0 कपास उत्पादन देसी घी की बड़ी मंडियों में शुमार रही है कोंच
0 ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वर्ष 1902 में जोड़ा गया था रेल सुविधा से
कोंच-उरई। खाद्यान्न उत्पादन में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से होड़ लगा रहा रहा कोंच तहसील क्षेत्र कभी कपास और देसी घी की बहुत बड़ी मंडी हुआ करती थी और यहां से कपास के मुंबई, कोलकाता या अन्य प्रांतों के लिये निर्यात को देखते हुये ब्रिटिश हुकूमत ने इस छोटे से कस्बे को रेल मार्ग से जोडने की जो पहल शताब्दी भर पूर्व की थी उसे अगर सही दिशा दी जाती तो कोंच आज विकास के नये आयाम गढ रहा होता, किंतु स्वाधीनता के बाद मिले राजनैतिक उपेक्षा के दंश ने कोंच के औद्योगिक नगर बनने के सपने को तो चकनाचूर किया ही है, यहां के जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते रेल सेवा विस्तार को भी पंख नहीं लग सके हैं। अगर रेल यहां से निकल कर मेन लाइन पर होती तो कोंच उद्यांग के मामले में बुंदेलखंड का मैनचेस्टर होता।
कपास कोंच क्षेत्र का प्रमुख कृषि उत्पाद था और यहां से महानगरों के लिये कपास का निर्यात होता था। इसके अलावा देसी घी की बड़ी मंडी होने के कारण यहां का कारोबार दूर-दूर तक फैला था। व्यापारिक उपयोगिता को समझते हुये ब्रिटिश हुकूमत ने कोंच में रेल यातायात की सुविधा प्रदान की थी। जब ब्रिटिश हुक्मरानों ने देखा कि कोंच न सिर्फ बुंदेलखंड क्षेत्र का ही अपितु देश का अग्रणी कपास उत्पादक केन्द्र है तो उन्होंने इस ऐतिहासिक और पौराणिक कस्बे को रेल सुविधा से जोड़ा था।
झांसी-कानपुर मुख्य रेलमार्ग पर अवस्थित एट को जंक्शन बना कर एट-कोंच के बीच 13 किमी लम्बी रेल लाइन बिछाई गई। बर्ष 1902 में शुरू हुई यह रेल परियोजना दो साल में पूरी हो गई और 1904-05 में इस लाइन पर रेल यातायात शुरू हो गया। ब्रिटिश हुक्मरानों की सोच थी कि इस रेल लाइन को आगे दिबियापुर तक बढा कर इस क्षेत्र को सीधे दिल्ली से जोड़ा जाये ताकि कोंच से उद्योग व्यापार का सीधा रास्ता खुल सके। उन्होंने अपनी इस सोच को अमली जामा पहनाने की दिशा में शुरुआती होमवर्क भी किया था और आगे की लाइन का सर्वे आदि भी कराया गया लेकिन तब तक पहले विश्व युद्ध के बादल मंडराने लगे थे और ब्रिटिश शासन में शुरू हुई इस परियोजना को ठंडे बस्ते में जाना पड़ा। इसके बाद एक बार फिर इस रेल परियोजना पर काम चालू हुआ तभी दूसरा विश्व युद्घ आकार ले चुका था सो यह परियोजना परवान चढने से पहले ही खत्म भी हो गई।
वर्ष 1995-96 में एक समय ऐसा भी आया जब इस शटल को तत्कालीन देवगौड़ा सरकार में बंद कर दिया गया था तब यहां के नागरिकों ने सर्वदलीय रेल बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले दिल्ली तक लड़ाई लड़ी और रेलमंत्री रामविलास पासवान को यह शटल ट्रेन बहाल करने की घोषणा सदन में करनी पड़ी, डेढ महीने तक बिना रेल के सूने पड़े रहे कोंच रेलवे पर एक बार फिर रौनक लौट सकी थी। इस रेल सुविधा को बचाने में उस वक्त कोंच विधानसभा क्षेत्र से किसान कामगार पार्टी के लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीते विधायक दयाशंकर वर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और रालोद मुखिया चै. अजित सिंह का रसूख काम आया था। गौर तलब है कि कोंच में उत्पादित कपास देश में ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी निर्यात किया जाता था, इसके अलावा कृषि उत्पाद, टेराकोटा मिट्टी की मूर्तियां, कपड़ा, छपाई, नील, कैंची, उस्तरा उद्योग, जूता उद्योग, घोड़ों की जीन के नीचे लगाने काले ऊन के नमदे आदि भी यहां के प्रमुख उद्योगों में शुमार होते थे और उस जमाने में कोंच में ही अकेले आधा सैकड़ा लोग बैंकर्स और साहूकारी का काम करते थे जो इस बात के द्योतक थे कि कोंच औद्योगिक और व्यवसायिक दृष्टिकोण से काफी समृद्घ था इसी लिये ब्रिटिश शासक इसे एक बड़ा औद्योगिक नगर बनाने की परिकल्पना पर आगे बढ रहे थे। वे चाहते थे कि कोंच रेल मार्ग से सीधा दिल्ली से जुड़े, उनका मानना था कि एट होकर वाया झांसी से भी कोंच का आवागमन दिल्ली तक हो और दिबियापुर इटावा होकर भी कोंच के लोग दिल्ली आ जा सकें। अगर उनकी यह परिकल्पना मूर्त रूप लेती तो निश्चित तौर पर आज यह पिछड़ा इलाका विकास के नये आयाम गढ रहा होता।







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