0 राजनीतिक दलों द्वारा किए गए कर्जमाफी के वादे पर किसानों को संदेह
0 पिछले चुनाव में सपा ने भी किया था कर्जमाफी का वादा
उरई। विधानसभा चुनावों में विजय हासिल करने के लिए राजनीतिक पार्टियां किसानों पर दांव तो खेल रही हैं और सभी प्रमुख दलों द्वारा किसानों का कर्ज माफ किए जाने का वादा भी किया गया है पर क्या यह वादा वाकई पूरा किया जाएगा इसे लेकर किसानों में संदेह है। इसी तरह का कर्जमाफी का वादा पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी द्वारा भी किया गया था। इसके बाद किसानों ने दिल खोलकर सपा को वोट दिया था पर सूबे में सपा की सरकार बनने के बाद इस वायदे के साथ तमाम नियम भी लागू कर दिए गए और नाममात्र के किसानों को ही इसका लाभ मिल पाया। अब एक बार फिर से विधानसभा चुनाव सिर पर है और राजनीतिक दल किसानों को कर्जमाफी का वादा कर रहे हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि इन दलों की सरकार बनने के बाद क्या वाकई किसानों का कर्ज माफ  होगा? या फिर कर्जमाफी का यह वादा सिर्फ  आश्वासन का झुनझुना बनकर ही रह जाएगा।
बुंदेलखंड का किसान बीते कई वर्षों से दैवीय आपदाओं का सामना कर रहा है। कभी अतिवृष्टि तो कभी सूखा और ओलावृष्टि के कारण किसान पूरी तरह तबाह हो चुका है। हालत यह है कि अन्नदाता कहे जाने वाले किसान के सामने खुद की पेट भरने के लाले पड़ने लगे हैं। आर्थिक तंगी और कर्ज में डूबे हजारों किसान अब तक मौत को गले लगा चुके हैं। चुनाव से पहले राजनीतिक दल किसानों की इस हालत को मुद्दा तो बनाते हैं पर चुनाव के बाद इन दलों को किसानों की सुध लेने की फुरसत नहीं मिलती। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी अपने घोषणा पत्र में किसानों से कर्ज माफ करने का वादा किया था। इसके बाद किसानों ने दिल खोलकर समाजवादी पार्टी को वोट देकर पूर्ण बहुमत से प्रदेश की राजगद्दी पर बैठाया पर सरकार बनते ही सपा द्वारा इस वादे के साथ तमाम नियम कायदे भी लागू कर दिए गए। चिह्निïत बैंक से ही कर्ज लेने वाले किसानों का कर्जा माफ  किया गया। इससे चंद किसानों को ही राहत मिल सकी बाकी किसान पांच वर्ष तक अपने आप को ठगा सा महसूस करते रहे। अब एक बार फिर से चुनाव सिर पर आ गया है और राजनीतिक दलों को भी किसानों की सुध लेने की फुरसत मिल गई है। भारतीय जनता पार्टी से लेकर बसपा और समाजवादी पार्टी तक ने अपने अपने चुनावी घोषणा पत्रों में किसानों का कर्जा माफ करने की बात कही है पर इस बार किसान इन दलों के वादे पर भरोसा नहीं जता पा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या वाकई में प्रदेश की सत्ता में आने के बाद यह दल किसानों का कर्ज माफ  करेंगे? या फिर एक बार फिर से किसानों को सिर्फ  आश्वासनों का झुनझुना ही मिल पाएगा। इस बारे में कोंच तहसील के बसोव गांव निवासी किसान दयासागर, सतीश कुमार, नीरज पटेल आदि का कहना है कि राजनीतिक दलों को सिर्फ  चुनावों के वक्त ही किसानों की याद आती है जबकि हकीकत यह है कि इन दलों के एजेंडे में किसानों का भला करना नहीं है। इन दलों की किसानों का भला करने की कोई योजना नहीं है। राजनीतिक दल केवल राजनीतिक फायदा लेने के लिए ही किसानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं।

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