती है कि उसके सामने पहले की सभी लाइनें छोटी पड़ जाएं।







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