27orai09उरई। भाजपा में एक वर्ग भले ही पीएम मोदी तक के खिलाफ पूरी पार्टी ओबीसी के हवाले करने जैसी भड़ास निकाल रहा हो लेकिन अगर बुंदेलखंड में ही प्रत्याशियों के चयन का जातिगत विश्लेषण किया जाये तो इस धारणा के पैर कहीं नजर नही आते। बुंदेलखंड की 19 सीटों में से पांच अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं जबकि शेष 14 सीटों में से 7 पर जनरल कास्ट के और इतनी ही सीटों पर आबादी ज्यादा होने के बावजूद ओबीसी के उम्मीदवार तय किये गये हैं।
लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व की आंधी भाजपा के पक्ष में इतनी तेज थी कि किसी ने यह नही देखा कि पार्टी ने किस बिरादरी का उम्मीदवार बनाया है। लेकिन विधानसभा चुनाव ने इस लामबंदी को बिखेर कर रख दिया है। दरअसल लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा उत्तर प्रदेश में हर चुनाव में इतनी पिछड़ती जा रही थी कि उसका वजूद ही खत्म माना जाने लगा था। लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान ही इन हालातों में तब्दीली तो नजर आने लगी थी लेकिन फिर भी पार्टी के लोग आश्वस्त नही थे कि यूपी में उनको कितनी सीटें हाथ लग पायेंगी इसलिए टिकट की प्रतिस्पर्धा में तब ऐसी मारकाट की स्थिति पैदा नही हुई थी।
लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते भाजपा में टिकट के लिए एक अनार सौ बीमार की हालत पैदा हो गई। इस बीच दूसरी पार्टियों में शामिल होकर सत्ता सुख भोग चुके जनरल कास्ट के नेताओं ने तेजी से भाजपा में आमद कराई। इन नेताओं को पुश्तैनी तौर पर विधायकी का जो माॅडल विरासत में मिला था उसके चलते उन्होंने पार्टी से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें पाल ली थी। गौरतलब है कि 1989 के पहले तक प्रदेश में बुंदेलखंड जैसे अंचलों में अनारक्षित सीटों पर कुछ ही जातियों के उम्मीदवार प्रभावशाली मानकर तय किये जाने की परंपरा थी। लेकिन बाद में लोकतंत्र का चस्का जब हांशिये पर छिटकी हुई जातियों को भी लगा तो न केवल उनकी दांवेदारी भी बढ़ने लगी बल्कि इन जातियों के विधायकों की भी अच्छी खासी संख्या नजर आने लगी।
भाजपा के पुनरोदय को जो वर्ग पुरानी स्थिति की बहाली मान रहा है उसने टिकट के बंटवारे के समय पार्टी के लिए समस्या पैदा कर दी। भाजपा नेतृत्व ने पार्टी पर ऐसे लोगों के हावी होने की वजह से उनके साथ बहुत एडजस्ट किया। जनरल कास्ट में इसी के चलते आधी सीटें देनी पड़ी। सात सवर्ण उम्मीदवारों में झांसी, महोबा, बांदा और चित्रकूट में ब्राहमण और कालपी, हमीरपुर व बबीना में ठाकुर उम्मीदवार बनाये गये। जनरल कास्ट में भी वैश्य वर्ग में पार्टी के प्रति जबर्दस्त नाराजगी है। जिसका कहना है कि उसे एक भी सीट पर जगह नही दी गई है। जबकि एक समय बुंदेलखंड में उरई की सीट समाज के कददावर नेता स्व. बाबूराम एमकाम के पास रहती थी।
ओबीसी में दो सीटे कुर्मी, लोध बिरादरी को और दो कुशवाहा बिरादरी को दी गई हैं जबकि एक सीट अति पिछड़े समुदाय में प्रजापति समाज के उम्मीदवार को मिली है। ओबीसी की सीटों में बबेरू, मानिकपुर, तिंदवारी, चरखारी, माधौगढ़, गरौठा और ललितपुर शामिल हैं। बबीना सीट पर ठाकुर बिरादरी के राजीव दांगी उम्मीदवार बनाये गये हैं। लेकिन सवर्ण नेताओं को उनके नाम पर भी एतराज है। उनका कहना है कि राजीव का टिकट सवर्णों के साथ संतुलन के लिए नही उमा भारती के कारण किया गया है क्योंकि उमा भारती झांसी में उन्हीं के घर में अपना आवास बनाये हैं और राजीव उनका खर्चा भी उठाते हैं। जो कि बड़े ठेकेदार हैं। वैसे इस सीट पर चंद्र प्रकाश मिश्रा द्वारा दावेदारी की जा रही थी। जिनके समर्थकों का कहना है कि छवि और जनसंपर्क के मामले में वे बहुत आगे हैं। टिकट न देकर उनके साथ अन्याय किया गया है।
भाजपा नेतृत्व हिंदुत्व के आधार पर किये गये धु्रवीकरण का सत्यानाश होते देख घबराया हुआ है। पार्टी के तमाम अति उत्साही समर्थक भी इन प्रतिक्रियाओं से सदमें की हालत मे हैं। सबसे बड़ा खतरा तो यह है कि कई क्षेत्रों में जनरल कास्ट के निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में उतारकर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी को सबक सिखाने की साजिश रची जा रही है। ऐसी हालत में डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा नेतृत्व ने मध्यप्रदेश के प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री नरोत्तम मिश्रा को शुक्रवार को तमाम इलाकों में पार्टी के लोगों को समझाने के लिए भेजा।

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