0 मुलायम और शिवपाल के बयानों से सपा को हो सकता है नुकसान
0 अल्पसंख्यक वोटों पर टिकीं सभी की निगाहें, राजनीतिक दल भरोसा जीतने में जुटे
उरई। सपा का कलहर फिर से सतह पर आ जाने के कारण मतदाताओं का भरोसा एक बार फिर से डगमगाने लगा है। सपा के पूर्व सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव द्वारा कांग्रेस-सपा गठबंधन के विरोध में दिए गए बयान और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव द्वारा नई पार्टी बनाने की घोषणा के बाद सपा के अंदर चल रहा अंतर्द्वंद्व एक बार फिर से खुलकर सामने आ गया है। इसका नुकसान पार्टी को प्रत्याशियों की हार के रूप में उठाना पड़ सकता है। हालांकि इन बयानों के बाद पार्टी नेतृत्व डैमेज कंटोल करने में जुटा है पर मतदान प्रक्रिया शुरू होने में चंद दिन शेष रह गए हैं ऐसे में वह मतदाताओं को कितना भरोसा दिला पाते हैं इसे लेकर संशय है। इस बार भी राजनीतिक दलों की निगाहें अल्पसंख्यक मतदाताओं पर टिकी हुई हैं और सभी दल इन मतदाताओं का भरोसा जीतने का प्रयास कर रहे हैं। करीब छह माह से सपा के अंदर घमासान मचा हुआ है। तमाम उलटफेरों के बीच जनवरी माह में आखिरकार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पार्टी में अपना सिक्का जमा लिया था और चुनाव आयोग द्वारा उन्हें पार्टी का मुखिया घोषित कर दिया गया था। इसके बाद कुछ समय के लिए पार्टी के अंदर चल रहा घमासान थमता हुआ सा नजर आया पर यह ज्यादा दिन तक नहीं रह सका। सपा अध्यक्ष व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव द्वारा विरोध में जो बयान दिया गया उससे पार्टी के अंदर असमंजस का माहौल पैदा हो गया। कार्यकर्ताओं को यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर किसकी बात माननी है और चुनाव में क्या करना है? इसके बाद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव द्वारा भी मतगणना के बाद नई पार्टी बनाने का एलान कर दिया गया। इससे भी पार्टी कार्यकर्ताओं पर बुरा असर पड़ा है। पार्टी के बड़े नेताओं द्वारा रुक-रुककर आ रहे इस तरह के बयानों से मतदाताओं में भी ऊहापोह की स्थिति है। मतदाताओं का भरोसा इसलिए डगमगा रहा है कि चुनाव से पहले जब सपा के अंदर एकजुटता नजर नहीं आ रही है तो चुनाव के बाद क्या हश्र होगा? कहीं उनका वोट बेकार न हो जाए इसे लेकर मतदाता सबसे अधिक चिंतित नजर आ रहे हैं। मुलायम सिंह व शिवपाल यादव के बयानों के बाद पार्टी नेतृत्व भले ही डैमेज कंटोल में जुट गया हो पर इन बयानों से सपा का बड़ा नुकसान हो सकता है। सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अल्पसंख्यकों वोटरों का भरोसा जीतना है। अखिलेश यादव के अध्यक्ष बनने और कांग्रेस से गठबंधन होने के बाद यह सपा इस भरोसे को जीतते हुए नजर आ रही थी पर पार्टी के बड़े नेताओं के बयान ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया है। अब देखना यह है कि इतने कम समय में पार्टी फिर से कैसे इन मतदाताओं का भरोसा जीत पाती है। बहरहाल इतना तो तय है कि पार्टी नेताओं के बयानों से पार्टी पर विपरीत असर पड़ेगा।

Leave a comment