26orai05 26orai06उरई। लोक सभा चुनाव 2014 के परिणामों को देखते हुए प्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आने के साथ ही जनरल कास्ट के धुरंधर नेताओं का अपनी-अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने का तांता लग गया था। लेकिन टिकट वितरण में ओबीसी कार्ड भारी पड़ गया। जिसके बाद इन नेताओं का भाजपा और मोदी प्रेम उतार पर आ गया है। जिले में भी राजनैतिक माहौल भाजपा समर्थकों के मोह भंग की प्रतिक्रियायों से अछूता नही है।
जिले की तीन सीटों में से एक आरक्षित है। शेष दो सीटों पर जनरल कास्ट के ही नेता निगाह गड़ाये हुए बैठे थे। उर्विजा दीक्षित, हरीओम उपाध्याय, सुशील द्विवेदी, संजय भदौरिया आदि नेताओं ने बसपा छोड़कर इसी मंसूबे के तहत भाजपा का दामन पकड़ा तो सपा से शीतल सिंह सेंगर, केशव सिंह सेंगर आदि भाजपा के पाले में आ गये थे। इसके अलावा रविकांत द्विवेदी, संजय त्रिपाठी, राजेश सिंह सेंगर नूरपुर आदि भाजपा के स्थाई नेताओं की कतार भी टिकट की दावेदारी में कम नही थी। लेकिन पार्टी ने इन सभी को धता बता दी।
सबसे ज्यादा नाराजगी ब्राहमण नेताओं और कार्यकर्ताओं में है जो राष्ट्रवाद के नाते भाजपा के गुन गाने में सबसे आगे थे। लेकिन अब वे लोग गिना रहे हैं कि भाजपा ने किस तरह जिले में एक भी टिकट ब्राहमण प्रत्याशी को न देकर उनकी कौम की बेइज्जती की है। ये लोग पूरी बुंदेलखंड की सूची हाथ मे लिए हुए हैं जिसमें 19 सीटों में से पार्टी ने केवल चार ब्राहमण जाति के प्रत्याशी तय किये हैं। इनमें झांसी सीट के रवि शर्मा तो सिटिंग एमएलए हैं। इसलिए उन्हें दोबारा उम्मीदवार बनाये जाने को ये भाजपाई अपनी कौम पर कोई एहसान नही मान रहे। तीन अन्य उम्मीदवारों में 1991 में सांसद रहे प्रकाश त्रिपाठी को पार्टी ने बांदा से, कर्वी सीट से 2009 के लोक सभा चुनाव में प्रत्याशी रहे चंद्रिका उपाध्याय को और महोबा सीट से पूर्व विधायक राकेश गोस्वामी को उम्मीदवार बनाया गया है।
इस तरह पार्टी ने ललितपुर, जालौन, हमीरपुर जिलों में ब्राहमण जाति का एक भी प्रत्याशी नही बनाया। कोढ़ में खाज की स्थिति यह है कि पांच ब्राहमणों की सामूहिक हत्या में आरोपित रहे और अपने जलबे के लिए सभी पार्टियों में मुंह मारते रहे अशोक चंदेल को भाजपा ने हमीरपुर सदर सीट का टिकट थमा दिया है। ब्राहमण समाज की प्रतिक्रिया से लगता है कि यह समाज इतने ज्यादा अपमान को सहने के लिए तैयार नही है जिससे भाजपा को उसके द्वारा कड़ा सबक देने का निर्णय अंदर ही अंदर लिया जा रहा है।
उधर जालौन जिले में कालपी सीट भाजपा हाईकमान ने ठाकुर समाज के नरेंद्र पाल सिंह जादौन के हवाले की है लेकिन ठाकुर समाज भी पार्टी से संतुष्ट नही है। उसका दर्द यह है कि नरेंद्र पाल सिंह भले तो हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिए जो चटक-मटक नेता में होनी चाहिए वह उनके पास नही है। उनको टिकट देकर पार्टी ने सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे का रास्ता अपनाया है। ठाकुर समाज को टिकट भी दे दिया और यह भी तय कर दिया कि जिले में इस समाज का कोई प्रतिनिधि विधानसभा में पहुंच भी न पाये।
इसके साथ ही ठाकुर समाज अपने हिस्से में कालपी की बजाय माधौगढ़ सीट के लिए दावेदारी जताता है। इसलिए माधौगढ़ में तो ठाकुर और ब्राहमण एक ही सुर में बीन बजा रहे हैं। उधर भाजपा के हिंदुत्व की जातिगत विभाजन द्वारा बीन बजते देख विरोधी पार्टियां बहुत खुश हैं।
जालौन जिले में टिकट वितरण के बाद असंतोष का लावा फूटने की खबरों से भाजपा हाईकमान भी विचलित तो है लेकिन इधर कुंआ, उधर खाई की स्थिति की वजह से वह अपने को किसी निर्णय पर पहुंचने में सक्षम महसूस नही कर पा रहा है। दरअसल पूरे बुंदेलखंड में भाजपा के जनरल कास्ट समर्थकों की जिद ओबीसी के प्रत्याशियों को बदलने की है। तिंदवारी सीट पर बृजेश प्रजापति को बदलने के लिए इन लोगों ने प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के आवास पर धरना तक दे डाला। बसपा से आये आरके पटेल की भी उम्मीदवारी उन्हें रास नही आ रही। माधौगढ़ क्षेत्र से मूलचंद्र निरंजन भले ही खाटी भाजपाई हों लेकिन पूरी जनरल कास्ट उनकी उम्मीदवारी को पचाने की हालत में नही हैं। दूसरी ओर बंुदेलखंड में सबसे ज्यादा आबादी ओबीसी की है। अगर उनकी उम्मीदवारी के कोटे को कम किया जाता है तो भाजपा से मुंह मोड़ कर यह समुदाय सपा की ओर रुख कर सकता है जो भाजपा को बेहद भारी पड़ेगा। ऐसी सूरत में पार्टी नेतृत्व आरएसएस के लोगों की मदद जनरल कास्ट को समझाने के लिए लेने की तैयारी में है लेकिन विडंबना यह है कि संघ का काडर भी जातिगत आवेश से अछूता नही है।

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