बिहार की तर्ज पर समान विचारधारा वाले दलों का महागठबंधन बनाकर भाजपा को मात देने का मंसूबा संजोये सपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के सीएम अखिलेश यादव के सामने चुनौतियों का अंत नहीं हो रहा है। महागठबंधन में पार्टनर बन रहे दलों की बढ़-चढ़कर मांग उनके लिए समस्या बन गई है, लेकिन अगर बारीकी से स्थितियों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सहयोगी दल बंदर घुड़की दे रहे हैं। आखिर में सपा के आगे झुक जाना ही उनकी नियति है। इसे देखते हुए कांग्रेस और रालोद के साथ तय होने वाले सपा के चुनावों की समीकरणों की बात अलग है लेकिन इससे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि इस गठबंधन में जद यू को भी शामिल होना था। उसकी चर्चा तक सपा खेमे द्वारा क्यों बंद कर दी गई है। महागठबंधन की खबरों में यह एक ऐसा कोण है जो सामाजिक न्याय की राजनीति की उलझी लटों को उजागर करता है।
समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के लिए 90 से कम सीटें तय की हैं जबकि कांग्रेस सौ से सवा सौ तक सीटें चाहती है। रामगोपाल यादव तो कांग्रेस को 60 सीटों की सीमा में ही निपटा देने के पक्षधर हैं, लेकिन अखिलेश का इस मामले में कांग्रेस के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर है और अगर कुछ वर्षों के राजनैतिक घटनाक्रम को देखा जाए तो यह जाहिर होता है कि अखिलेश सॉफ्ट के साथ-साथ बहुत कैलकुलेटिव भी हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अखिलेश यूपी में इस समय सबसे ज्यादा दूरंदेशी नेता हैं इसलिए कांग्रेस की सद्भावना पाने के लिए कुछ ज्यादा ही उदारता दिखाने में उन्हें परहेज नहीं है। जहां तक रालोद की बात है, हकीकत यह है कि अजीत सिंह का किरदार अभी तक जितना बेपर्दा हो चुका है उसमें उनको 20 सीटें दी जा रही हैं, यह भी बहुत है। बेपेंदी का लोटा भी उनकी अवसरवादिता के सामने शरमा जाता है। अगर आज भाजपा उन्हें लिफ्ट दे दे तो वे भाजपा से हाथ मिला सकते हैं, लेकिन भाजपा ने कुछ दिनों उनका इस्तेमाल भी किया पर अब भाजपा का नेतृत्व उन्हें बैंगन के भाव भी पूछने को तैयार नहीं है, इसलिए वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति को मजबूत करने की खातिर के नाम पर अपने को बहुत बड़ा जेहादी शो करने की कोशिश कर रहे हैं।
अजीत सिंह ने अपने बेटे जयंत चौधरी को आगे करके सपा से गठबंधन की कोशिशों को विराम देने और अन्य समानधर्मी छोटे-छोटे दलों से गठजोड़ की सम्भावना टटोलने की घोषणा करा दी है, लेकिन इसका अर्थ सपा पर दबाव बढ़ाने से ज्यादा कुछ नहीं है। रालोद के सामने इस समय मौं कौ और नहीं और तौ कौ ठौर नहीं की हालत है। अंततोगत्वा रालोद को सपा के साथ सौ-सौ जूते खाकर भी तमाशा घुसकर देखने की हालत स्वीकार करनी पड़ेगी।
कांग्रेस ने भी बिफरने का हाव-भाव दिखा रखा है, लेकिन कांग्रेसियों की हालत कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना जैसी है। उनकी शिकायत का सबब अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी नहीं खुद पार्टी का नेतृत्व है। राहुल गांधी और प्रियंका की कोई स्पष्ट रीति-नीति नहीं है। राहुल ने पहले जोश भरा था कि वे कांग्रेस को अकेले दम पर यूपी में सत्ता पर कब्जा दिलाने का दम दिखाएंगे। 27 साल यूपी बेहाल के उनके नारे में सपा की फजीहत करना भी शामिल था। इससे उत्साहित होकर प्रदेश के हर निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेसियों ने मुकाबले की कमर कस ली, लेकिन उनका नेता अब सरेंडर की मुद्रा में है। राहुल और प्रियंका ने निजी स्तर पर अखिलेश को यह आश्वस्त करा दिया है कि वे कितनी भी सीटें दें, उनकी पार्टी उनके साथ गठबंधन को तसलीम करेगी। इसलिए 87 सीटों पर भी कांग्रेस को सपा से समझौता करने में कोई दिक्कत नहीं है। खबर तो यह तक है कि इन 87 सीटों में भी राहुल और प्रियंका ने अखिलेश से यह वायदा कर रखा है कि वे अपनी और पार्टी की पसंद की बजाय अखिलेश के उम्मीदवारों को हाथ के पंजे का निशान एलाट करने को तैयार हैं।
जब समझौते की इतनी ललक हो तो इसमें रुकावट कैसे आ सकती है। तमाम जगह पूरी तैयारी कर चुके कांग्रेसियों का मन रखने के लिए सपा को आगाह करने की मुद्रा कांग्रेस हाईकमान द्वारा दर्शाई जा रही है, लेकिन इसका कोई अर्थ नहीं है। हालत तो यह है कि अखिलेश ने यह टटोल लिया है कि राहुल को भारत का पीएम बनने की कोई बहुत ललक नहीं है। वे पश्चिमी समाज के दुस्साहसी व्यक्तियों की तरह एडवेंचर के खेल के शौकीन हैं और राजनीति को भी इसी खेल की स्टाइल में कर रहे हैं। यह खेल जब तक चले वे मजा लेंगे लेकिन किसी भी दिन यह हो सकता है कि राहुल कह दें कि उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए कोई कोशिश नहीं करनी। ऐसे में कांग्रेस की विरासत बहुत आत्मीय सम्बंध बन जाने पर प्रधानमंत्री पद के लिए अखिलेश का नाम प्रपोज करके राहुल उन्हें आसानी से सौंप सकते हैं। इसी दूरदर्शिता के तहत अखिलेश राहुल और प्रियंका का दिल जीतने के लिए सीटों के मोल-तोल में कांग्रेस के मुताबिक कहीं पर भी टिकने को तैयार हैं। इसलिए वे लोग बहुत बेवकूफ हैं जो यह सोच रहे हैं कि महागठबंधन अभी पक्का नहीं है और सपा व कांग्रेस तक का सम्भावित मिलन बीच में ही रद्द हो सकता है।
लेकिन अखिलेश की सत्ता में एक बार फिर वापसी और भाजपा को कमजोर बनाने के लिए जद यू से कांग्रेस का गठबंधन रणनीतिक दृष्टिकोण से नितांत अपरिहार्य है, जिसको अखिलेश भी खूब समझते हैं लेकिन हाल की पारिवारिक लड़ाई में अपने दामाद तेजू के रुख की वजह से जिस तरह लालू यादव ने अखिलेश का साथ दिया उससे अखिलेश कहीं न कहीं अपने को उनकी अहसानों तले दबा मानते हैं। इस कारण लालू की बात मानना अखिलेश की मजबूरी है और लालू शहाबुद्दीन प्रकरण के चलते नीतीश कुमार से अंदर ही अंदर बहुत ज्यादा खफा हैं। इसलिए उनको सबक सिखाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहते। लालू ही अखिलेश पर दबाव बनाए हुए हैं कि वे जद यू को अपने महागठबंधन से दूर ही रखें और अखिलेश के लिए उनकी बात मानना एक मजबूरी है। हालांकि जद यू के अलग रहने से दूसरी बार सत्ता में वापसी का खेल अखिलेश के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है जिसे वे जानते हैं। भारतीय जनता पार्टी यूपी की एक बड़ी बैकवर्ड कौम कुर्मी समाज को अपने साथ जोड़े हुए है जो उसकी शक्ति का प्रदेश में काफी हद तक आधार माना जा सकता है। नीतीश के साथ अखिलेश अगर गठबंधन कर लें तो कुर्मी समाज की पैठ के मामले में भाजपा के होश उड़ सकते हैं। नरेश उत्तम की सपा में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति और इसके बाद नीतीश कुमार से गठजोड़ यह कुर्मियों का लगभग सपा के पक्ष में एकजुट कर देने का कारक सिद्ध होगा। सपा इसे लेकर आम के आम और गुठलियों के दाम की कहावत की सटीकता को अनुभव कर सकती है।
सपा के पास कुर्मी समाज प्लस तो होगा ही प्रदेश की चेयररेस के एक और मुख्य खिलाड़ी और उसके सबसे ज्यादा बड़े प्रतिद्वंद्वी भाजपा को कुर्मी समाज के छिटकने से बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होने की नौबत आ सकती है। अखिलेश इस बात को जानते हैं लेकिन वे करें तो क्या करें, लालू उनसे लगातार कह रहे हैं कि अब इटावा से पटना तक सजातीय समाज की एक ही इच्छा है उन्हें देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर बैठा देखने की। दूसरी ओर नीतीश कुमार भी इसी का सपना संजोये हुए हैं। इसलिए उन्हें नीतीश को किसी कीमत पर भाव नहीं देना चाहिए। अखिलेश उनकी यह दलीलें सुनने को विवश हैं।
महागठबंधन के पीछे जो भावना है अखिलेश का इस मामले में संकोच उसके लिए बहुत घातक साबित होने वाला है। जद यू के अलग चुनाव लड़ने और उसमें अन्य छोटे-छोटे दलों के शामिल हो जाने पर सपा को भारी नुकसान होगा जबकि अभी हालत यह है कि अगर सपा, कांग्रेस, रालोद और जद यू एक प्लेटफार्म पर चुनाव लड़ते हैं तो मायावती ने कितने भी मुसलमानों को टिकट क्यों न दिए हों, लेकिन मुस्लिमों के बहुतायत का समर्थन बिना किसी दुविधा के महागठबंधन को ही मिलेगा। अब अखिलेश पर है कि महागठबंधन के फैले हुए रायते को कैसे बटोरते हैं, लेकिन उनमें धैर्य भी है और अन्य बातें भी, इसलिए भरोसा रखा जाना चाहिए कि अंततोगत्वा महागठबंधन ही भाजपा से मुकाबले के लिए यूपी विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरेगा।








Leave a comment