समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर अंततोगत्वा गठबंधन हो गया है। राहुल गांधी ने इसे गंगा-जमुना का संगम करार दिया है। हो सकता है कि यह बेहद भावुक प्रतिक्रिया हो लेकिन इस गठबंधन को लेकर प्राकृतिक किस्म की बेकरारी कहीं न कहीं जरूर थी। जब राहुल गांधी ने अखिलेश को अच्छा लड़का कहकर उन्हें जाने-अनजाने में अंडरस्टीमेट किया था तो अखिलेश भड़क गए थे। इसके बावजूद उन्होंने कहा था कि हम लोगों के बीच उम्र का फासला बहुत कम है इसलिए हम लोगों को एक-दूसरे की पर्सनालिटी गिराने की बजाय बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। अगर ऐसा हम लोग करते हैं तो नतीजे बहुत शानदार होंगे। बाद के बयानों में राहुल ने यह जताया कि अखिलेश के बारे में उनके मुंह से अनजाने में कुछ निकल गया था जो उचित नहीं था। जब वे 27 साल यूपी बेहाल के नारे के साथ देवरिया से दिल्ली तक की पदयात्रा निकाल रहे थे उस समय अच्छे लड़के मुद्दे पर उनकी परीक्षा की नौबत बनी थी, लेकिन राहुल ने 27 साल यूपी बेहाल के दौरान सम्बोधित की हुई सभाओं में अखिलेश के साथ दोस्ती बढ़ाने का इरादा जताने में कसर नहीं छोड़ी।
उस समय समाजवादी पार्टी में आंतरिक विग्रह का तूफान मचल रहा था और अखिलेश के प्रति सहानुभूति की वजह से राहुल ने इसे लेकर अपनी तरह से प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने समाजवादी पार्टी के अंदरूनी घटनाक्रम में टांग फंसाये बिना यह जताया था कि यूपी में लड़ाई बुजुर्गों और उभर रहे युवा नेतृत्व के बीच छिड़ी है। बुजुर्ग नेतृत्व चुक जाने के बावजूद अपनी महत्वाकांक्षाओं का संवरण करने को तैयार नहीं है जबकि युवा नेतृत्व चाहता है कि बुजुर्ग उनके मार्गदर्शक की भूमिका में रहें लेकिन भविष्य का खाका खींचने के लिए उन्हें पूरी स्वतंत्रता मिले। आखिरकार ऐसा ही हुआ।
रविवार को राहुल और अखिलेश की संयुक्त पत्रकार वार्ता में जो मंजर रहा उसने यह साबित कर दिया कि दोनों युवा नेताओं की अगुवाई में हो रहा गठजोड़ अभी तक का सबसे सहज और निःस्वार्थ गठजोड़ है। संयुक्त प्रेसवार्ता में राहुल की साफगोई को लेकर मीडिया में उनकी सलाइयत को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि इस गठबंधन में कुछ भी बनावटीपन कुछ भी बेमेल नहीं है। यह गठबंधन समान इच्छाओं का स्वाभाविक मंच है और इस धारणा का विकसित होना उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए बहुत ही अच्छा लक्षण कहा जाएगा।
कांग्रेस और सपा दोनों ही सतही तौर पर मुस्लिम हिमायती दल हैं और इसी विचारधारा के तहत उन्होंने विधानसभा चुनाव के लिए गठजोड़ बनाया है। भाजपा इस समय मुसलमानों को लेकर कितनी ज्यादा आक्रामक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक यूपी विधानसभा के 403 क्षेत्रों में से अधिकांश में भाजपा अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। लेकिन इनमें से एक भी उम्मीदवार मुसलमान नहीं है। इस तरह की संकीर्ण मानसिकता देश की आजादी और गणतांत्रिक व्यवस्था के लिए गम्भीर खतरे का कारण बन सकती है। लेकिन सत्ता और प्रशासन के सर्वसमावेशी प्रतिनिधित्व की अपरिहार्यता के मामले में भाजपा और उसे पोषित करने वाले उग्रवादी हिंदू संगठनों की विपरीत राह है जिसके कारण भाजपा इस पर गौर नहीं करना चाहती।
बहरहाल जो भी हो बसपा ने मुसलमानों को बहुत ज्यादा टिकट दिए हैं लेकिन इसके बावजूद मुसलमानों की पहली पसंद कांग्रेस और इसके बाद समाजवादी पार्टी है। बहुजन समाज पार्टी इस तथ्य को समझ नहीं पाई। अब जबकि कांग्रेस और सपा का स्वाभाविक गठबंधन कायम हो चुका है तो मुसलमान बसपा के ऊपरी तौर पर ज्यादा कारगर महसूस होने वाले समीकरणों की परवाह किए बिना कांग्रेस-सपा गठबंधन की ओर अधिक रुझान दिखा रहे हैं। बसपा नेतृत्व को भी मुसलमानों के इस रुख का अहसास है इसलिए उसके द्वारा हददर्जे की संकीर्णता मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए दिखाई जा रही है।
कांग्रेस और सपा के बीच गठजोड़ हो जाने के बाद प्री-ओपीनियन पोल के निष्कर्ष बदल गए हैं। हर पोल का निष्कर्ष यह है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन को बहुमत भले ही न मिल रहा हो लेकिन सबसे लार्जेस्ट गठबंधन के रूप में उसकी हैसियत उभर रही है। सपा और कांग्रेस के लिए यह निष्कर्ष बहुत ही ताकतवर टॉनिक साबित हो सकते हैं। दूसरी ओर अभी कुछ समय पहले तक सपा की अंदरूनी लड़ाई की वजह से अपने लिए मैदान साफ मान बैठे भाजपा हाईकमान के सामने इस समय विचलित होने की स्थिति है। अगर पिछ़ड़े वर्ग के मतदाता बल्क में सपा में खिसक गये तो भाजपा की क्या गत बनेगी, यह कहने की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन सपा और कांग्रेस का गठबंधन सारी अव्यवस्थाओं का अंत कर देगा, लोगों के अंदर यह यकीन इन पार्टियों के नेताओं के लिए बहुत स्वाभाविक है। इस गठबंधन की शुभाशा ने लोगों को इसका समर्थक बना दिया है। उनकी कसौटी पर यह गठबंधन कितना खरा है, इसका पता चुनाव परिणामों से जल्द ही सामने आ जाएगा।







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