कोंच। कोंच तहसील क्षेत्र के बाशिंदे भले ही विधानसभा चुनाव में अपना प्रतिनिधि चुनते हों लेकिन हकीकत यह है कि वे पोलिंग बूथ तक बहुत ही अनमने होकर वोट डालने जाते हैं। यहां के लोगों को लगता है कि वह अपने लिये नहीं, किसी पराये के लिये मतदान करने जा रहे हैं। उनका दर्द इसलिये भी लाजिमी है कि बर्ष 2007 तक वे ऐसा विधायक चुनते रहे हैं जिसे वे अपना कह सकते थे लेकिन 2012 से पहले हुये परिसीमन में बुंदेलखंड की जो दो सीटें खत्म की गईं उनमें कोंच भी शामिल थी। इस टूट और बिखरन के दंश से उबरने में उन्हें अभी वक्त लग सकता है। इलाकाई बाशिंदों का आरोप है कि दो दफा यह सीट अनारक्षित रहने के बाद 1962 से 2007 तक सुरक्षित रही जिसके कारण ऐसा कोई जानदार नेता यहां नहीं बन सका जो यहां के लोगों के लिये असरदार पैरोकारी कर पाता। इसी का नतीजा है कि कोंच सीट खत्म हो गई और यहां के लोग सिर धुनते रह गये।
सरोवरों, बाग बगीचों, ऐतिहासिक, पुरा और सांस्कृतिक धरोहरों से पूरी तरह समृद्घ कोंच तहसील में अगर दृष्टिïपात करें और यहां वहां पड़े शिलाखंडों और मंदिरों मस्जिदों का अध्ययन करें तो साफतौर पर कहा जा सकता है कि सांम्प्रदायिक सद्भाव के मामले में भी यह तहसील जिले की अन्य तहसीलों से बीस ही होगी। इसको अगर आबादी के लिहाज से देखा जाये तो 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की कुल आबादी 3 लाख 20 हजार 131 है जबकि कुल 2 लाख 21 हजार 421 मतदाता हैं। माधौगढ विस क्षेत्र में पुरुष 97 हजार 072 और 82 हजार 018 महिला हैं जबकि 4 अन्य मतदाता हैं तथा उरई (सु) विस में पुरुष मतदाता 22 हजार 700 एवं महिला मतदाता 19527 एवं 3 अन्य हैं। इस तहसील में कुल 279 गांव लगते हैं जिसमें 202 आबाद हैं। कोंच तहसील क्षेत्र के माधौगढ विधानसभा में लगते इलाके में 206 पोलिंग बूथ हैं और उरई विधानसभा में 47 बूथ। खेती किसानी हो या बंज व्यापार, सांस्कृतिक गतिविधियां हों अथवा सामाजिक सरोकार, और तो और स्वातंत्र्य समर में भी कोंच से सैकड़ों स्वाधीनता सेनानियों की फौज ने बरतानबी हुकूमत से लोहा लेकर कोंच के नाम को स्वर्णाक्षरों में अंकित कराया। यानी, हर लिहाज से संपन्न होने के बाबजूद यहां के लोगों को अनाथ जैसी स्थिति में ला पटका गया है। इस टूटन के दंश को लेकर जब यहां के बुद्घिजीवी तबके से लेकर आम आदमी तक से सवाल किये गये तो उनकी सवालिया नजरें खुद इन सवालों के जबाब ढूंढती दिखीं।
-प्यार मोहम्मद
समाजसेवी और अल्पसंख्यक समुदाय के नेता प्यार मोहम्मद कहते हैं कि कोंच को अनाथ जैसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया गया है। यहां से अब दो विधायक चुने जाते हैं लेकिन दोनों ही यहां के नहीं होकर उरई और माधौगढ के होते हैं। इन विधायकों को कोंच तहसील के लोग अपना भी नहीं कह सकते हैं। इस त्रासदपूर्ण स्थिति से निकलने की तो कोई सूरत फिलहाल बनती नहीं नजर आती है और विधानसभा टूटने की पीड़ा यहां के लोगों को सालती रहेगी।
-कढोरेलाल यादव
गरीबों को नित्य प्रति भोजन कराने बाली संस्था दरिद्र नारायण सेवा समिति के संयोजक कढोरेलाल यादव बाबूजी कहते हैं कि कोंच विधानसभा टूटने की पीड़ा अभी भी यहां के लोगों के दिलों में है। आजादी के बाद से ही कोंच विधानसभा का अस्तित्व रहा है और यहां से निर्वाचित होने बाले जनप्रतिनिधि को सीना ठोंक कर यहां के लोग अपना कहते थे, अपने मन माफिक काम कराते थे, लेकिन अब ‘किसे अपना विधायक कहेंने की स्थिति है।
-हिफजुर्रहमान महाते
इलाके के एक और अल्पसंख्यक नेता हिफजुर्रहमान ठेकेदार भी विधानसभा टूटने से खासे आहत हैं। उन्होंने कहा, कोंच शायद नेताओं के मामले में अनाथ रही है जिसका नतीजा है कि यह सीट खत्म हो गई। जब परिसीमन आयोग की बैठक झांसी में हुई थी तो कोंच से एक भी नेता वहां अपनी बात कहने नहीं पहुंचा था। अगर यहां का राजनैतिक नेतृत्व अपनी बात आंकड़ों सहित आयोग के समक्ष रख पाता तो यह सीट बच भी सकती थी। टूटन के दंश से उबरने में अभी वक्त लगेगा।
-जितेन्द्र राय अहिरवार
दलित राजनीति के पैरोकार बसपा के पूर्व लोकसभा कोऑर्डीनेटर जितेन्द्रराय अहिरवार का कहना है कि भले ही यह सीट सुरक्षित रही हो लेकिन तहसील क्षेत्र के लोग कोंच विधानसभा को लेकर गर्वानुभूति करते रहे हैं। कोंच सीट समाप्त होने से यहां का विकास अवरुद्घ हो गया है और इस टूटन का दंश अभी निकट भबिष्य में मिटने बाला नहीं है। वोटरों के मामले में भरी पूरी होने के नाते कोंच तहसील को विधानसभा चुनाव में नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।






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