समाजवादी पार्टी ! ए अनटोल्ड स्टोरी, नरेश उत्तम से मुलाकात की मंजूरी देकर नेताजी ने दिया पैगाम सही साबित हुआ यह आंकलन

पिता-पुत्र के खेमों के बीच तनातनी के चरम पर मुलायम सिंह यादव ने जब अखिलेश खेमे के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम के साथ अपने आवास पर सौहार्द्रपूर्ण बैठक की थी तभी सपा परिवार में युद्ध के कठपुतली मंचन की बात उजागर हो गई थी। इन पंक्तियों के लेखक ने उसी समय लिखा था कि मुलायम सिंह द्वारा नरेश उत्तम की मुलाकात की प्रार्थना को कबूले जाने में जो पैगाम छिपा है उसकी इबारत लोगों को पढ़ लेनी चाहिए और जान लेना चाहिए कि यह पारिवारिक युद्ध मॉक ड्रिल से आगे नहीं बढ़ पाएगा। हालांकि मॉक ड्रिल में कोई शहादत नहीं होती लेकिन इसमें मुगले आजम के फिल्मांकन की तरह कुछ लोगों की बलि भी चढ़ी है। जिनमें मुलायम सिंह के सबसे प्रिय अनुज शिवपाल यादव के करियर की बलि शामिल है।

akhilesh2इन पंक्तियों का लेखक हमेशा इस बात का जिक्र करता रहा है कि शिवपाल और प्रो. रामगोपाल के बीच मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व के तीसरे कार्यकाल में इतनी जोरों की ठन गई थी कि सैफई महोत्सव के दौरान तमाशा बन गया था। इन पंक्तियों के लेखक ने सीनियर आईपीएस अधिकारी स्वर्गीय बीएल यादव को अपने ब्लॉग में इस मसले पर कई बार कोट किया था कि आईजी जोन कानपुर के बतौर वे महोत्सव में ड्यूटी पर थे और वहां जो घटा उसके बारे में रात 2 बजे मोबाइल पर उन्होंने बताया था कि नेताजी के सामने ही अजीब स्थिति बन गई। जब नेताजी के पुकारने के बावजूद शिवपाल के व्यवहार से तमतमाये प्रोफेसर साहब ने महोत्सव के संचालन के लिए मंच पर आने से मना कर दिया। जबकि इसके पहले सैफई महोत्सव के मुख्य समारोह के संचालन की बागडोर वे अपने हाथ में ही रखते थे। उन्होंने मुलायम सिंह के घर में युद्ध के सूत्रपात का अंदेशा जताया था, लेकिन इसमें भी मार्के की बात यह थी कि मुलायम सिंह ने प्रो. रामगोपाल यादव के बर्ताव को अपनी अवहेलना के रूप में संज्ञान में नहीं लिया था। क्या मुलायम सिंह उस समय अपने अनुज के व्यवहार के खूंखारपन की इंतहा को अपने पुत्र के भविष्य के संदर्भ में तौल रहे थे।

मुलायम सिंह ने प्रो. रामगोपाल का महत्व शिवपाल से इस कदर अदावत हो जाने के बावजूद भी पार्टी में बरकरार रखा। यह एक अनुभवी राजनीतिज्ञ की दूरंदेशी के अनुकूल था और इस शक्ति संतुलन की बदौलत ही वे शिवपाल के न चाहते हुए भी रामगोपाल की मदद से अपने नौसिखिए पुत्र अखिलेश का राजतिलक 2012 में बहुमत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश में करा पाये थे। जो लोग निर्वाचन आयोग में अखिलेश के मुकाबिल होने के बावजूद मुलायम सिंह की फिल्म पिट जाने के थ्रिल का लुत्फ उठा रहे हैं, दरअसल वे नादान हैं। मुलायम सिंह ने पुत्र को जोखिम से बचाने के लिए इस हार का वरण स्वयं किया था, क्योंकि वे जानते हैं कि उम्र ने उनके लिए हासिल करने को कुछ नहीं छोड़ा है। अब वे जो हसरतें अधूरी रह गई हैं वे अपने पुत्र को उस मुकाम तक पहुंचाकर ही पूरी करें तो गनीमत होगी और इसमें उन्होंने अपनी नौटंकी से पूरी तरह कामयाबी हासिल कर ली है।

mulayamयाद करिये निर्वाचन आयोग में जब पार्टी और साइकिल चुनाव चिन्ह पर दावेदारी के लिए दोनों तरफ से बहस शुरू हुई तो मुलायम सिंह का अंदाज कितना कूटनीतिक था। उन्होंने चुनाव आयोग की बेंच के सामने कहा कि उनकी पार्टी में स्पिलिट कहां हुआ है। अखिलेश खेमे ने उन्हें अपना संरक्षक माना है। अगर उन्हें निकाला होता तो विभाजन माना जाता, यह एक तरीके से उनके द्वारा अध्यक्ष पद छोड़कर संरक्षक की हैसियत तसलीम करने की स्वीकृति थी। पेंच तो तब फंसता जब उनकी जगह अध्यक्ष पद पर आसीन हो गए अखिलेश को वे पार्टी से निष्कासित बताते न कि रामगोपाल को। जो चतुर-चालाक विश्लेषक थे उन्होंने उसी समय निष्कर्ष प्रतिपादित कर दिया था कि मुलायम सिंह ने बहुत ही सधे अंदाज में अखिलेश के कदम की वैधानिक स्वीकृति प्रदान कर दी है और उनका आंकलन एकदम सही साबित हुआ।

मुलायम सिंह को इसी कारण यह आभास था कि सोमवार को पार्टी और चुनाव चिन्ह पर अधिकार का फैसला किसके पक्ष में होने वाला है, लेकिन अनुज शिवपाल और पत्नी साधना को यह मौका न मिल जाए कि उन्होंने अखिलेश के सामने उन सबका भविष्य बर्बाद करके सरेंडर कर दिया है, अचानक अखिलेश के प्रति रौद्र रूप अपना लिया। लखनऊ में पार्टी दफ्तर में पहुंचकर लोगों से उन्होंने कहा कि अखिलेश के उनके दुश्मनों से मिल गया है। वह मुसलमान विरोधी है। वे उसके खिलाफ खुद चुनाव लड़ेंगे…वगैरह वगैरह…..। उफ्फ, क्या गजब का नाटक करते हैं मुलायम सिंह। लेकिन अगर सब कुछ तयशुदा न होता तो चुनाव आयोग द्वारा अपना फैसला घोषित करने के दो-तीन घंटे पहले ही सपा के लखनऊ कार्यालय में अखिलेश की राष्ट्रीय अध्यक्ष की पट्टिका कैसे लग गई होती।

फैसला आने के बाद अखिलेश आशीर्वाद लेने के लिए मुलायम सिंह के पास पहुंचे और उनको पैर छूकर उन्होंने नमन किया। इस बार मुलायम सिंह ने उन्हें न फटकारा न लताड़ा। जो आदमी कुछ घंटे पहले अपने बेटे के खिलाफ इतने गुबार निकाल रहा हो वह अचानक इतना ज्यादा नरम हो जाए, इसमें कोई करिश्मा नहीं है बल्कि जैसा कि कहा जा रहा था कि यह सब कुछ डिक्टेटेड स्क्रीनप्ले के मुताबिक हो रहा था। निश्चित रूप से शिवपाल अपने अग्रज के इस पैंतरे से ठगे से रह गए होंगे। अमर सिंह भी जो बुढ़ापे में मुलायम सिंह को चरा डालने का मुगालता पाल बैठे थे, वे भी कम हतप्रभ नहीं होंगे। मुलायम सिंह चाहे जितना स्वांग करें, लेकिन अब बच्चा-बच्चा कहने लगा है कि पूरा घटनाक्रम प्रायोजित था मुलायम सिंह ने अपनी विरासत अखिलेश को उन्हें पूरी तरह सुरक्षित करके जिस अंदाज में सौंपी है, लोग उसे लेकर उनकी बुद्धिमता के वाकई में कायल हो गए हैं।

प्रो. रामगोपाल समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करते थे, लेकिन पिछले दो वर्षों से उनका यह अधिकार छीनने के लिए शिवपाल बहुत सक्रिय थे। समाजवादी पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में सारे समानधर्मी दलों के प्रमुखों को आमंत्रित करने के पहले भी उन्होंने लोकदल परिवार के दलों की संयुक्त सभाओं में इसी उद्देश्य को लेकर भाग लिया था। लेकिन गठबंधन राजनीति के हीरो बनने का उनका सपना मुलायम सिंह ने उन्हीं के मुंह से यह कहलवाकर चकनाचूर करवा दिया कि सपा किसी से गठबंधन नहीं करेगी। जिसे उनकी पार्टी पसंद आती हो वह उनकी पार्टी मर्जर कर जाए।

amar-singhशिवपाल मुलायम सिंह के इस पैंतरे का दूरगामी अर्थ समझने की बजाय शेखचिल्ली की तरह इस पर मुदित होते रहे। इस बीच मुलायम सिंह के इशारे पर ही अखिलेश ने दूसरे दलों से गठबंधन की पींगें आगे बढ़ाईं। इसके लिए राहुल और प्रियंका से वे अपनी ट्यूनिंग जमाते रहे। प्रशांत किशोर जो पहले सपा से गठबंधन के लिए बरास्ता शिवपाल और अमर सिंह आगे बढ़ रहे थे, हकीकत समझ में आने के बाद उन्होंने भी ट्रैक बदला। हालत यह है कि शिवपाल गठबंधन की बात कर मुकर जाने के लिए समानधर्मी दलों में भी बदनाम हो गए हैं जबकि अखिलेश को समाजवादी पार्टी का सर्वेसर्वा घोषित कराने का लक्ष्य पूरा कर लेने के साथ ही मुलायम सिंह ने गठबंधन का अगुआ उन्हें बनाने की भूमिका भी तैयार कर दी है। एक-दो दिन के अंदर ही कांग्रेस के साथ-साथ रालोद और जद यू के भी साथ सपा के गठबंधन का ऐलान हो जाने की उम्मीद है।

मुलायम सिंह की सबसे बड़ी इच्छा देश का प्रधानमंत्री बनने की थी, लेकिन वक्त ने चंद्रशेखऱ की तरह उऩका साथ नहीं दिया। अब मुलायम सिंह इस फिराक में हैं कि उनका बेटा ही प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आगे हो जाए तो उनकी मुराद पूरी होती दिख सकती है। यह लक्ष्य भी घर के अंदर से लेकर बाहर तक उठापटक की स्थितियां अखिलेश को विराटकाय बनाने के लिए पैदा करके उन्होंने निर्मित कर ली हैं। राष्ट्रीय फलक पर तीसरे मोर्चे की दृष्टि से आज अखिलेश का नंबर नीतीश से बहुत आगे है जबकि ममता को तो राष्ट्रीय राजनीति की अर्हता में ही शामिल नहीं समझा जा रहा। अपनी इस हकीकत से खुद भी परिचित होने के कारण ममता भी अखिलेश को ही प्रोत्साहित कर रही हैं। जहां तक राहुल का सवाल है वे किसी भी पद के मामले में बहुत अनिच्छुक व्यक्ति हैं इसलिए कांग्रेस के साथ अखिलेश का गठबंधन करना बहुत मुफीद है, क्योंकि अखिलेश से पर्सनल ट्यूनिंग बहुत बेहतर बन जाने पर राहुल के लिए सभी धर्मसंकटों से उबरकर उन्हें देश के शिखर पद तक को अॉफर करने में कोई मुश्किल महसूस नहीं होगी।

निर्वाचन आयोग के समाजवादी पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर फैसले के बाद सभी की जिज्ञासा है कि वे जानें मुलायम सिंह में प्रतिक्रिया में क्या करते हैं। लेकिन मुलायम सिंह को कुछ करना होता तो उसी दिन करते जब अखिलेश समर्थकों ने लखनऊ में पार्टी कार्यालय पर धावा बोलकर कब्जा किया था। मुलायम सिंह अपने आवास से कार्यालय पर उसी समय आ जाते तो सारे अखिलेश समर्थकों को भगाना पड़ता। इसी तरह अगर मुलायम सिंह ने अखिलेश को भी पार्टी से निकाल दिया होता तो निर्वाचन आयोग में वे उनके खिलाफ पक्ष रखने में सबल हो सकते थे।

akhileshअखिलेश खेमे ने 288 एमएलए में से 205, 68 एमएलसी में से 56, 25 सांसदों में से 15, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 46 सदस्यों में से 28 और राष्ट्रीय प्रतिनिधि के 5731 सदस्यों में से 4400 के शपथपत्र अपने पक्ष में निर्वाचन आयोग में दाखिल किए थे जबकि मुलायम सिंह बाहर तो बहुत गुर्राते रहे पर अपने पक्ष में आधिकारिक लोगों के शपथपत्र दाखिल कराने में उन्होंने कोई रुचि नहीं ली इसलिए मुलायम सिंह की क्या प्रतिक्रिया होती है, यह तो अभी से उजागर है। बहरहाल मुलायम परिवार कथा का पटाक्षेप हो गया है। अब चुनावी कुरुक्षेत्र में कौन कितना भारी है, इसे आंकने की बारी है।

निर्वाचन आयोग का फैसला अखिलेश के पक्ष में आने और कांग्रेस से गठबंधन की सूरत में प्रियंका, डिंपल की संयुक्त सभाओं की सम्भावना के मद्देनजर भाजपा भी विचलित है और बसपा भी। हो सकता है कि इसके चलते दोनों पार्टियां अपने पहले से तयशुदा प्रत्याशियों में फेरबदल करें। जो भी हो उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का मंजर जितना इस समय दिलचस्प है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया।

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